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दृष्टिकोण क्या है

 

प्रो कमल दीक्षित 

दृष्टिकोण छोटा सा शब्द है जो नजरिये का समानार्थी है। आप जिस नजरिये से वस्तु, व्यवहार या लोगों को तथा उनके गुणों आदि को देखते हैं वही दृष्टिकोण कहा जाता है पर वह इतना ही नहीं है। देखना आंख से होता है। देखने में आपका मन और बुध्दि भी उसके साथ होती है। मन और बुध्दि की स्थिति भी उस व्यवहार में शामिल हो जाती है। यह सब मिलकर आपकी प्रवृत्ति का निर्माण करते हैं। इसलिए इतना कहना पर्याप्त नहीं है कि दृष्टिकोण सिर्फ देखना है।

 

प्रो कमल दीक्षित 

दृष्टिकोण छोटा सा शब्द है जो नजरिये का समानार्थी है। आप जिस नजरिये से वस्तु, व्यवहार या लोगों को तथा उनके गुणों आदि को देखते हैं वही दृष्टिकोण कहा जाता है पर वह इतना ही नहीं है। देखना आंख से होता है। देखने में आपका मन और बुध्दि भी उसके साथ होती है। मन और बुध्दि की स्थिति भी उस व्यवहार में शामिल हो जाती है। यह सब मिलकर आपकी प्रवृत्ति का निर्माण करते हैं। इसलिए इतना कहना पर्याप्त नहीं है कि दृष्टिकोण सिर्फ देखना है।

 

हम जब किसी को देखते हैं तो उसके साथ ही हमारी बुध्दि, हमारा मन भी उस देखने में शामिल हो जाता है। बुध्दि और मन की स्थिति और उस समय उनके स्वभाव, उनपर पडा संस्कार का प्रभाव यह सब भी उसमें शामिल होते हैं। यह इतने तक ही सीमित नहीं होता। कई बार इसके साथ हमारा अवचेतन भी इस देखने में भागीदार होता है। यह सब आंख के देखने और उसकी जानकारी दिमाग तक पहुंचने के साथ ही सम्पन्न होता रहता है। मन, बुध्दि और संस्कार की सात्विक, राजसिक और तामसिक गुणों की स्थिति उस देखने में दृष्टि का निर्माण करती है। सत, रज और तम के आधार पर बनी दृष्टि ही कृति यानी उसपर प्रतिक्रिया या क्रिया के लिए उकसाती हेै। दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति प्रायः इस कृति या क्रिया पक्ष से ही होती है।

आप अपने ही मित्र को सभी दिन, सभी समय और सभी परिस्थितियों में एक सा नहीं देखते हैं। उसके प्रति आपके भाव में जो परिवर्तन होता है, उसे एक मायने में वृत्ति के रूप में समझा जा सकता है। लगभग ऐसा ही आपका व्यवहार अन्य लोगों के प्रति होता है। वे आपके परिवार जन, परिचय के लोग हो सकते हैं या वे हो सकते हैं जिनसे आपका कार्य या व्यवहार का संबंध होता है। यह व्यवहार ही वृत्ति है यानी उसके प्रति हमारे दृष्टिकोण का व्यावहारिक रूप व्यक्त होता है।

हम जन्म के साथ ही अपने स्वभाव लाते हैं जो जीवन व्यवहार के लिए सत, रज और तम पर आधारित होता है। यह तीनों गुण मन बुध्दि और संस्कार के साथ मिलकर आत्मा की स्थिति का आधार बनाते हैं। पूरे समय कोई भी व्यक्ति जन्म से अपने अंतिम समय तक आत्मा की इन्हीं गुणों के आधार से बनी स्थिति के आधार पर व्यवहार करता है। यह सब होता तो है एक तरह से, पहले से बनी हुई पटरी पर चलना पर इनमें आत्मा की सजगता तथा आत्मा के प्रति अन्य आत्माओं की संवेदन भावनाऐं इनमंें परिवर्तन भी लाती हैं या ला सकती हैं। साथ ही आपका अपना व्यवहार और दृष्टिकोण भी इसके गुणात्मक परिवर्तन का सहयोगी होता है।

धर्म, अध्यात्म या मानवीय संवेदन यानी सभी के प्रति आपकी संवेदित भावनाऐं इस सब मंें परिवर्तन कर सकते हैं। अपने स्वरूप को जानकार यानी यह जानकर कि आप इंद्रियों का सम्मुचय नहीं हैं वरन इस शरीर को संचालित करने वाली आत्मा हैं। तब आप अपनी आत्मा और उसके मूल गुणों को पहचान कर व्यवहार करने के प्रति सजग हो सकते हैं। यह सजगता और उस सजगता के लिए उपाय ही अध्यात्म है। धर्म भी अपने मूल अर्थ में उसी आत्मा और परमात्मा के संबंध को समझना और तदनुरूप व्यवहार करना है।

इस सबका एक अर्थ यह है कि जिस दृष्टिकोण और जिस वृत्ति से आप अपने जीवन में व्यवहार कर रहे हैं, जो आपकी जीवन शैली के आधार हैं, जिनसे आप का व्यक्तित्व बना है, जिस व्यवहार और विचार से आप पहचाने जाते हैं, उसका आत्म विवेचन करके देखें कि वह सत, रज या तम में से किस गुण पर अधिक केन्द्रित है। यानी आत्मा की इन गुणों के संदर्भ में स्थिति क्या है। उसे सतो गुणी बनाने की ओर प्रवृत्त करने के लिए प्रयत्न करने के लिए सजग होना होगा। यह सजगता और प्रवृत्ति आपको और आपके दृष्टिकोण को उस तरह से बदल सकती है जिससे आप लोगों के बीच सदाशयी, मानवीय संवेदना से परिपूर्ण, अनुकरणीय व्यक्तित्व के रूप में पहचाने जा सकें और इस तरह से लोगों की दुआऐं और शुभकामनायें प्राप्त करते हुए एक सफल जीवन, एक सार्थक जीवन, एक अनुकरणीय जीवन जीते रह सके। (जून 17)

प्रो कमल दीक्षित 

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