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बोधकथा

शांत मन में ही शुद्ध विचार

गुरु-शिष्य भ्रमण करते हुए एक वन से गुजर रहे थे। कुछ दूर से एक झरने का पानी बह कर आ रहा था। गुरूजी को प्यास लगी। उन्होंने शिष्य को कमण्डल में पानी भर कर लाने के लिए कहा। शिष्य ने पानी के पास पहुँच कर देखा कि वहां से अभी-अभी बैल गाड़ियाँ निकलीं हैंजिससे वहां का पानी गंदा हो गया था और सूखे पत्ते तैर रहे थे। शिष्य ने आकर गुरूजी से कहा- ” कहीं और से पानी का प्रबंध करना होगा।” लेकिन गुरूजी ने शिष्य को बार-बार वहीं से पानी लाने को कहा। हर बार शिष्य देखता कि पानी गंदा था फिर भी ….। पांचवी बार भी जब वहीं से पानी लाने को कहा गयातब शिष्य के चेहरे पर असंतोष और खीज के भाव थे।
शिष्य गुरूजी की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता थाअत: वह फिर वहां गया। इस बार जाने पर शिष्य ने देखा कि झरने का जल शांत एवं स्वच्छ था। वह प्रसन्नता पूर्वक गुरूजी के पीने के लिए पात्र में जल भर लाया। शिष्य के हाथ से जल ग्रहण करते हुए गुरूजी मुस्कराए और शिष्य को समझाया – ” वत्स ! हमारे मन रूपी जल को भी प्रायः कुविचारों के बैल दूषित करते रहते हैं। अत:हमें अपने मन के झरने के शांत होने की प्रतीक्षा करनी चाहिएतभी मन में स्वच्छ विचार आयेंगे। उद्वेलित मन से कभी कोइ निर्णय नहीं लेना चाहिए।

कथा सार : शांत मन ही स्वच्छ हो सकता हैसो कभी विचार रूपी बैलो को हावी न होने दे अपने मन पर । निष्काम भाव से बस कर्म करते रहेमन को गंदा होने से बचाते रहे । - राधा स्वामी जी

 

जीत तो होगी ही

बहुत समय पहले की बात है गंगा नदी के किनारे पीपल का एक पेड़ था. पहाड़ों से उतरती गंगा पूरे वेग से बह रही थी कि अचानक पेड़ से दो पत्ते नदी में आ गिरे.

एक पत्ता आड़ा गिरा और एक सीधा.

 

जो आड़ा गिरा वह अड़ गया, कहने लगा, “आज चाहे जो हो जाए मैं इस नदी को रोक कर ही रहूँगा…चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए मैं इसे आगे नहीं बढ़ने दूंगा.”

 

वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा – रुक जा गंगा ….अब तू और आगे नहीं बढ़ सकती….मैं तुझे यहीं रोक दूंगा!

 

पर नदी तो बढ़ती ही जा रही थी…उसे तो पता भी नहीं था कि कोई पत्ता उसे रोकने की कोशिश कर रहा है. पर पत्ते की तो जान पर बन आई थी..वो लगातार संघर्ष कर रहा था…नहीं जानता था कि बिना लड़े भी वहीँ पहुंचेगा जहाँ लड़कर..थककर..हारकर पहुंचेगा! पर अब और तब के बीच का समय उसकी पीड़ा का…. उसके संताप का काल बन जाएगा.

 

वहीँ दूसरा पत्ता जो सीधा गिरा था, वह तो नदी के प्रवाह के साथ ही बड़े मजे से बहता चला जा रहा 

 

“चल गंगा, आज मैं तुझे तेरे गंतव्य तक पहुंचा के ही दम लूँगा…चाहे जो हो जाए मैं तेरे मार्ग में कोई अवरोध नहीं आने दूंगा….तुझे सागर तक पहुंचा ही दूंगा.”

 

नदी को इस पत्ते का भी कुछ पता नहीं…वह तो अपनी ही धुन में सागर की ओर बढती जा रही है. पर पत्ता तो आनंदित है,वह तो यही समझ रहा है कि वही नदी को अपने साथ बहाए ले जा रहा है.  आड़े पत्ते की तरह सीधा पत्ता भी नहीं जानता था कि चाहे वो नदी का साथ दे या नहीं नदी तो वहीं पहुंचेगी जहाँ उसे पहुंचना है! पर अब और तब के बीच का समय उसके सुख का…. उसके आनंद का काल बन जाएगा.

 

जो पत्ता नदी से लड़ रहा है…उसे रोक रहा है, उसकी जीत का कोई उपाय संभव नहीं है और जो पत्ता नदी को बहाए जा रहा है उसकी हार को कोई उपाय है. इसी तरह भगवान द्वारा एक यज्ञ स्थापित किया गया है जो गंगा की तरह पिछले 81 वर्षो से अपने गंतव्य तक पहुचने के लिए सतत आगे बढ़ता जा रहा है...

ये तो निश्चित है कि एक दिन इस यज्ञ द्वारा परमात्मा का कार्य जरूर सम्पन होना है, सतयुग आना ही है. 

 

बी के मेधा

हमारी खुशी हमपर ही निर्भर करती है। निशीथ रंजन

एक नगर में एक शीशमहल था। उस महल की हर एक दीवार पर सैकड़ों शीशे जड़े हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल इंसान महल को देखने गया। जैसे ही वह महल के भीतर घुसा, वहां अचानक उसे सैकड़ों गुस्सैल इंसान दिखने लगे। सारे के सारे उसी गुस्सैल इंसान से नाराज और दुःखी लग रहे थे। उनके चहरे पर आ रहे क्रोध के तरह तरह के भावों को देखकर वह इंसान और ज्यादा क्रोधित हुआ और उन पर चिल्लाने लगा।

ठीक उसी वक्त उसे वह सैकड़ों इंसान अपने ऊपर क्रोध से चिल्लाते हुए दिखने लगे। इतने सारे लोगों को खुद पर नाराज होता देख वह डरकर वहां से भाग गया। कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती। कुछ दिनों बाद एक अन्य शांतिदूत एवं प्रेम मसीहा हाथ जोड़ शीशमहल पहुंचा। स्वभाव से वह खुशमिजाज और जिंदादिल था। महल में घुसते ही उसे वहां दूसरा नजारा देखने को मिला। उसे सैकड़ों इंसान हाथ जोड़ स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों इंसान खुशी एवं आनंद मनाते हुए नजर आए। यह सब देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा।

 

 

जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना। 

 



हमारे अंदर और बाहर का संसार भी ऐसा ही शीशमहल है जिसमें व्यक्ति अपनी सोच एवं विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग इस संसार को आनंद का लोक मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं। जो लोग इसे दुःखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुःख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता। इसलिए हम स्वयं ही अपने मित्र हैं और स्वयं ही अपने शत्रु हैं।(हिंदी साहित्य दर्पण डॉट कॉम )

मजार

किसी मज़ार पर एक फकीर रहता था।सैकड़ों भक्त उस मज़ार पर आकर दान-दक्षिणा चढ़ाते थे।उन भक्तों में एक बंजारा भी था।वह बहुत गरीब था,फिर भीनियमानुसार आकर माथा टेकता,फकीर की सेवा करता,और फिर अपने काम पर जाता,उसका कपड़े का व्यवसाय था,कपड़ों की भारी पोटली कंधों पर लिए सुबह से लेकर शाम तक गलियों में फेरी लगाताकपड़े बेचता। एक दिन उस फकीर को उस पर दया आ गई,उसने अपना गधा उसे भेंट कर दिया।अब तो बंजारे की आधी समस्याएं हल हो गईं।वह सारे कपड़े गधे पर लादता और जब थक जाता तो खुद भी गधे पर बैठ जाता।


यूं ही कुछ महीने बीत गए. एक दिन गधे की मृत्यु हो गई। बंजारा बहुत दुखी हुआ,उसने उसे उचित स्थान पर दफनाया, उसकी कब्र बनाई और फूट-फूट कर रोने लगा। समीप से जा रहे किसी व्यक्ति ने जब यह दृश्य देखा, तो सोचा जरूर किसी संत की मज़ार होगी। तभी यह बंजारा यहां बैठकर अपना दुख रो रहा है। यह सोचकर उस व्यक्ति ने कब्र पर माथा टेका और अपनी मन्नत हेतु वहां प्रार्थना की कुछ पैसे चढ़ाकर वहां से चला गया।


कुछ दिनों के उपरांत ही उस व्यक्ति की कामना पूर्ण हो गई। उसने खुशी के मारे सारे गांव में डंका बजाया कि अमुक स्थान पर एक पूर्ण फकीर की मज़ार है। वहां जाकर जो अरदास करो वह पूर्ण होती है।मनचाही मुरादे बख्शी जाती हैं वहां। उस दिन से उस कब्र परभक्तों का तांता लगना शुरू हो गया। दूर-दराज से भक्त अपनी मुरादे बख्शाने वहां आने लगे।बंजारे की तो चांदी हो गई,बैठे-बैठे उसे कमाई का साधन मिल गया था। एक दिन वही फकीर जिन्होंने बंजारे को अपना गधा भेंट स्वरूप दिया था वहां से गुजर रहे थे। उन्हें देखते ही बंजारे ने उनके चरण पकड़ लिए और बोला-"आपके गधे ने तो मेरी जिंदगी बना दी। जब तक जीवित था तब तक मेरे रोजगार में मेरी मदद करता था और मरने के बाद मेरी जीविका का साधन बन गया है।" फकीर हंसते हुए बोले, "बच्चा! जिस मज़ार पर तू नित्य माथा टेकने आता था, वह मज़ार इस गधे की मां की थी।" बस यूही चल रहा है ।

अनामिका आचार्य

मांस का मूल्य

मगध सम्राट बिंन्दुसार ने एक बार अपनी सभा मे पूछा : 

देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए *सबसे सस्ती वस्तु क्या है ?*

मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये ! चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि तो बहुत श्रम के बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो, ऎसी हालत में अन्न तो सस्ता हो ही नहीं सकता !

तब शिकार का शौक पालने वाले एक सामंत ने कहा :

राजन, *सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है,*

इसे पाने मे मेहनत कम लगती है और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है । सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन प्रधान मंत्री चाणक्य चुप थे । 

तब सम्राट ने उनसे पूछा : आपका इस बारे में क्या मत है ? 

चाणक्य ने कहा : मैं अपने विचार कल आपके समक्ष रखूंगा !

रात होने पर प्रधानमंत्री उस सामंत के महल पहुंचे, सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर घबरा गया ।

प्रधानमंत्री ने कहा : शाम को महाराज एकाएक बीमार हो गये हैं, राजवैद्य ने कहा है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाए तो राजा के प्राण बच सकते हैं,

इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय  का सिर्फ दो तोला मांस लेने आया हूं । इसके लिए आप एक लाख स्वर्ण मुद्रायें ले लें ।

यह सुनते ही सामंत के चेहरे का रंग उड़ गया, उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी मांगी और *उल्टे एक लाख स्वर्ण मुद्रायें देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें ।

प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामंतों, सेनाधिकारियों के यहां पहुंचे और *सभी से उनके हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ, उल्टे सभी ने अपने बचाव के लिये प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख, पांच लाख तक स्वर्ण मुद्रायें दीं ।

इस प्रकार करीब दो करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले वापस अपने महल पहुंचे और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्रायें रख दीं ।

सम्राट ने पूछा : यह सब क्या है ? तब प्रधानमंत्री ने बताया कि दो तोला मांस खरिदने के लिए इतनी धनराशि इकट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला। 

राजन ! अब आप स्वयं विचार करें कि मांस कितना सस्ता है ?

जीवन अमूल्य है, हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी है, उसी तरह सभी जीवों को भी अपनी जान उतनी ही प्यारी है । किंतु अंतर बस इतना है कि मनुष्य अपने प्राण बचाने हेतु हर सम्भव प्रयास कर सकता है । बोलकर, रिझाकर, डराकर, रिश्वत देकर आदि आदि ।

 

पशु न तो बोल सकते हैं, न ही अपनी व्यथा बता सकते हैं । तो क्या बस इसी कारण उनसे जीने का अधिकार छीन लिया जाय ।

 

 

मनोबल

एक राजा था. उसके पास एक हाथी था. राजा उस हाथी से बहुत प्रेम करता था. वह हाथी समस्त प्रजा का भी प्रिय था. उसकी प्रियता का कारण यह था कि उसमें अनेक गुण निहित थे. वह बुद्धिमान एवं स्वामिभक्त था. अपने जीवन में अनेक पराक्रमों से उसने बहुत नाम और यश कमाया था. भयंकर युद्धों में अपनी वीरता दिखाकर उसने राजा को विजयी बनाया था. अब वह हाथी धीरे-धीरे बूढा हो रहा था. उसका सारा शरीर शिथिल हो गया जिससे वह युद्ध में जाने लायक नहीं रहा.

एक दिन वह तालाब पर पानी पीने गया. तालाब में पानी कम होने से हाथी तालाब के मध्य में पहुंच गया. पानी के साथ तालाब में कीचड़ भी खूब था. हाथी उस कीचड़ के दलदल में फंस गया. वह अपने शिथिल शरीर को कीचड़ से निकाल पाने में असमर्थ था. वह बहुत घबराया और जोर-जोर से चिंघाड़ने लगा. उसकी चिंघाड़ सुनकर सारे महावत उसकी ओर दौड़े.

उसकी दयनीय स्थिति को देखकर वे सोच में पड़े. इतने विशालकाय हाथी को कैसे कीचड़ से बाहर निकाला जाए. आखिर उन्होंने बड़े-बड़े भाले भौंके जिसकी चुभन से वह अपनी शक्ति को इकट्ठी करके बाहर निकल जाए, परन्तु उन भालों ने उसके शरीर को और भी पीड़ा पहुंचाई जिससे उसकी आँखों से आँसू बहने लगे .

यह समाचार जब राजमहल में राजा को पता चला तो वे भी शीघ्रता से वहाँ पहुंचे. अपने प्रिय हाथी को ऐसी हालत में देखकर राजा के आँखों से आंसू बह निकले. कुछ सोचकर राजा नेकहा, “बूढ़े महावत को बुलाया जाए.”

बूढ़े महावत ने आकर राजा को सलाह दी,  “हाथी को बाहर निकालने का एक ही तरीका है कि बैंड लाओ, युद्ध का नगाड़ा बजाओ और सैनिकों की कतार इसके सामने खडी कर दो.” राजा ने तत्क्षण आदेश दिया कि युद्ध का नगाड़ा बजाया जाए और सैनिकों को अस्त्र-शस्त्र के साथ सुसज्जित किया जाए. कुछ घंटों में सारी तैयारियाँ हो गई. जैसे नगाड़ा बजा और सैनिकों की लम्बी कतार देखी, हाथी के शरीर में अचानक से हलचल होने लगी और वह एक ही छलांग में बाहर आ गया.

नगाड़े की आवाज ने उसके सुप्त मनोबल को जगा दिया. युद्ध के बाजे बजे और वह ठहरा रह जाए, ऐसा कभी नहीं हुआ था. रणभेरी की आवाज ने उसे भुला दिया कि वह बूढा है, कमजोर है और कीचड़ में फँसा है.

जीवन में मनोबल ही श्रेष्ठ है. जिसका मनोबल जागृत हो गया उसको दुनिया की कोई भी शक्ति रोक नहीं सकती. जो मन से कमजोर है वह किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो सकता. इसलिए हमें कभी भी अपने मनोबल को कमजोर पड़ने नहीं देना चाहिए.