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हद और बेहद

हम सामान्यतः अपनी हदों, सीमाओं से बंधे रहते हैं। हमारे उपयोग या बातचीत अथवा कामना के शब्दों में भले ही बेहद को व्यक्त करने वाले शब्द हों पर हमारा सोच और व्यवहार सामान्यतः हद की सीमाओं या मर्यादाओं से बंधा रहता है। हम लोकतंत्र को लोगों और उनकी कामनाओं का शासन मानते हैं, सारी दुनिया के लोगों से बंधुत्व रखने की कामना करते हैं, ऐसे काम करना चाहते हैं जिनसे लोक कल्याण हो पर यह सब स्थूल या सूक्ष्म बंधनों में बंधकर रह जाता है। ऐसे ही बहुत कुछ विस्तार को व्यक्त करती हुई बातें हैं पर हमारा सोच सामान्यतः हमारी ही रचित परिधियों या सीमाओं से बंधा रहता है। इससे उस शब्द में निहित कामना फलित नहीं हो पाती।

हम सामान्यतः अपनी हदों, सीमाओं से बंधे रहते हैं। हमारे उपयोग या बातचीत अथवा कामना के शब्दों में भले ही बेहद को व्यक्त करने वाले शब्द हों पर हमारा सोच और व्यवहार सामान्यतः हद की सीमाओं या मर्यादाओं से बंधा रहता है। हम लोकतंत्र को लोगों और उनकी कामनाओं का शासन मानते हैं, सारी दुनिया के लोगों से बंधुत्व रखने की कामना करते हैं, ऐसे काम करना चाहते हैं जिनसे लोक कल्याण हो पर यह सब स्थूल या सूक्ष्म बंधनों में बंधकर रह जाता है। ऐसे ही बहुत कुछ विस्तार को व्यक्त करती हुई बातें हैं पर हमारा सोच सामान्यतः हमारी ही रचित परिधियों या सीमाओं से बंधा रहता है। इससे उस शब्द में निहित कामना फलित नहीं हो पाती।

 

हमारी यह सीमायें या हदें हमारी ही रचित हैं। मेरा और तेरा शब्द इन्ही सीमाओं को व्यक्त करता है। यह सीमायें केवल भौतिक या भौगोलिक ही नहीं है। विचार, विश्वास और कुछ सीमा तक संस्कृति भी ऐसी हदों को बनाती और बढाती हैं। उसका कारण भी है। हम अपने जन्म से ही सीमाओं में विकसित होते हैं। परिवार, धर्म, जाति, देश-प्रदेश,व्यवस्था, भाषा, शिक्षा आदि सभी की प्राथमिकतायें बेहद की न होकर हदों की ही होती हैं। हां उनमें कुछ संदर्भ या बातें बेहद की भी होती हैं पर उनका प्राथमिकता क्रम या अनिवार्यता सापेक्ष होती है। इस सबसे हमारा विकास ही सीमाओं में बंधकर ही होता है। कई बार इन सबके बीच परस्पर विरोध या प्रतिपक्ष दिखाई देता है। यह भी अपनी ही सीमाओं में बंधा ही होता है। कुछ लोगों ने इन सीमाओं को लांघने की कोशिश भी की पर वह जानते-मानते भी पूरी तरह से सफल न होकर सीमित ही होकर रह गई। उदाहरण के लिए महर्षि अरविन्द का विश्व ग्राम। साम्यवादी दल अपनी कम्यून की स्थिति में कहां पहुंच पाया। महात्मा गांधी का विश्व सेवक या सेवक समूह बनाने का सपना अधूरा ही रहा। आचार्य बिनोबा के भी ऐसे ही हदों को लांधने के कुछ विचार थे जो अंकुरित होते-होते समाप्त हो गये। धर्म के क्षेत्र में सबसे अधिक अर्थान्तर या विभेद इन शब्दों के संदर्भ में देखा जाता रहा है और वह अब भी मौजूद है। यह भी देखा गया है कि संस्कृति जब उदार होती है तब तो वह सम्मिलन या समायोजन के द्वार खोले रखती है पर जैसे ही उसमें अनुदारता आती है या लायी जाती है, वह भी हदों में बंधकर रह जाती है।

इन सब के बीच व्यक्ति को अपने निज आत्म स्वरूप तथा परमात्मा से आत्मा का संबंध जोडने के उपाय बताने वाला अध्यात्म का भी मार्ग है जो वस्तुतः हदों के परे जाने का मनस-द्वार आत्मा तथा परमात्मा की अनुभूति के साथ ही खोलता है। एक मायने में तो वह उस अनुभव का प्रकृत या स्वाभाविक परिणाम ही है। यह इसलिए भी कि आत्मा का मूल स्वरूप और उसके गुण ही निर्बंध हैं। आत्मा का परिवार, जाति, धर्म, देश-प्रदेश से परिस्थिति वष संबंध तो होता है पर वस्तुतः कोई बंधन नहीं होता। उसका नजरिया ही समष्टि का होता है। वह हदों के पार ही अपने को विस्तार पाते देखता है। इसलिये दुनिया भर में वे लोग जो ईश्वरीय अनुभूति को प्राप्त होते हैं वे हदों के विश्वास, विचार और व्यवहार के बंधनों में नहीं होते हैं। भारत में इसका अनुभव सर्वाधिक किया गया है। आत्मा के स्वरूप का अनुभव होते ही व्यक्ति की चेतना में पूरी मनुष्यता समाहित हो जाती है। उनके लिए देश, काल,परिस्थिति, विधान आदि के बंधन व्यर्थ लगते हैं। वे कहीं भी रहें, कहीं के भी हों पर उनके लिए सारे मनुष्य आत्म स्वरूप हैं, अपने ही समान हैं, अपने ही गुणों और संभावनाओं के साथ हैं। वे सब अनेक दिखते हुए भी एक हैं और एक पिता परमात्मा के पुत्र ही हैं।

अध्यात्म यह दृष्टि इसलिए दे पाता है क्योंकि उसका प्राथमिक आधार ही स्वयं को जानना और अनुभव करना है।“मैं कौन हूं“ उसकी पहली सीढी है। यह शब्द नहीं है और न जानकारी है। यह प्रयोग है करके देखने का। यह प्रयोग है इस इंद्रिय- समूह से परे जाकर अतीन्द्रियता का अनुभव-दर्शन करने का। इसका अनुभव जिसे भी हुआ उसने जाना कि वह इंद्रियों का समुच्चय नहीं है, वह षरीर नहीं है, वह आत्मा है जो न मरता है, न उसे कोई जला सकता है, न उसे कोई मार सकता है, न उसे कोई स्थान बांध सकता है। वह बंधता भी तो अपने स्वरूप को भूल जाने के कारण, स्वरूप की अज्ञानता में किये गये अपने कर्म के बंधन में। अपने ही किये गये कार्य और व्यवहार के कारण वह उन सब बंधनों में बंधता है जो उसे बेहद से हटाकर हदों में बांध देते हैं। अध्यात्म वह दृष्टि और उपाय है जिससे वह पुनः अपने मूल स्वरूप में लौट पाता है। इसीलिए आत्मानुभूति या आत्मान्वेषण के सभी मार्गों में भाषा भिन्नता, अनुभव की भिन्नता होते हुए भी समष्टि के इस नजरिये की भिन्नता नहीं है। वेद, उपनिषद, श्रीमदभगवत गीता का मूल संदेश इसी नजरिये की पुष्टि करता है। बाईबिल या कुरान अथवा जंद अवेस्ता का नजरिया या संदेश भी इसी को स्वीकार करता है। ऋषि, मुनि या पैगेम्बर, ईश-दूत या ईश्वर का पुत्र आदि नामों से संबोधित उपलब्ध पुरूषों का नजरिया भी यही रहा है।

ताजे संदर्भों में 1936-37 में दादा लेखराज कृपलानी को भी ऐसी ही अनुभूति, साक्षात्कार और दर्शन हुआ जिससे उनका भी नजरिया हद से बेहद में विस्तार पा गया। परमात्मा ने अपने लोक कल्याण के कार्य का निमित्त उन्हें बनाया और कहा कि युध्द, हिंसा और व्यभिचार में फंसी इस दुनिया और लोगों को उनके अपने वास्तविक स्वरूप से उन्हें परिचित कराओ और वह रास्ता बताओ जिससे वे अपने निज स्वरूप को पा सकें। ब्रम्हा संज्ञित दादा लेखराज के इस परमात्म कार्य के सहायक बने सभी ब्रम्हाकुमार और ब्रम्हाकुमारियां पूरी दुनिया के लोगों को सभी भेदों-भाषा,धर्म, जाति, संस्कृति आदि, के परे जाकर यही संदेश दे रहे हैं। उनका अभेदता, समष्टि, बेहद का यह नजरिया उसी अध्यात्म की अनुभूति का परिणाम है जिसे उन्होंने अपने स्वरूप को जानकर स्वीकार किया है। और ऐसा केवल उनका ही नहीं किसी का भी होगा जो भी अपने को, अपने मूल स्वरूप को जानने का उपाय करेगा। राजयोग भी इसी सब को जानने का उपाय है। इस उपाय से ही लोगों ने अपनी हदों को बेहद में बदला और विस्तारित किया है और यही नजरिया आज की समस्याओं का एकमेव हल भी है। (सम्पादकीय राखु सित 17) - प्रो कमल दीक्षित

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