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इस भ्रम से मुक्त हों

कमल दीक्षित 

एक बडा भ्रमात्मक वाक्य है जो सबसे अधिक उपयोग में आता रहा है। भगवान से जो मांगोगे, वह तुमको मिलेगा। पुराणों में भी इस तरह के आख्यान और कहानियां हैं कि भगवान ने सब कुछ दे दिया, विवाह में आकर सारा सामान दिया, मकान आदि भी दे दिये। यानी भगवान हमारी सांसारिक जरूरतों, हमारे सांसारिक विवादों और व्यवहारों में हमारी मदद करता है। वह इतना दयालु और कृपालु है कि हमारे दुष्मनों और अब तक किये सब पापों से हमें क्षणभर में मुक्त करता है। अजामिल आदि के आख्यान इस संबंध में दिये जाते रहे हैं। इसी के साथ यह भी कहा जाता है कि वह देवों का देव, महादेव है। वह निराकार, जन्म तथा कर्मों के बंधन से मुक्त, ज्योति या ऊर्जा स्वरूप और एक ओंकार है। यह भी बताया जाता रहा है कि विष्णु, राम या कृष्ण तथा अन्य देवता उसी एकेष्वर के रूप हैं। यानी वह निराकार है और साकार भी है यानी सब एक हैं। आदि।

बहुत लोग ऐसे होंगे जो इस तरह के वचन, कथानक या आख्यानों से मेरी तरह भ्रम में पडते होंगे। मेरे जैसे लोग यह acheter du cialis en ligne मानते हैं कि वह भगवान, ईष्वर या परमेष्वर जो एक है, निराकार है, अजन्मा और कर्म आदि के बंधनों से परे है, वह लोगों को सांसारिक मांगों की पूर्ति में मददगार नहीं होता है। वह तो सांसारिक बंधनों से मुक्ति का मार्ग बताने में सहायक तथा मददगार होता है। वह आपको साकार से निराकार होने का ज्ञान देता है ताकि आप अपने सच्चे स्वरूप को पहचान सकें और जान सकें कि यह देह जो आपने अपने परिचय के रूप में जानी है, उसे केवल उस चेतना या ऊर्जा का वाहक या रथ ही मानें और जानें। आप जाने कि परमेष्वर उस संसार की रचना नहीं करता जो हमारे आसपास दिखाई देता है, भवन, वाहन, संसाधन आदि के स्वरूप में। वह हमारे रिष्तों, उनमें होने वाले व्यापार और व्यवहारों की रचना नहीं करता। वह हमारे साथ और हमारे द्वारा होने वाली घटनाओं का रचनाकार नहीं है। यह सब तो हमारी ही रचनायें हैं। हमारे ही व्यवहार और व्यापार हैं जो हमारे भोग्य-जन्म के कारण होते हैं। यह सब जो पाप-पुण्य के रूप में कहे जाने वाले कार्य व्यापार और व्यवहार हैं, वह सब हमारी ही रचना हैं, हमारे ही कार्य हैं, परमात्मा की रचना नहीं। न तो वह हमारा भाग्य लिखता है और न ही व्यापार या व्यवहार का संचालन करता है।

इस तरह से कहने पर हमारे आसपास मौजूद मंदिर, देव प्रतिमायें, देवताओं से संबंधित कथा-कहानियां, उनसे जुडे षास्त्र, पुराण आदि सब कुछ या तो मिथक होंगे या फिर निरी कल्पनायें। पर कल्पना के बारे में भी कहा तो यह जाता है कि उसका भी आधार होता है, वास्तविक। मन उस वास्तविकता को अपनी तरह से सृजित या रचित कर देता है। तब इसमें कुछ तो सच होगा ही। अपने देखे-सुने व्यक्तियों के सहारे भी तो ऐसी कथायें रची जाती हैं। महात्मा गांधी, विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, अरविन्द घोष, ब्रम्हा बाबा, महारानी अहिल्या बाई आदि के बारे में जो कुछ कहा जाता है वह सामान्य व्यक्ति से भिन्न होता है। ये और इस तरह के अन्य लोग हुए हैं जिनके गुण और षक्तियां सामान्य लोगों से भिन्न थीं। इनको महामानव, देवपुरूष या देवनारी कहा जाता है। उनकी तुलना उन देवताओं से की जाती है जो हमारे पुराणों, षास्त्रों आदि में है। ये सभी सामान्य से विषेष हुए हैं और इसी आधार पर कहा जाता है कि हम भी उनकी तरह ही विषेष हो सकते हैं, अपनी गुण और षक्तियों का विकास करके।

इन विषेष लोगों को महात्मा, वीर पुरूष या नारी आदि तो कहा गया है और यह भी कहा गया है कि इनमें परमात्मा जैसे गुण और षक्तियां हैं पर उसकी मात्रा सीमित है। उनमें से कुछ ऐसे हैं जिन्हें परमसत्ता का इलहाम हुआ या जिनको परमसत्ता ने अपने कार्य का निमित्त भी बनाया। ये ईष्वर के पुत्र, दूत या संवाहक अथवा रथ तो कहे गये पर कभी भी परमात्म सत्ता या परमात्मा नहीं कहे गये। कहा यह गया कि यह ईष्वर या परमात्मा के कार्य को करने के माध्यम हैं। परमसत्ता ने इन्हें अपने कार्य का माध्यम या निमित्त बनाया है। वे माध्यम या निमित्त भी इसलिए बन सके क्योंकि उनमें सामान्य मनुष्यों से भिन्न गुण और षक्तियां थीं। ये अपनी अर्जित षक्ति के आधार पर दूसरों के कठिन, असामान्य कार्य कर सकते थे। बाधाओं, समस्याओं को समाप्त कर सकते थे। संसाधन और वस्तुएं उपलब्ध करा सकते थे। यानी ये देवोचित कार्य अपने गुणों और षक्तियों के आधार पर कर सकते थे। इनमें अपनी अर्जित षक्ति या गुणों आधार पर ही भिन्नता की जाती रही है। इनको देखते हुए देवताओं की कल्पना सामान्य लगती है, असंभव नहीं।

इस तरह से दो सृष्टियां समझी जा सकती हैं। एक वह जो मनुष्य से गुण और षक्तियों के आधार पर विकास करते हुए देव या देवसम हैं। सत, रज और तम ही वे गुण हैं और निर्णय करना, सामना करना, अपने को विस्तार देना ओैर समेट लेना, परखना आदि ही वे षक्तियां हैं जो असामान्य बनाती हैं। ये सभी परमात्मा की षक्तियां तो हैं पर अपरिमित, असीमित नहीं। इनकी हद है, सीमा है। परमात्मा तो गुण और षक्तियों में असीम है। वह इस तरह से होने में मददगार है। देव, ़ऋषि आदि होने में उसकी मदद मिलती है। क्रूर, आसुरी आचरण और व्यभिचार आदि के गुणों और षक्तियों में उसकी मदद नहीं मिलती है। यह तो हमारी ही भूल और आचरण के परिणाम हैं। इसीलिए तो कहा जाता है, संसार की रचना हम करते हैं और स्वर्ग की रचना में वह हमारी मदद करता है। इस तरह से हम देव या देवता तो हो सकते हैं और इस विकास में परमात्मा हमारा मददगार है। वह संसार या सांसारिकता का न तो हिमायती है और न उसमें मदद करता है। सांसारिकता और उसके वैभव, व्यवहार सबकुछ हमारी ही रचना हैं। (सम्पादकीय फर 15)

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