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मोह ही तो आधार है - प्रो. कमल दीक्षित

अब धीरे धीरे सभी लोग यह मानने लगे हैं कि श्रीमद्भगवद्गीता धर्म का ग्रन्थ नहीं है. वह तो व्यक्ति को  आत्म साक्षात्कार के लिए प्रेरित करता है. अपने सामने और आने वाली जीवन की समस्याओं का सामना करने तथा उनपर विजय पाने का रास्ता बताने वाला ग्रन्थ है. वह अपने ही विकारों और कमजोरियों को समझने का सहायक है. वह उस सच को स्पष्ट करता है जिसके व्यूह में फंसकर हम लगातार उलझते ही जाते हैं.

हम कौन हैं और हमारे सामने उपस्थित जीवन क्या है. उसकी समस्याओं का मूल है क्या. जब कृष्ण कहते हैं –तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय, युद्धाय कृत निश्चय – तब उस युद्ध का तात्पर्य अपने से ही अपना युद्ध है. अपनी समझ को जागृत कर, अपनी कमजोरियों को पहचानकर, अपने सामने के संसार से परिचित होकर अपना निश्चय कर उसपर विजय पाने के लिए युद्ध कर. इसका प्रमाण अर्जुन का वह वचन है जो उसने उपदेश की समाप्ति पर कहा. अर्जुन ने कहा – नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत. स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनम् तव.मेरा मोह नष्ट हो गया, मुझे समझ आ गई. यह सब आपकी कृपा से हुआ है और अब मैं वही करूंगा जो आपने कहा है.

गीता का यह वचन बहुत सार्थक और समझ का आधार है. मेरा मोह नष्ट हो गया. आप याद करेंगे तो गीता का प्रारम्भ भी यही से है. मोह में ही तो थे धृतराष्ट्र और मोह में ही पद गया था अर्जुन. गीता का पहला ही श्लोक है जिसमे धृतराष्ट्र कहते हैं- संजय कुरुक्षेत्र में उपस्थित मेरे और पांडू पुत्रों के बीच क्या होरहा है, मुझे बताओ. एक ही कुल का सबसे बड़ा और कुल का मुखिया ही भेद करके कहता है मेरे और पांडू के. यह मेरा और तेरा ही पैदा होता है मोह के कारण. यह मेरा तेरा हम सबमे है. यही तो आधार है हमारी स्मृति और हमारे एकत्व को नष्ट करने का.मोह का आधार ही है मेरा और तेरा. अकेले धृतराष्ट्र ही नहीं दुर्योधन भी यही कहता है. गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर कहता है – अस्माकं तु विशिष्टता... हमारी सेना में जो जो हैं उनसे आपका परिचय कराता हूँ और भीम की सेना में जो हैं उनसे भी. आगे वह कहता है- मेरी सेना आपके नेतृत्व में अपराजेय है और उनकी सेना को तो सुगमता से जीता जा सकता है. अस्माकं, मेरी और उसकी. यह मेरा तेरा दुर्योधन में भी है.

अर्जुन भी इससे कहाँ मुक्त हैं. सेनाएं तैयार है तभी अर्जुन कृष्ण से कहते हैं- मेरा रथ दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलें. एक बार अपने सामने कौन कौन हैं, उनको देख तो लूं. इनसे ही तो मुझे लड़ना है. अर्जुन इतना नादान तो नहीं था कि उसे कुरु पक्ष की सेना में कौन कौन हैं यह बिल्कुल ही पता न हो. यह भी उसने तब कहा जब दोनों तरफ से नगाड़े, शंख, एवम अन्य युद्ध वाद्य बज चुके थे. यानि युद्ध शुरू ही होने जा रहा था. कृष्ण ने रथ को सेनाओं के मध्य में स्थापित किया. तब अर्जुन ने सामने निगाह डाली. देखा – अरे, ये तो वही हैं, जो मेरे गुरु है, मार्गदर्शक हैं, मामा है, चाचा हैं, ताऊ हैं, आदि आदि. इनसे लड़कर मुझे क्या आनंद मिलेगा. ये मुझे मार दें या मै इन्हें मार दूं तो क्या लाभ. ऐसी विजय का भी सुख. और इसके साथ ही वह एक दार्शनिक प्रवचन करता है कि युद्ध के परिणाम का क्या सामाजिक और पारिवारिक प्रभाव पड़ेगा और इस सबका पाप उसे ही तो लगेगा. तव acheter du cialis en ligne वह कहता है- युद्ध में उपस्थित मेरे ही इन स्वजनों को देखकर- सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति, वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते-  मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मेरा मुह सूख रहा है, कम्पन हो रहा है शरीर में और डर से रोयें खड़े हो गए हैं. मै अब यद्ध नहीं कर सकता. यह अर्जुन का मोह है. जिनसे लड़ने जा रहे थे, उन्हें यानि अपने स्वजनों को देखकर. अपने और पराये. मेरे और तेरे. इतने समय तक जो न्याय, हित, आदि के विचार चला और बना वह सब सामने आते है समाप्त हो गया. दर्शन और धर्म याद आने लगा, पाप और  पुण्य याद आ गया. यह सब मोह के क्षणों में ही याद आता है.

गीता का सार इस पहले अध्याय में उपस्थित होने वाले मोह के रूपों में छिपा है. गीता संभवतः इस मोह को कैसे नष्ट करे, क्या उपाय है यही समझाने और बताने के लिए ही कही गई. मोह के कितने रूप हो सकते हैं और वह किस किस तरह से प्रभावित कर सकता है, इसका भी बहुत स्पष्ट संकेत यहाँ है. संसार की समस्याएं इसी मोह से जनित हैं और उसके लिए अपनी स्मृति को, अपनी उस याद को जगाने की जरूरत है जिसे हम भूल गए हैं. कृष्ण इसी स्मृति को जगाते हैं और जगाने का उपाय बताते हैं. 

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