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आज का लेख

जीवन का उत्सव मनायें

जीवन की यात्रा में, रोज़-रोज़ की भागदौड़, कमाने-धमाने में हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि ईश्वर की दी हुई इस ख़ूबसूरत सौग़ात का आनन्द लेना ही भूल जाते हैं। किसी से भी अगर उनका हालचाल पूँछें तो अक्सर जवाब मिलता है, "चल रहा है, कट रही है ज़िन्दगी।“ कितना अच्छा हो यदि हम हमारे जीवन को समस्याओं, परेशानियों के बावजूद एक उत्सव की तरह जिएँ। विश्वप्रसिद्ध क्लिनिकल सायकोलॉजिस्ट डॉ. गिरीश पटेल इसके लिए कुछ बहुत ही सरल उपाय सुझाते हैं।

 

(१) ख़ुश रहने की आदत डालें- छोटे बच्चे दिन में लगभग ८० बार हँसते हैं। जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं यह कम होता जाता है। तो मुस्कुराइए, छोटी छोटी बातों में ख़ुशी ढूँढिए। हँसना, मुस्कुराना तो अच्छा है ही लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है ख़ुशी को महसूस करना। जो अच्छी बातें सुनें उन्हें याद रखने की कोशिश करें। उसी वक़्त तय कर लें कि इसे हम हमारे जीवन का हिस्सा बनायेंगे। ऐसा करने पर हम पायेंगे कि हमें इसका अधिकतम फ़ायदा होगा।

(२) कृतज्ञता की वृत्ति रखें- इस पर कई शोधों के बाद पाया गया कि जिन व्यक्तियों में कृतज्ञता का भाव है वे सुखी और स्वस्थ रहते हैं। यह भावना कि लोगों ने मेरे साथ अच्छा किया है, जीवन में मुझे कई वरदान मिले हैं- यह हमें मन से बहुत ख़ुश और हल्का रखती है।

(३) जीवन एक सुपर मैगा सीरियल है- इसमें सुख-दुख आयेंगे, तकलीफें, समस्याएँ आयेंगीं लेकिन यह समझ लो कि मैं तो एक रोल निभा रहा हूँ। सिर्फ़ मैं ही नहीं, बाक़ी सब भी अपना- अपना रोल निभा रहे हैं। हमें इस रोल से डिटैच होना है। कोई बीमारी आ गई, बदनामी हो गई, कोई और समस्या आ गई तो यह डिटैच होने की प्रैक्टिस बहुत काम आयेगी। यह तैयारी पहले से ही नियमित करनी होगी।

(४) कोई भी अवस्था स्थायी नहीं रह सकती- इस बात को अच्छी तरह समझ लें। यदि अभी बहुत दुख हैं तो धीरज धरें कि आगे अच्छे दिन आयेंगे। और यदि अभी बहुत सुख है तो इसका अहंकार न करें। क़ुदरत,वक़्त एक झटके में सब कुछ बदल सकता है। इसलिए यह निश्चय रखें कि हर मुसीबत के बाद सुख आता है। सुबह की पहली किरण जब पृथ्वी पर पड़ती है उसके पहले घोर अन्धियारा होता है। हम छोटी- छोटी समस्याओं में ही उलझ जाते हैं, निराश हो जाते हैं। उस वक़्त सोचें कि मुझे मानसिक रूप से स्थिर रहना है।

(५) अपने विवेक को विकसित करना है- हमें इस बात का अहसास करना होगा कि सुख, ख़ुशी, शान्ति बाहरी वस्तुओं, व्यक्तियों या परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करते। इन्हें हम स्वयं के भीतर ही पा सकते हैं। लेकिन आज गड़बड़ यह हो गई है कि हम यह सब बाहर ढूँढ रहे हैं। हम सोचते हैं कि मुझे जो कुछ चाहिये वह सब मिल जाए तब मै सुखी होऊँगा।

(६) सन्तुष्ट होना सीखें- आज हम जो कुछ भी हैं, हमने जो कुछ हासिल किया है वहाँ एक बार सन्तुष्ट हो जाएँ। लक्ष्य भले ही बहुत बड़ा रखें पर वर्तमान में जहाँ भी हैं वहाँ सन्तुष्ट रहें। लक्ष्य हासिल करने के लिए ज़रूरी है कि हम शान्त रहें, एकाग्र रहें। तभी परिस्थितियॉं अनुकूल बनेंगीं। तो यही अनुभव करें कि आज मैं जहाँ हूँ सन्तुष्ट हूँ। जो बीत गया उसके बारे में सोचकर दु:खी नहीं होना है, न ही कोई हीनता का भाव लाना है। वर्तमान में जो क्षण है वही सत्य है। जो कुछ इस क्षण कर रहे हैं,ऐसा सोचें कि मैं इसका आनन्द ले रहा हूँ। ऐसा करने से बहुत अच्छा महसूस करेंगे। एकाग्रता और याददाश्त भी बढ़ेंगे।

(७) मन:स्थिति मज़बूत हो तो कैसी भी परिस्थिति पार हो सकती है- परिस्थितियॉं तनाव पैदा नहीं करतीं,तनाव हमारी मन:स्थिति से उत्पन्न होता है। परिस्थिति हमारे नियंत्रण में नहीं है परन्तु मन:स्थिति पूरी तरह से हमारे नियंत्रण में है। जब भी कोई समस्या हो तो शान्ति से सोचें कि वह क्या है, उसे सुलझाने के मेरे पास कौन-कौन से रास्ते हैं व इनमें से मेरे बस में क्या है? इन सब की एक फ़ेहरिस्त बनायें।हम पायेंगे कि हमें बहुत कुछ मिल जाएगा जो हम कर सकते हैं। सारा मदार हमारे नज़रिये पर है.

(८) अपने रिश्तों को मज़बूत कीजिए- ऐसा करने से व्यक्तिगत व व्यावसायिक जीवन सुधर जायेंगे। इसके लिए मेहनत लग सकती है। कुछ त्याग भी करने पड़ सकते हैं लेकिन ये ज़रूरी हैं। बिना इसके जीवन में ख़ुशी ढूँढना ऐसा ही है जैसे किसी छेद वाले बर्तन में पानी भरने की कोशिश करना।हम कितना ही घूमने- फिरने, खाने-पीने, शॉपिंग करने, टीवी- फ़िल्म आदि देखने में ख़ुशी ढूँढे लेकिन कुछ क्षणों के लिए दिल बहलने के अलावा हमें और कुछ हासिल नहीं होगा रिश्तों में यदि कड़वाहट हो तो उसके कारण की जड़ तक जायें और उसे दूर करने की कोशिश करें।

डॉ शिल्पा देसाई

 

जीवन में गुणों का महत्व

आज के समाज की ओर हम ग़ौर करे तो अधिकतम नकारात्मक पहलु दिखाई देते हैं. वे चाहे दुखद घटनाएँ,तकलीफ़ेबीमारियाँडिप्रेशन जैसे मानसिक रोग हों या फिर संबंधों में दरार आदि. उसका सबसे बड़ा कारण है जीवन में गुणों का अभाव। आज की शिक्षा प्रणालीुकेशन सिस्टएप्रणाली  शिक्षा  वर्तमान  ग़ौर करें तो आजनयीकनीकियों और विज्ञान की शिक्षाओं पर बहुत ज़ोर दिया जा रहा है। ये जानना बहुत ज़रूरी है कि जहाँ ये शिक्षा अति आवश्यक है वहीं गुणों की शिक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। देखने में आता है कि कहीं पर भी गुणों के महत्व पर ज़ोर नही दिया जा रहा है। क्यूँ हम समझते हैं कि नयी तकनीक ज़रूरी हैं इसका जवाब ज़रूर हमारे पास है और ये सही भी है कि इसके महत्व को कम नही आँका जा सकता लेकिन क्या जीवन जीते हुए जीवन के मूल्यों को कम आँका जा सकता है। नाम ही है जीवन मूल्य (गुणअर्थात् वो चीज़ जो हमारे जीवन के मूल्य यानी जीवन की क़ीमत को बढ़ायें। हर क़दम में जहाँ नयी-नयी तकनीक से जुड़ी जानकारी काम आती है वहीं हर क़दम में सहनशीलतासन्तुष्टताप्रेमआत्मसंयम,हिम्मत आदि के महत्व को कौन नकार सकता है।

आज का युवा गुणों के महत्व से अनजान राह भटक गया है। मन को सही दिशा ना मिलने के कारण भटका हुआ मन ग़लत-ग़लत काम कर रहा है और स्वयं कोपरिवार को और समाज को बहुत कष्ट पहुँचा रहा है। ऐसी अनेकानेक ख़बरों से रोज़ अख़बार भरा रहता है। यदि हमें उनके जीवन की परवाह है तो उन्हें हमें सही दिशा दिखानी ही होगी क्यूँकि वो युवा हमारे अपने ही बच्चे अपने ही मित्र सम्बंधी हैं। हम सभी जानते हैं कि युवाओं से सबकी अपेक्षाएँ चाहे मात-पिताचाहे समाजचाहे देश की बनी ही रहती हैं क्यूँकि युवा ही आने वाले समाज की नींव भी है। ऐसे में युवा को सही शिक्षा देना और ही महत्वपूर्ण हो जाता है। जैसा आज का युवा होगा वैसा हमारा आने वाला समाज होगा इतनी ज़िम्मेवारी सभी युवाओं पर है।

इस बात को जानते हुए हमें युवाओं को हर उस बात से जागरूक करवाना होगा जो हम आने वाले समाज में देखना चाहते हैं। अगर हमारी श्रेष्ठ कामना है कि आने वाला समाज व्यसनमुक्त बनेभिन्न-भिन्न घात चाहे रेप चाहे रैगिंग चाहे आत्महत्या जैसी बुराइयों से मुक्त बने तो निश्चित ही उन सबसे जुड़ी शिक्षायों से हमें उन्हें परिचित करवाना होगा तभी उनपर कंट्रोल (नियंत्रणपाना सम्भव है।

जीवन में हिम्मतदृढताआत्मविश्वासपवित्रतासच्चाईआत्मसंयमसहलशीलतासरलताख़ुशी,आत्मसम्मान आदि वो श्रेष्ठतम गुणों में से कुछ हैं जिनके बारे में जानने और उनको जीवन में आत्मसात करने का तरीक़ा (अपनाने का तरीक़ाजानने की शिक्षा से युवा अपने जीवन में बहुत उन्नती प्राप्त कर सकता हैना सिर्फ़ अपने जीवन में बल्कि ऐसा युवा ही दुनिया के लिए भी एक आदर्श बन सकता है।

वास्तव में समाज को व देश को ऐसे युवा की तलाश ही रहती है जो मूल्यवान के साथ-साथ अच्छी भौतिक शिक्षा भी प्राप्त किए हुए हो। ये दोनो ही अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं। जहाँ भौतिक शिक्षा शरीर के पालन-ोषण के लिए ज़रूरी है वहीं गुणों की शिक्षा ख़ुशी और आत्मविश्वास को क़ायम रखने के लिए परमआवश्यक है। अगर मूल्याँकन (इवैल्यूएशनकिया जाए तो दोनो का महत्व बिलकुल बराबर है।

अगर हम सिर्फ़ भौतिक शिक्षा को ही सारा महत्व देते हैं तो इसका प्रैक्टिकल रिज़ल्ट यही होता कि देश के सबसे माननीय इन्स्टिटूशन (संस्थानमें जाने के बाद भी बच्चे छोटी-छोटी बातों पर आत्महत्या जैसी घटनाओं के शिकार हो जाते हैं।

वहीं अगर हमने उन्हें हिम्मतआत्मविश्वासधीरजसदभावना जैसे गुणों की शिक्षा दी होती तो वो बात-बात में लड़ाई-झगड़ाबदले की भावनादुर्व्यवहार से घिरा नहीं रहता। लेकिन आज देखने में तो ये आता है,बहुत करके सुनने को भी मिल ही जाता है कि ये तो उलटा सुना नहीं सकता दूध का धुला है आदि आदि। आज का समाज गुणों से इतना अनजान प्रतीत होता है कि सहनशीलता और सच्चाई जैसे महान गुणों को आज कमज़ोरी माना जाता है और यही सुनने में आता है कि चुप रहने से और सच्चाई से काम नहीं चलता। क्या हम इतिहास के उन गौरवशाली हस्तियों से अपरिचित हैं जिनकी महानता का गायन हम उनके इन महान गुणों के आधार पर ही करते हैं। चाहे वो मदर टेरेसा होंमहात्मा गांधी होंगौतम बुद्धजीसस क्राइस्ट या स्वामी विवेकानंद हों। इन सभी को कभी ना कभी ग्लानि के शब्दों को सहन करना पड़ा लेकिन इन्होंने चुप्पी साधी और उस ग्लानि की परवाह किए बिना अपने लक्ष्य की और अपने सत्यता के बल से बढ़ते ही गएइसलिए आज हम उनके प्रशंसक हैं।

आख़िर कैसे सच्चाई और सहनशीलता को हम कमज़ोरी नाम दे सकते हैं। इन ग़लत मान्यताओं के कारण आज हमारा जीवन कहाँ से कहाँ पहुँच गया। हमारा देश जिसकी संस्कृति (कल्चरही देश को गौरान्वित करता था उसे ही हमने कमज़ोरी का नाम दे दिया।

वास्तव में इंसान की महिमा सिर्फ़ उसके गुणों से ही होती है। बिना गुणों के तो इंसान को इंसान का दर्जा दिया ही नहीं जा सकता। अगर हम आज के कामयाब लोगों में भी देखें तो सचिन तेन्दुलकर हो या अमिताभ बच्चनउनके बोलने से ही उनके गुण प्रत्यक्ष होते हैं। तभी हम उनकी महिमा करते हैं।

यहाँ तक कि मंदिरों में भी जिनकी हम पूजा,अर्चनावंदना कर रहे हैंउसका एकमात्र आधार उनके गुण ही तो हैं। इसलिए हम देवी-देवतायों के आगे यही गाते हैं कि आप सर्वगुण सम्पन्न हैं हमपर तरस करिए। वो इतने ऊँचे इसलिए ही हैं क्यूँकि उनमें वो गुण हैं जो हममें नहीं हैं।

यहाँ मैं अपना एक अनुभव सुनाना चाहूँगी कि युवायों की ऐसी चर्चायों में क्या प्रतिक्रिया होती है। मैं इस एप्रिल माउंट आबू थी जहाँ मुझे ओम् शांति भवन में परमात्म ज्ञान सुनाने का सुअवसर मिला। मुझे अक्सर युवाओं को भाषण करने के समय कहा जाता था कि ये रुकेंगे सुनेंगे नहीं क्यूँकि इनका लक्ष्य साइटसीइंग है। लेकिन मैं उन्हें सुनाने से पहले यही कहती थी की मुझे थोड़ा सा समय दें तो अवश्य यहाँ से आज वो प्राप्ति करके जाएँगे। वो ना सिर्फ़ समय देते थे बल्कि बहुत ध्यान से सुनते भी थे और बाद में भी चर्चा कर जीवन में कैसे अपनाए उसके प्रयास में तत्पर रहते थे। बहुत सुंदर प्रतिक्रिया देखने में आती थी।

जब चर्चा में मैं उन्हें गुणों के प्रैक्टिकल फ़ायदो के बारे में तर्कसहित (लाजिक्लीबताती थी तो उन्हें महसूस होता था कि सच में इससे हमारी उन्नति होगीहमारी ख़ुशी बढ़ेगी और हम स्वयं के प्रति भी अच्छी सोच रख पाएँगे और समाज में भी माननीय जीवन जियेंगे।

इस अनुभव के ज़रिए मैं यही कहना चाहती हूँ कि हम ये ना सोचें कि युवा इन बातों की क़दर नहीं करेगा। बिलकुल नहीं। यदि उन्हें सही रीति इस बारे में शिक्षा दी जाए तो भले कौन समाज में ऐसा होगा जो जीवन में उन्नति और संबंधों में मिठास नहीं चाहता होगा।

हम आने वाले कुछ लेखों में भिन्न-भिन्न गुणों के महत्व को समझेंगे और उन्हें जीवन में धारण करने के उपायों पर भी चर्चा करेंगे। हम अपनी ओर से ये छोटा सा प्रयास करेंगे जिससे हम सुंदर समाज और सुंदर देश बना सकें और अपने भारत देश का नाम फिर से विश्व में गौरान्वित कर सकें।

सोच बदलेगी तो जीवन बदलेगा

एक किसान शहर से दूर अपने गाँव मे रहता थावह सम्पन्न था पर अपने जीवन से खुश नहीं। एक दिन उसने निश्चय किया कि वह अपनी सारी जमीन-जायदाद बेचकर किसी अच्छी जगह बस जाएगा। अगले दिन उसने एक परिचित रियल एस्टेट एजेंट को बुलाया और उससे अपनी प्रॉपर्टी बेचने की इच्छा जाहिर की। एजेंट को अपनी समस्याएँ गिनायीं- ये उबड़-खाबड़ रास्ते देखो, यह झील देखो, जिसके चक्कर में घूम कर रास्ता पार करना पड़ता है। इस छोटे-छोटे पहाड़ों पर जानवरों को चराना मुश्किल है। यह बगीचा देखो। आधा समय इसकी सफाई और रखरखाव में चला जाता है। मुझे बस इसे बेचना है। एजेंट ने इलाके का जायजा लिया और कुछ दिन बाद किसी ग्राहक के साथ आने का वादा किया। दो दिन बाद किसान सुबह का अखबार पढ़ रह था कि शायद किसी अच्छी प्रॉपर्टी का पता चल जाए, जहां वह सब बेचकर जा सके। तभी उसकी नज़र एक विज्ञापन पर पड़ी- “लें सपनों का घर, एक शांत मनोरम जगह, प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर जगह पर बसाएं अपना सुंदर आशियाना”। संपर्क करें- …… ………….

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कैसे बनी ईश्वरीय पाठशाला

 

मनहरण अब युवा हो चला था। वह घोर जंगल गुढ़वा का रहने वाला कंवर जाति का आदिवासी है। जहां सिद्ध-बाबा के नाम पर शिव मंदिर तथा पानी का झरना भी है। यह नगरदा मुख्य गांव से किलोमीटर की दूरी पर है। गांव का वातावरण एकांत और शांतमय है। मनहरण कालेज की पढ़ाई के लिये चांपा आया और परीक्षा देकर सीधा मामा गांव सरईडीह आ गया। उसने देखा कि गांव का आलम कुछ ओर ही है। गांव के कुछ लोग पास के गांव पकरिया में कथा सुननेएक पंडितजी घसियागिरि के घर जाते हैं। वहां पास के ही गांव सरगबूंदिया से चकबंदी अधिकारी निरंजनलाल साहू जी आते थे।

जिन्हें बिलासपुर में प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय का परिचय और ज्ञान मिला था। यह बात सन् 1989 की है। मनहरण को ज्ञान की पिपासा तो पहले से ही थी और उसे लगा कि भगवन इस धरा पर आकर सच्चा गीता का ज्ञान दे रहें हैं। फिर क्या था उसने गांव में ज्ञान देना प्रारम्भ किया तो गांव की आधी आबादी को शिव-कथा सुनने लगी। कथा सुनने वालों का उठना-बैठनाखाना-पीना रहन-सहन सब कुछ बदल गया।

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किसी भी सत्ता का अनुसरण न करें

 

किस भी सत्ता / प्रभुता का अनुसरण ना करें. किसी भी सत्ता के अनुयायी ना बने. प्रभुता या सत्ता ही शैतानियत है. सत्ता तबाह कर देती है, विकृति लाती है, भ्रष्ट करती है; और जो व्यक्ति सत्ता का अनुसरण कर रहा है स्वयं का विनाश तो कर ही रहा है वह उसको भी नष्ट कर देता है जिसे कि वह सत्ता या प्रभुता की गद्दी पर विराजमान करता है. जैसे अनुयायी नेता को नष्ट कर देते हैं वैसे ही नेता भी अनुयायियों को नष्ट कर देता है । जैसे शिष्य गुरू को नष्ट कर देते हैं वैसे ही गुरू भी शिष्यों को नष्ट कर देते हैं।

सत्ता से आप कभी भी कुछ भी हासिल नहीं कर सकते. सत्य या हकीकत की खोज के लिए आपको सत्ता से पूरी तरह मुक्त होना होता है. सबसे मुश्किल बातों में से एक यह है कि — सत्ता से मुक्त हुआ जाये, बाहरी सत्ता से भी और भीतरी सत्ता से भी. भीतरी सत्ता है अनुभवों की चेतना, ज्ञान की चेतना. और बाहरी सत्ताएं हैं राज्य, पार्टियॉं, समूह संप्रदाय, समुदाय.. एक वो व्यक्ति जिसे कि सच की खोज करनी है, सच का पता लगाना है उसे इन सारी भीतरी और बाहरी सत्ताओं / प्रभुताओं से अलग रहना होता है. तो यह न कहिये कि क्या सोचना है / पठन पाठन या पढ़ने का यही अभिशाप है कि दूसरे के शब्द ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

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अपने कर्मों की संभाल करे

हमारा जीवन सीमित है । गिने हुए घंटे और मिनट उपलब्ध हैं । हमारे जीवन का हमें मालूम है, और हमारी मौत पहले से ही तय है । तो यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपना समय कैसे प्रयोग करते हैं । अगर हम अपना समय व्यर्थता में, ऊबने में, और उलझन में बिता देते हैं तो हमें अहसास करना चाहिए कि यह बीता हुआ समय हमें फिर से वापिस नहीं मिलेगा । अत्यावश्यकता का भाव उजागर करके मैं तनाव पैदा नहीं कर रही हूँ लेकिन मैं स्वयं से भी बार बार पूछती हूँ, कि मैं अपना समय उपयुक्त तरीके से प्रयोग कर रही हूँ या नहीं?

जब हमें पार्टीयों और धर्मार्थ संगठनों में निशुल्क भोजन परोसा जाता‍ है, तो यह हमारा कर्तव्य है कि हम उस भोजन को व्यर्थ जाने न दें । हम अपनी प्लेटों को भोजन से पूरा भर लेते हैं और उसको आधा फेंकना कितना आसान लगता है । उस भोजन को कैसे कमाया गया था? कड़ी मेहनत और पसीना बहाकर । हमें भोजन के लिए प्रेम और आदर का भाव जाग्रत करने की आवश्यकता है, जो धरती माँ हमें निशुल्क देती है । अगर मैं उस भोजन को फेंक देती हूँ तो ना केवल वह कूड़ेदान में जाता है बल्कि वह मेरे कर्मों के भार को बढ़ा देगा । अगर मैं इस भोजन को अपने साथ ले जाऊँ और इसे बाद में खा लूँ या किसी और को दे दूँ जिसे इसके महत्व का मालूम हो तो मैंने एक पुण्य का कार्य कर दिया है ।

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आसमानी हवन के साथ दुनियावी सत्संग

नि:शब्दता को जब शब्द पर सवार होने की आवश्यकता पड़ती है तो उसे किसी अघोरी की काया से भी गुज़रना पड़े तो हिचकता नहीं है...

रूपांतरण की चरम सीमा पर आकर नीरवता का आकाश छन्न से टूट कर धरती पर बिखर जाता है जिस पर चलकर कोई तपस्वी अपनी पूर्णता के साथ प्रकट होता है और आसमानी हवन के साथ शुरू होता है दुनियावी सत्संग ......

ऐसे ही किसी पल में जन्मों से सुषुप्त अवस्था में पड़े चक्र अंगड़ाई लेकर जागृत होते हैं और संगीत और साहित्य की ऊंगली थामे चल पड़ते हैं अपनी संभावित यात्रा पर......... अध्यात्म के टीले पर एकांकीपन को टिकाकर कोई दबे पाँव आता है मैदानों में और भीड़ का चेहरा बन जाता है...

ये जो भीड़ की आग बड़ी बड़ी लपटों के बावजूद किसी योगी के अल्पविराम पर आकर रुक जाती है ... यही वो समय होता है जब उस आग से कर्मों की हिसाबी किताब को मुखाग्नि देकर साक्षी भाव की कर्मठता को क्रियान्वित कर दिया जाए...

जब ये सबकुछ महसूसना पर्याप्त हो जाए और लगे कि दुनिया की छाती को चीरकर उसकी धड़कन में उस एहसास को भर दें, तब किसी की कलम में शब्दों का स्पंदन उतरता है जो आँखों से गुज़रते हुए ॐ की ध्वनि में तब्दील हो जाता है जहां देखना और सुनना भले दो क्रियाएँ हो लेकिन महसूस एक ही होता है...  नाद ब्रह्म...

एक ऐसे ही योगी के बारे में हम बात करेंगे जिनकी पुस्तक का नाम है "हिमालयवासी गुरु के साए में: एक योगी का आत्मचरित श्री एम"

चलिए यात्रा शुरू की जाए.

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यज्ञ है परिवर्तन का

 

 बहुत समय पहले की बात है गंगा नदी के किनारे पीपल का एक पेड़ था. पहाड़ों से उतरती गंगा पूरे वेग से बह रही थी कि अचानक पेड़ से दो पत्ते नदी में आ गिरे.

एक पत्ता आड़ा गिरा और एक सीधा. 

जो आड़ा गिरा वह अड़ गया, कहने लगा, “आज चाहे जो हो जाए मैं इस नदी को रोक कर ही रहूँगा…चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए मैं इसे आगे नहीं बढ़ने दूंगा.” 

वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा – रुक जा गंगा ….अब तू और आगे नहीं बढ़ सकती….मैं तुझे यहीं रोक दूंगा! 

पर नदी तो बढ़ती ही जा रही थी…उसे तो पता भी नहीं था कि कोई पत्ता उसे रोकने की कोशिश कर रहा है. पर पत्ते की तो जान पर बन आई थी..वो लगातार संघर्ष कर रहा था…नहीं जानता था कि बिना लड़े भी वहीँ पहुंचेगा जहाँ लड़कर..थककर..हारकर पहुंचेगा! पर अब और तब के बीच का समय उसकी पीड़ा का…. उसके संताप का काल बन जाएगा. 

वहीँ दूसरा पत्ता जो सीधा गिरा था, वह तो नदी के प्रवाह के साथ ही बड़े मजे से बहता चला जा रहा  

“चल गंगा, आज मैं तुझे तेरे गंतव्य तक पहुंचा के ही दम लूँगा…चाहे जो हो जाए मैं तेरे मार्ग में कोई अवरोध नहीं आने दूंगा….तुझे सागर तक पहुंचा ही दूंगा.”

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खुशी कहां है - बी के अनुभा

आज हर व्यक्ति खुशी की तलाश में है। खुशी कहां है? अगर किसी भूखे से पूछा जाये तो कहेगा कि रोटी में हैं किसी विद्यार्थी से पूछा जाये तो कहेगा कि प्रथम आने में है। किसी बेरोजगार से पूछा जाये तो कहेगा कि नौकरी में हैं। किसी बीमार से पूछा जाये तो कहेगा कि स्वस्थ होने में हैं। इसका अर्थ तो यह हुआ कि जिनके पास अच्छा भोजन है या अच्छी नौकरी है या जो स्वस्थ हैं या सफल हैं, वे बहुत खुश होने चाहिए। परंतु अनुभव से हम सब जानते हैं कि उनके लिए खुशी किसी अलग जगह है और खुश न होने की कोई अलग वजह है। खुशी के मार्ग में अपनी इच्छायें ही बड़े अवरोध बन जाती हैं। यह मिल जाए, ऐसा हो जाए तो ही मैं खुश रहूंगा, ऐसी कडी शर्त खुशी के लिए लगा दी जाती है। जबकि सच्चाई यह है कि यदि हम खुश रहेंगे तो जो चाहते हैं, वह मिल ही जायेगा, हो ही जायेगा। जी हां, यही सत्य है कि खुशी में सफलता है। जब हम खुश रहते हैं तो हमारे भीतर जो आन्तरिक आलस्य है, वह समाप्त हो जाता है। हमारी सूक्ष्म शक्तियां और क्षमताएं क्रियाशील हो जाती हैं और हम कर्मठ हो जाते हैं। यह कर्मठता हमारी सफलता को सुनिश्चित करती हैं। हमारी खुशी सकारात्मकता को हमारी ओर उत्प्रेरित करती हैं और सकारात्मकता सफलता को उद्दीप्त करती है। रिसर्च से साबित हुआ है कि जो लोग खुश रहते हैं, वे प्रायरू सफल होते हैं।

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