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मोहग्रस्त चित्त सोच नहीं पाता

अर्जुन ने यह कहते हुए कि यह सब मेरे अपने ही हैं, इन्हें मारकर मुझे क्या सुख मिलेगा, अपना गांडीव रखते हुए युद्ध न करने की अपनी इच्छा व्यक्त कर दी. इसपर भगवान बोले कि अर्जुन तुम वीर हो तुम्हें ऐसे मौके पर कायरता शोभा नहीं देती.

अर्जुन यह तो जानता था कि वह किससे और क्यों युद्ध करने जा रहा है. फिर भी वह अपने सामने अपने प्रियजनों, गुरुजनों को देखकर मोह में पड़ गया. अर्जुन की प्रवृत्ति और प्रकृति तथा दुर्योधन की प्रवृत्ति का यहाँ फर्क समझने जैसा है. दुर्योधन ने अपनी सेना और पांडवों की सेना को देखकर द्रोणाचार्य को बताया कि उनकी सेना पांडवों पर आसानी से विजय प्राप्त कर लेगी. युद्ध में अपने सामने कौन है यह जानते हुए वह किसी मोह में नहीं फंसा है. कारण है अर्जुन और दुर्योधन की प्रकृति. अर्जुन मानवीय मूल्यों, नीति-नियमों के आधार पर है, पर दुर्योधन स्वयम कहता है कि धर्म और अधर्म को वह जानता तो है पर धर्म पर चलना उसकी प्रकृति नहीं है. यह दोनों परस्पर विरोधी आचरण, व्यवहार हैं. दैवी मूल्यों और आसुरी मूल्यों या नियमो पर आधारित चलन का यह एक तरह से सनातन युद्ध है जो इस समय भी मौजूद है. गीता में भगवान इन्ही दो प्रवृत्तियों के अंतर को और अपने स्व-स्वरूप को ठीक से पहचानने के सम्बन्ध में बता रहे हैं.

भगवान के यह कहने पर कि वीर और क्षत्रिय को कायरता शोभा नहीं देती है तव भी अर्जुन तैयार नहीं है. इसपर अर्जुन कहता है कि मैं कैसे उनसे लड़ सकता हूँ जिन्हें मैं पूजता आया हूँ.  उनसे लड़ने से तो भिक्षा मांगकर जीवन यापन करना अधिक श्रेयस्कर होगा. अपने न लड़ने के पक्ष में वह सब नीति सम्मत तर्क देता है. वह कहता है कि अभी तो यह भी पता नहीं कि विजय किसकी होगी और आत्मीय स्वजनों को मारकर हम जीना भी नहीं चाहते हैं. अपने लोगो के रक्त से सनी हुई राजसत्ता भी किस काम की है.

अर्जुन के यह सब तर्क और अपने संग्राम से विचलित होने के यह सब कारण वस्तुत: मोह का ही परिणाम हैं. वे तर्क न्याय, क्षात्र धर्म, नीति, अपने अस्तित्व की समझ, मृत्यु की वास्तविकता आदि के आधार पर नहीं हैं. इस स्थिति में मोह में पड़े हुए उस अर्जुन को भगवान को कुछ गहरे सत्य, कुछ आत्मीय कठोरता से समझाना जरूरी लगता है. गीताकार ने यहाँ एक शब्द का प्रयोग किया है वह समझने जैसा है. आँखें जिसकी आंसुओं से भरी हुयी हैं, जो शोकाकुल है, उस पर कृपयाविष्ट होते हुए भगवन ने यह वचन कहे. यहाँ कृपा शब्द का उपयोग किया गया है. दया और कृपा एक जैसे अर्थ रखते हुए भी पृथक हैं. माँ और चिकित्सक की करुणा एक जैसी होते हुए भी पृथक रूप से व्यवहार में आती है. माँ पुत्र के मोह में उसके पक गये फोड़े को देखकर रोटी तो है पर उसके विष को दबाकर निकाल नहीं पाती है. चिकित्सक उसी स्थिति में करुणा करते हुए उसे बच्चे के चिल्लाने, रोने की परवाह न करते हुए उसके विष को निकाल देता है. परिणामस्वरूप बच्चा बीमारी से मुक्त हो जाता है. चिकित्सक की दया कृपा है और माँ की दया मोहजनित दया है. अर्जुन मोहग्रस्त है इसलिए भगवन ने उसपर कृपा करते हुए वह सब कहा जिससे वह अपने इस मोह से निकल कर अपने सामने उपस्थित स्थिति का सामना वीर भाव से, निर्भय होकर, अपनी पूरी क्षमता से कर सके.

दूसरी बार जब अर्जुन कहता है कि मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करू. मैं मोहचित्त हूँ और कायर भी. बताइए सब मैं क्या करूं क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण हूँ. मोहग्रस्त तो अर्जुन है पर शरणागत भी हुआ और अपने को शिष्य भी कहा. यह सब दैवी गुणों को आधार बनाकर जीवन जीने की पहचान है. इस बारे में याद करे जब अर्जुन और दुर्योधन जाते हैं युद्ध के लिए सहायता मांगने. दुर्योधन का व्यवहार और अर्जुन के व्यवहार का जो अंतर होता है वह भी यही संकेत देता है कि कौन दैवी आचरण वाला है और कौन आसुरी आचरण का है. गीता इन्ही संकेतों के कारण ही श्रेष्ठ जीवन को सिखाने वाला महान ग्रन्थ है. इस तरह शरण आये शिष्य को भगवान कहते हैं तो पर इस भाषा में नहीं कहते कि भाई ऐसे मौके और इस स्थति में तुम्हे इस तरह की कारयता नहीं दिखानी चाहिए. वे मुस्कुराते हुए कहते हैं कि जानता तो तू कुछ है नहीं और पंडितों जैसी यानि विद्वानों जैसी बातें करता है. अरे, जो मर गए और जो मरने वाले हैं उन दोनों के बारे में पंडित जन शोक नहीं करते. यानि जो यह जानते हैं कि मरना और मारना क्या है, जीवन है क्या,वे लोग इस सब का दुःख नहीं मनाते हैं. इतना ही नहीं तव वे उसे कई दृष्टिकोण से समझाते हैं. आत्मा क्या है, कौन मरता है और कौन मारता है, निर्भय कौन होता है, आदि. वे कहते हैं क्षत्रिय का तो युद्ध में मरना स्वर्ग को प्राप्त करना है. वे यह भी कहते हैं कि इस स्थल पर आकर यदि तुम युद्ध नहीं करोगे तो लोग तुम्हारी निंदा तो करेगे ही,साथ ही तुम्हारे पराक्रम पर भी संदेह करेगे. यह सब जानना जीवन जीने में सहायक है.

प्रोफ कमल दीक्षित

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