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हमारी खुशी हमपर ही निर्भर करती है। निशीथ रंजन

एक नगर में एक शीशमहल था। उस महल की हर एक दीवार पर सैकड़ों शीशे जड़े हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल इंसान महल को देखने गया। जैसे ही वह महल के भीतर घुसा, वहां अचानक उसे सैकड़ों गुस्सैल इंसान दिखने लगे। सारे के सारे उसी गुस्सैल इंसान से नाराज और दुःखी लग रहे थे। उनके चहरे पर आ रहे क्रोध के तरह तरह के भावों को देखकर वह इंसान और ज्यादा क्रोधित हुआ और उन पर चिल्लाने लगा।

ठीक उसी वक्त उसे वह सैकड़ों इंसान अपने ऊपर क्रोध से चिल्लाते हुए दिखने लगे। इतने सारे लोगों को खुद पर नाराज होता देख वह डरकर वहां से भाग गया। कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती। कुछ दिनों बाद एक अन्य शांतिदूत एवं प्रेम मसीहा हाथ जोड़ शीशमहल पहुंचा। स्वभाव से वह खुशमिजाज और जिंदादिल था। महल में घुसते ही उसे वहां दूसरा नजारा देखने को मिला। उसे सैकड़ों इंसान हाथ जोड़ स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों इंसान खुशी एवं आनंद मनाते हुए नजर आए। यह सब देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा।

 

 

जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना। 

 



हमारे अंदर और बाहर का संसार भी ऐसा ही शीशमहल है जिसमें व्यक्ति अपनी सोच एवं विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग इस संसार को आनंद का लोक मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं। जो लोग इसे दुःखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुःख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता। इसलिए हम स्वयं ही अपने मित्र हैं और स्वयं ही अपने शत्रु हैं।(हिंदी साहित्य दर्पण डॉट कॉम )