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गुरू कोैन

जन्म से लेकर मृत्यु तक हम निरंतर कुछ न कुछ जानते, समझते और सीखते रहते हैं। यह जानना, समझना और सीखना जीवन का सहयोगी है और इससे जीवन और उसके लक्ष्य को पाने में मदद मिलती है। अपने लक्ष्य का निर्धारण भी इन्हीं के सहारे करते हेैं। व्यवहार, कर्म और प्रयोग जीवन के ही अंग हैं। इनसे ही निर्णय और निष्कर्ष तैयार होते हैं। इनकी अनुकूलता, सफलता, उत्कर्ष आनंद,खुशी और उत्साह-उमंग पेैदा करती है और इस सबके विपरीत होने पर निराशा, अवसाद और हताशा होती है जिसे कोई नहीं चाहता है।

जन्म से लेकर मृत्यु तक हम निरंतर कुछ न कुछ जानते, समझते और सीखते रहते हैं। यह जानना, समझना और सीखना जीवन का सहयोगी है और इससे जीवन और उसके लक्ष्य को पाने में मदद मिलती है। अपने लक्ष्य का निर्धारण भी इन्हीं के सहारे करते हेैं। व्यवहार, कर्म और प्रयोग जीवन के ही अंग हैं। इनसे ही निर्णय और निष्कर्ष तैयार होते हैं। इनकी अनुकूलता, सफलता, उत्कर्ष आनंद,खुशी और उत्साह-उमंग पेैदा करती है और इस सबके विपरीत होने पर निराशा, अवसाद और हताशा होती है जिसे कोई नहीं चाहता है।

 

जानना, सीखना और समझना हर व्यक्ति का नैसर्गिक या स्वाभाविक लक्षण है। पर यह किसी न किसी मार्गदर्शक, जानकार, सिखाने या बताने वाले की चाहना करता है। हम चाहते हैं कि कोई हमें बताये, सिखाये। हम जानकार, सिखाने और बतलाने वालों के पास होना या रहना चाहते हैं। हम यह भी अनुभव करते हैं कि नया जानने ओैर सीखने से हमारी सामर्थ्य और समझ में अंतर आता है और हम अपने जीवन की चुनौतियों में उन्हें सहयोगी मानते हैं। इसीलिये हम जानकार, सिखाने और बताने वाले के प्रति श्रध्दा, विश्वास और अनुराग रखते और व्यक्त करते हैं। हम उन्हें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला मानते हैं। हम उन्हें परमात्मा के बराबर का दर्जा देने का भाव रखते हैं और कहते भी हैं कि गोविन्द से पहले आप हैं क्योंकि यह सब आपके सिखाने समझाने के कारण ही है।

हमने उन्हें शिक्षक, गुरू और सदगुरू के रूप में वर्गीकृत किया और उनका वंदन, अभिनंदन किया और करते आ रहे हैं। अपने आदिम समय से लेकर तकनीक और ज्ञान के विकास से समृध्द इस युग में भी उनको हम अपरिहार्य मानते हैं। वे न हों तो अब भी हम भविष्य के प्रकाश को लाने में समर्थ नहीं हैं। माता-पिता, मित्र, परिजन जैसे कई रूपों में उन्हें देखा और जाना है। जन्म से लेकर अंत्येष्ठि तक सभी जगह और सभी रूपों में तो उन्हें देखा और अनुभव किया है। जीवन और जीवन के परे, व्यक्त और अव्यक्त दोनों ही स्थितियों में उनको सहायक ही तो पाया है। तभी तो हमने गाया- गुरू ही ब्रम्हा, गुरू ही विष्णु, गुरू ही देवाधिदेव महेश्वर हैं।

अक्षर ज्ञान को बताने वाले को हमने शिक्षक कहा। जीवन और जीवन यापन की कला और उपायों को को बताने वाले हमारे मार्गदर्शक रहे। हमें जीवन और जगत की जानकारियों से उन्होने भरपूर किया जिससे हम अपने को अपने जगत और समाज से जोडने में कामयाब हो सके। हमें जानकारियों की व्याख्या और विश्लेषण उन्हीं से तो मिले हैं। हमने जीवन, संस्कृति, सभ्यता, धर्म, अर्थ, काम,विज्ञान और तकनीक के प्रयोग उन्हीं से समझकर आगे विकसित किये हैं। उनसे प्राप्त जानकारियों, व्याख्याओं और प्रयोगों को हमने अपनी विकसित समझ से आगे भी बढाया। एक अर्थ में हम उन्हीं से तो उन्हीं की तरह बनकर उनकी ही भूमिका में आज हैं।

हमने जिनसे यह जाना कि यह जगत और संसार से जुडा जो जीवन है, देह से जुडे संबंध हैं, देह से संबंधित व्यापार और व्यवहार हैं, यही सबकुछ नहीं है। इस व्यक्त जीवन के परे भी बहुत कुछ है। वह क्या है और हम क्या हैं, इसकी जानकारी देने वाले को हमने गुरू कहा। गुरू संसार से जोडे रखने वाले को नहीं कहा। गुरू कहा उसे जिसने हमारी एक और आंख खोली। उसी ने बताया कि जीवन,जन्म और मृत्यु तक ही सीमित नहीं है। मरणधर्मा तो देह है पर इस देह और उसके अंग-उपांगांें को जीवन और चेतना देने वाली, उसे संचालित करने वाली और देह से देहांतर करने वाली आत्मा मरणधर्मा नहंीं है। वह अपने संस्कार जन्य कर्मों के भोग और भुगतान के लिए देह का सहारा लेती है, नये जन्म के माध्यम से। उसने कहा कि देहातीत जीवन को जानना और साधना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिये। उसने उन लोगों को अपने साथ जोडा जो इस लक्ष्य के लिए साधना करना चाहते थे। उसने अपने अनुभवों के सहारे ऐसे लोगों का कुल, समूह, सम्प्रदाय या ईश्वरीय परिवार बनाया।

गुरू स्वयं भी साधक था। उसका भी लक्ष्य और पथ था। उसपर चलते-चलते कुछ विरल लोग उस परम सत्ता के आभास को पा सके। उस परमात्म नूर का उन्होने अनुभव किया और उसमें समा गये। कोई एकाध ऐसे थे जिनको परमात्मा ने ही अपने परिचय और रचना के ध्येय के बारे में बताया और कहा कि अपने को उस सर्वोच्च शिखर की साधना के साथ अपने कुल की रचना करो। वे सब जो साधना के सहारे आभास की उच्चतम स्थिति तक पहुंचे या जिनके माध्यम से स्वयं परम सत्ता ने अपने आशय और रहस्य को व्यक्त किया वे सब परमहंस, सदगुरू कहे गये। वे अपनी उस उच्चतम स्थिति में थे कि अनुभव तो कर रहे थे, अनुभूति के सागर में समा गये थे। न तो शिक्षा, जानकारी, कुल, सम्प्रदाय आदि उनका लक्ष्य नहीं रहा। जो उनके पास था, समीप था यानी उनकी स्थिति के समीप था, वह कुछ अमृत की बूंदे उनसे पा सका। ऐसे साधको का हमने परमहंस कहा। इनके परे तो बस वहीं परम सत्ता है। वही सदगुरू है। इसीलिये इन जानकारों ने कहा कि सदगुरू तो केवल वही है जो ज्ञान, गुण और शक्ति का सागर है। उसी को सदाशिव या शिव परमात्मा कहकर नमन किया। परमहंसों ने अपने को न तो सद्गुरू कहा और न माना। गुरूओं ने भी उन्हें परमहंस ही कहा जो देह की देहातीत होने की आत्यंतिक स्थिति थी। वह उनकी साधना, योग या साधना-पथ की उच्चतम स्थिति थी। वह स्थिति जो निर्विकार, निराकार और निर्हंकारी थी। जिसमें वे सदाशिव के सतत समीप बने हुए थे। यहीं उनका लक्ष्य भी था। यही उन सबका लक्ष्य होगा जो परमसत्ता के इस रहस्य का अनुभव करना चाहेंगे। यही सदगुरू की कृपा है। वही तो दिव्य नेत्र देकर सब रहस्य उदघाटित करता है।

प्रो कमल दीक्षित 

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