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आज का लेख

अनूठा व्यक्तित्व अल हिलाज मंसूर

मंसूर जैसी स्थिति के शख्स के लिए परमात्मा एक उर्जा है। बुद्ध की स्थिति वाले व्यक्ति के लिए परमात्मा, परम् चैतन्य है। जीसस के लिए परमात्मा, प्रेम है। वह एक व्यक्ति नहीं है...

अल हिलाज मंसूर को कत्ल किये जाने से नौ वर्ष पूर्व ही कारागार में बंदी बनाकर डाल दिया गया था। और वह अत्यधिक प्रसन्न था क्योंकि उसने नौ वर्षों का उपयोग निरंतर ध्यान करने में किया। बाहर तो वहां हमेशा शोर व्यवधान, मित्र-शिष्य समाज, संसार और हजारों चिंताएं थी। वहां बहुत प्रसन्न था। जिस दिन उसे कारागार बंद किया गया, उसने हृदय से इसके लिए परमात्मा को धन्यवाद दिया। उसने कहा-तू मुझसे इतना अधिक प्यार करता है, तभी तो तूने संसार भर से मुझे बचाने के लिए ही इतनी ऐसी सुरक्षा दी है कि वहां अब तेरे और मेरे सिवा और कुछ भी नहीं बचा। तभी तो वैसा मुझे घटा, तभी तो उस मिलन में पिघल कर मैं पूरी तरह से मिट गया।

वे नौ वर्ष अत्यधिक तल्लीनता के वर्ष थे। और उन वर्षों के बाद आखिर यह तय किया गया कि उसे कत्ल किए जाना है,क्योंकि इस सजा से वह जरा भी तो नहीं बदला, बल्कि उसके विपरीत वह उसी दिशा में और अधिक आगे बढ़ गया। उसके आगे बढ़ने की दिशा थी कि उसने यह घोषणा करना शुरू कर दिया-‘मैं ही परमात्मा हूं-अनअलहक। मैं ही सत्य हूं। मैं ही अस्तित्व हूं।’ उसके सदगुरु अल जुन्नैद ने कई तरह से उसे समझाने की कोशिश की-‘तू इस तरह की चीजों की घोषणा मत कर, उस बात को अपने अंदर ही रख, क्योंकि लोग उसे नहीं समझेंगे और तू अनावश्यक रूप से मुसीबत में पड़ जायेगा।’

लेकिन यह मंसूर के वश के बाहर की बात थी। वह जब भी उस विशिष्ट दशा में होता था, जिसे सूफी ‘हाल’ कहकर पुकारते हैं-वह जब भी इस स्थिति में होता था, वह नाचना और गाना शुरू कर देता था। और वे वाक्य अथवा उसका गाना या कुछ भी कहना, अतिरेक से छलकते उद्गार थे, जिन पर नियंत्रण करने वाला कोई था ही नहीं, सारा नियंत्रण जाता रहा था। जुन्नैद उसकी स्थिति को समझता था, लेकिन वह दूसरे लोगों की भी चित्त दशा को भली-भांति  जानता था कि देर-सबेर मंसूर को धर्म विरोधी समझा जावेगा। उसकी घोषणा-‘‘मैं ही परमात्मा हूं’’ एक तथ्य था, उसके पीछे उसका अनुभव ही यह घोषणा कर रहा था, लेकिन लोग उसे नहीं समझ सके। उन लोगों ने उसे उसका दम्भ और अहंकार समझा और फलस्वरूप परेशानी खड़ी हो गई। और उसे सजा देने का क्षण आ पहुंचा।

नौ वर्षों के बाद उन लोगों ने यह निर्णय किया कि इस बीच यह शख्स जरा भी नहीं सुधरा, और वास्तव में गहरे में उसका पागलपन और अधिक बढ़ गया है। अब तो वह निरंतर अनअलहक मैं  ही सत्य हूं की घोषणा कर रहा था। इसलिए अंतिम रूप से यह निर्णय लिया गया कि उसे फांसी पर लटका दिया जाये, उसे मृत्युदण्ड दिया जाये। 

जब वे लोग उसे कारागार की कोठरी से बाहर निकालने के लिए गए, तो बहुत मुश्किल उत्पन्न हो गई-क्योंकि वह ‘फना’ की रहस्यमय स्थिति में डूबा हुआ था।  अब वह एक व्यक्ति नहीं रह गया था, वह केवल शुद्धतम उर्जा का पुंज था। उस शुद्ध उर्जा-पुंज को बाहर घसीट कर कैसे लाया जाये? जो लोग उसे बाहर निकालने गये थे वे हतप्रभ और मूक बने रह गये। उस अंधेरी कोठरी में जो कुछ घट रहा था, वह इतना अधिक अद्भुत था, वह इतना अधिक प्रकाशवान था कि मंसूर को चारों ओर से इस संसार का नहीं, जैसे कोई दैवी आभा मंडल घेरे हुए था। मंसूर वहां एक व्यक्ति की भांति मौजूद नहीं था। सूफि़यों के पास इस स्थिति के लिए इस बारे में दो शब्द हैं-एक है ‘बक़ा’ और दूसरा है ‘फ़ना’,। ‘बका’ का अर्थ होता है कि तुम अपनी अस्मिता को सीमाबद्ध कर रहे हो, तुम अपने चारों ओर परिभाषा खड़ी कर रहे हो, तुम्हारे पास  एक सीमा रेखा है जो यह इंगित करती है कि यह तुम हो। ‘फना’ का अर्थ है कि तुम अब पिघल कर परमात्मा में घुल गये और तुम्हारी कोई परिभाषा, या सीमा बद्धता ही नहीं रही। बक़ा एक ‘बर्फ’ के क्यूब की भांति है, और फ़ना की स्थिति है-पिघले हुए बर्फ क्यूब की, जो नदी में घुल कर उसके साथ एक हो गया। 

रहस्यदर्शियों के साथ ऐसा निरंतर घटता रहता हैः वे ‘बक़ा’ से ‘फ़ना’ में और ‘फ़ना’ से ‘बक़ा’ की स्थिति में आते-जाते रहते हैं। ये लगभग दिन और रात की तरह होता हैं। धीमे-धीमे इस बारे में एक तरह की लयबद्वता आ जाती है। कभी तुम उस रहस्यदर्शी को बक़ा की स्थिति में पाओगे-और जब तुम उसे बक़ा की स्थिति में पाओगे तो तुम उसमें एक ऐसी सर्वाधिक अनूठी वैयक्तिकता  देखोगे, जो उससे पूर्व कभी न देखी होगी। बक़ा की उस स्थिति में वह अनूठी वैयक्तिकता बहुत मौलिक, बहुत पवित्र और प्रतिरोध रहित निर्मल होगी। वह आकाश के विरूद्ध खड़े एक ऊंचे पर्वत-शिखर की भांति होगी,अथवा काली अंधेरी रात में जगमगाते हुए एक सितारे की भांति-इतनी अधिक स्पष्ट, इतनी अधिक सभी से अलग और एक विशिष्ट व्यक्ति की भांति होगी। बक़ा का यही अर्थ होता है- व्यक्तिगत रूप से एक विशिष्ट व्यक्तित्व।

सामान्य संसार में तुम ऐसे विशिष्ट व्यक्तियों को न खोज सकोगे। इस स्थान पर लोग तो बहुत हैं, लेकिन ऐसे विशिष्ट व्यक्तित्व नहीं हैं। लोग तो बहुत हैं, लेकिन ऐसी वैयक्तिकता वाले व्यक्ति नहीं है। यहां एक ऐसा व्यक्ति है जिसके पास अपनी कोई वैयक्तिकता नहीं हैं। वह भीड़ का एक गुमनाम भाग है, वह उसी तरह जीता है, जैसे भीड़ के अन्य सभी लोग जीते हैं, वह उन्हीं लोगों की तरह बातचीत करता है, वह उन्हीं की तरह भोजन करता है, वह उसी तरह फिल्म देखने जाता है, जैसे वे सभी लोग जाते हैं, वह वैसे ही कार खरीदता है। जैसे वे खरीदते हैं, वह वैसे ही घर बनाता है, जैसे वे बनाते हैं-वह निरंतर उन सभी लोगों का, जनसमूह का, अर्थात् भीड़ का अनुसरण कर रहा है। वह स्वयं में स्थित नहीं है, वह बहुत बड़ी उलझन में पड़ा हुआ है। उसकी सीमा रेखाएं बेतरतीब और अव्यवस्थित हैं। वे सीमा-रेखाएं वहां हैं तो, लेकिन वे गडडमडड हैं, वे जरा भी स्पष्ट नहीं हैं। यदि तुम उसके अंदर झाँको, तो तुम उसे वहां नहीं पाओगे। तुम वहां परिवार व समाज द्वारा थोपे गए नियमों और अनुशासन से निर्मित आदतों से निर्मित एक ढांचे अर्थात् कंडीशनिंग की पर्त पाओगे। वह एक मुसलमान होगा, क्योंकि उसका जन्म एक मुसलमाना के घर में हुआ है। वह गीता के पाठ को दोहरा रहा होगा, क्योंकि उसके पिता के पिता भी ऐसा ही किया करते थे। युगों-युगों से वे उसका पाठ करते आये हैं, इसलिए वह भी उसका पाठ कर रहा है। यह सभी कुछ एक संयोग जैसे ही प्रतीत होता है, इसके पास अपना कोई अनूठापन नहीं है। वह भीड़ भरे समाज को केवल एक भाग है। वह उसी तरह जीता है, जैसे वे लोग जीते हैं, वह उसी तरह मर जाता है, जैसे वे लोग मरते हैं। वह उनका ही जीवन जीता है और उनकी ही मौत की तरह मरता है। वह कभी भी अपने अधिकार का स्वयं अपने होने का दावा नहीं करता, वह कभी भी विद्रोह नहीं करता। सामान्य मनुष्य की यही स्थिति है और यही उसका सामान्य व्यक्तित्व है। यह कोई वैयक्तिकता है ही नहीं।

निजता और वैयक्तिकता का उदय केवल तभी होता है, जब तुम बहुत स्पष्टवादी और निर्मल होते हो। जब तुम अपने अपनी आत्मा के मौलिक चैतन्य रूप को उपलब्ध होते हो। जब तुम अपना ही कार्य करते हो। जब तुम इस  बात की जरा भी चिंता नहीं करते कि दूसरे लोग क्या कहते हैं, जब तुम अपनी स्वतंत्रता के लिए अपना पूरा जीवन बलिदान करने को तैयार होते हो। जब स्वतंत्रता तुम्हारे लिए सर्वोच्च तथा अंतिम मूल्य बन जाती है और कोई भी चीज कुछ भी अर्थ नहीं रखती तुम्हारे लिए, तभी तुम अपनी निजता में ‘बक़ा’ की स्थिति को प्राप्त करते हो। और यह भी विरोधाभास है, केवल विशिष्ट व्यक्ति ही ‘फ़ऩा’ में पूरी तरह पिघलने, मिट जाने और पूर्ण विलुप्त होने की स्थिति में जा सकता है। 

पहिले तुम्हें स्वयं में होना होगा, केवल तभी तुम विलुप्त हो सकते हो। यदि तुम हो ही नहीं, तब कौन जा रहा है विलुप्त होने? पहिले तुम्हें स्वयं को भीड़ से मुक्त करना होगा, केवल तभी तुम छलांग लगा सकते हो। इसलिए विरोधाभास यही है,कि जो व्यक्ति बक़ा की स्थिति में हो, केवल  वही फ़ना की स्थिति में जा सकता है।

समूह में रहने वाला सामान्य मनुष्य फ़ना की स्थिति में नहीं जा सकता, क्योंकि वह यह जानता ही  नहीं कि वह कौन है,उसके पास अभी तक न तो कोई पता है, और न उसके पास अभी तक कोई नाम है और न कोई पहिचान है। वह भीड़ में केवल एक संख्या की भांति है। उसकी आसानी से हटाकर उसके स्थान पर दूसरे व्यक्ति को रखा जा सकता है, और उसे बदला जा सकता है। वह एक विशिष्ट तरह के कार्य करने वाला एक भाग है। वह एक कर्मचारी है। उदाहरण के लिए वह एक इंजीनियर हो सकता है। यदि उसकी मृत्यु हो जाती है, तुम उसके स्थान पर वहां दूसरे  इंजीनियर रख सकते हो और कोई भी उसके अभाव का अनुभव नहीं करेगा। अथवा वह डॉक्टर  हो सकता है। यदि वह मर जाता है तुम उसके स्थान पर वहां दूसरे डॉक्टर को बैठा देते हो, और कोई भी व्यक्ति उसके अभाव का अनुभव नहीं करेगा। वह बदले जाने  भाग या पुर्जे की तरह है, वह एक ड्यूटी निभाने वाला कर्मचारी है। 

लेकिन वह व्यक्ति, जो ब़का की स्थिति में होता है, वह एक कर्मचारी की भांति नहीं होता, उसके पास, उसके अस्तित्व में एक पूरी तरह से भिन्न गुणात्मकता होती है। उसके अभाव को हमेशा के लिए महसूस किया जाता रहेगा। एक बार यदि वह चला गया, तो तुम उसके स्थान पर दूसरे व्यक्ति न पा सकोगे। तुम जीसस के स्थान पर दूसरा जीसस नहीं पा सकते। तुम वेटिकन के पोप के स्थान पर बदल कर दूसरा पोप रख सकते हो और जिसे तुमने कई बार बदला भी है। हर बार जब एक पोप मर जाता है, उसके स्थान पर दूसरा आ जाता है। तुम बहुत आसानी से पुरी के शंकराचार्य को बदल सकते हो, इस बारे में कहीं कोई समस्या ही नहीं है। एक शंकराचार्य के स्थान पर दूसरे नहीं बदल सकते। तुम जीसस को बदल कर  दूसरा जीसस नहीं ला सकते, तुम दूसरा मुहम्मद बदल कर नहीं ला सकते। एक बार वह चले गये, तो वे हमेशा के लिए चले गये। वे एक अनूठी निजता को लेकर अस्तित्व में रहे-और यही स्थिति होती है बक़ा की। और केवल ऐसे ही लोग फ़ना की स्थिति में जाने में समर्थ हैं। यह विरोधाभासी दिखाई देता है, क्योंकि फ़ना का अर्थ है तुम अपनी पूरी छवि और अपना पूरा अस्तित्व खो रहे हो।

लेकिन पहिले तुम्हारे पास खोने के लिए वह अस्तित्व तो होना चाहिए। यदि वह तुम्हारे पास है ही नहीं, तो तुम उसे कैसे खो सकते हो? तुम उसका त्याग कैसे कर सकते हो, यदि वह तुम्हारे पास है ही नहीं। इसलिए विरोधाभास, प्रत्यक्ष रूप से ऐसा आभास होता है। इसके पीछे एक बहुत बड़ा सार्वभौमिक नियम काम कर रहा है। पहिले तुम्हारे पास गिराने या छोड़ने के लिए कुछ पूंजी अपने पास होनी चाहिए। पहिले उसे एक साथ इकट्ठा करो। उसे एक साथ इकट्ठा करना होता है, तभी आता है मौन। पहिले उसे एक साथ एक स्थान पर इकट्ठा करो, उसका एकीकरण करो, बका बनो, और तभी तुम फ़ना में जा सकते हो।

यह शख्स मंसूर, एक अनूठी वैयक्तिकता का मालिक बना। वहा जहां कहीं भी गया, तुरन्त उसे पहिचान लिया गया। उसकी ओर दृष्टि न जाना, उससे चूकना असंभव था। वह भारत भी आया वास्तव में उसके सदगुरु अल जुन्नैद ने उससे कहाः तुम्हारे लिये अच्छा यही है कि तुम दूसरे देशों में जाकर रहो, अन्यथा यहां तुम पकड़ लिये जाओगे।  इसलिए दूर-दूर देशों तक उसने यात्राएं की। प्रत्येक जगह वह तुरन्त पहिचान लिया गया। वह सम्राटों का सम्राट था। तुम उसकी ओर देखे बिना रह ही नहीं सकते थे। यदि वह दस हजार लोगों की भीड़ में भी खड़ा हुआ था, तब भी तुम उसे देख और पहचान सकते थे। वह बक़ा की स्थिति में था, वह स्फटिक या बिल्लौर की भांति स्पष्ट था। उसकी उपस्थिति अत्यधिक, सघन, और विरल थी। एक बार तुमने उसकी ओर देख लिया, तो अन्य सभी व्यक्तियों के चेहरे पीले, फीके और सपाट दिखाई देने लगते थे। इसलिए देर-सबेर वह हर जगह पहिचान लिया गया और उसे उस देश को छोड़ कर जाना पड़ा, क्योंकि समस्याएं खड़ी होने लगी।

वह मध्य पूर्व के कई देशों में गया, लेकिन वह जहां कहीं भी गया, कुछ दिनों तक तो सभी कुछ ठीक-ठाक रहा-वह वहां बिना पहिचाने रहता रहा -लेकिन अधिक समय तक नहीं। इसलिए अंत में वापस आकर उसने सद्गुरु जुन्नैद से कहा-’’यह अब निरर्थक हो गया है। मैं हर जगह पकड़ा जा सकता हूं, इसलिए यहीं क्यों नहीं?’’ 

जब इस शख्स को कैदखाने की कोठरी से बाहर लाने का प्रयास किया गया , तो जो अधिकारी उसे बाहर ले जाने के लिए आये थे, वे उसे कोठरी में खोज ही नहीं सके, कि वह वहां है कहां? वह वहीं था। पूरी तरह से वहीं था, क्योंकि पूरी कोठरी उसकी दीप्ती; उसकी उपस्थिति से आलोकित थी। वह उपस्थिति बहुत सघन थी, पर फिर भी अव्याख्य! वे लोग कोठरी में प्रवेश ही नहीं कर सके। वे लोग भय से स्तब्ध, आश्चर्य चकित होकर खड़े सोचते रहे-आखिर क्या करना चाहिए? अंत में साहस जुटाकर उन्होंने उसे खींच कर बाहर लाने का प्रयास किया, लेकिन ऐसा करने में वे सफल न हो सके। तब इस बारें में केवल एक ही रास्ता थाः उसके सद्गुरु अल-जुन्नैद से कहा गया कि वह आकर उनकी सहायता करे, क्योंकि समय गुजरता जा रहा था और उन्हें मंसूर को फांसी पर चढ़ाना था और वे उसे बाहर भी नहीं निकाल पा रहे थे।

अल जुन्नैद आया और उसने कहाः ‘‘मंसूर अब मेरी बात सुनो। मैंने अनेक बार तुमसे कहा कि अब तुम अपने को अल्लाह के सुपुर्द कर दो। यदि वह चाहता है कि तुम सूली पर चढ़ो तो सामान्य होकर सूली पर चढ़ जाओ। उसे अपना काम पूरा करने दो। अब बहुत हुआ, यह यथेष्ट है।’’ और जब अल जुन्नैद ने चिल्ला कर कहा तो मंसूर ‘फना’ की स्थिति में वापस लौटा। अब फिर से वहां एक सीमा रेखा दिखाई दी, अब वह एक उर्जा का बादल न रहा, वह ठोस और सघन बन गया। उसके शरीर की सीमाएं प्रकट हुई। उसका सदगुरु आ पहुंचा था और उसे अपने सदगुरु की बात सुननी ही थी।

तब उसे कत्लगाह तक ले जाया गया। लेकिन उसे मारना बहुत कठिन था उसके शरीर पर तलवार के प्रहारों से एक हजार घाव हो गए-लेकिन वह फिर भी जीवित था। तब उन्होंने उसके एक-एक अंग को काटना शुरू किया, लेकिन वह फिर भी जीवित था-क्योंकि कत्लगाह पर वह फिर ब़का की स्थिति से फ़ना की स्थिति में चला गया। वह फिर से परमानंद में,परमात्मा की उस उर्जा में लीन हो गया।

मंसूर जैसी स्थिति के शख्स के लिए परमात्मा एक उर्जा है। बुद्ध की स्थिति वाले व्यक्ति के लिए परमात्मा, परम् चैतन्य है। जीसस के लिए परमात्मा, प्रेम है। वह एक व्यक्ति नहीं है। यह तीन ‘एल’, ‘लव’(प्रेम), ‘लाइफ’ (जीवन) और ’लाइट’ (प्रकाश) सीखने जैसे हैं। परमात्मा प्रेम, जीवन और प्रकाश है। तुमने तीन ‘आर’ के बारे में सुना होगा। यह तीन ‘आर’ तुम्हें सम्य बनाते हैं और यह तीन ‘एल’ तुम्हें धार्मिक बनाते हैं।

और अधिक जीवंत बना-इतने अधिक जीवंत कि तुम जीवन के साथ एक हो जाओ। और तब प्रेम को उमगने दो, वह इतना अधिक हो जाए, कि उसका प्याला छलकना शुरू हो जाए। तब तुम सीमाओं को अतिक्रमण कर देते हो। तब तुम्हीं में से एक नई तरह का प्रकाश झरना शुरू हो जाता है, तुम दीप्तिवान हो उठते हो। ये तीन ‘एल’ सीखने जैसे हैं, और वे तीन आर भुलाने  हैं।

सूफी धर्म का पूरा तत्वज्ञान उस परमात्मा तक पहुंचना है, जिसकी कोई भी धारणा नहीं है और जो एक ब्रह्याण्डीय उर्जा जैसा है। लेकिन हम सभी की उसके बारे में अपनी-अपनी धारणाएं है और सभी धारणाएं और विचार बचकाने हैं, अपरिपक्व हैं। परमात्मा को किसी विचार या धारणा में आबद्ध नहीं किया जा सकता।

हमारे पास दूसरो के द्वारा  ही दिये गए विचार और धारणाएं हैं और हमने उन्हें सीखा हुआ है। वे सभी साधारणा जन समूह द्वारा दिये गये संकेत और सुझाव हैं, और इन विचारों को  तुम्हारे मन में ठूस दिया गया है। ईसाइयों की धारणा है कि वह एक सफेद दाढ़ी वाला बूढ़ा व्यक्ति है। वह देखने में बहुत प्राचीन लगता है, और वह चारों ओर से फरिश्तों से घिरा हुआ स्वर्ण-सिंहासन पर बैठा हुआ पूरे संसार को नियंत्रित कर रहा है। इसमें गलत कुछ भी नहीं है, पर इसमें कोई भी चीज ठीक भी नहीं है। छोटे बच्चों के कौतूहल को संतुष्ट करने के लिए तो यह ठीक है, क्योंकि बच्चों को भी परमात्मा के बारे में किसी विचार या धारणा की आवश्यकता होती हैं, लेकिन इस बचकानेपन से प्रत्येक व्यक्ति को विकसित होना होता है।

-ओशो
पुस्तकः अभी, यहीं, यह
 से संकलित

 

मन को साधने की कला है योग

ए के रावल योगाचार्य

मन ही ईश्वर

मन से बड़ा न कोय

तोरा मन दर्पण कहलाय

 बड़ा ही मधुर गीत है। पर मन क्या हैं? यह एक बहुचर्चित विवादास्पद मामला है। अंग्रेजी में मन माइंड होता है। हिंदी में माइंड मस्तिष्क या दिमाग होता हैं। भारतीय संस्कृति में मन हमेशा चर्चा का विषय रहा है। प्रत्येक जीव ईश्वर की संतान है। हर एक में उसकी छवि विद्यमान है। प्रत्येक मन में इसकी सत्ता का आभास है। आधुनिक सेटेलाइट्स के युग में जहां मनुष्य ने आधुनिकतम विकास के रास्तों को अपनाया है, सूचनाओं का अंबार उसके पास है। वहीं मानसिक शांति का अभाव, मन की भटकन परिणामस्वरूप पाई हैं। उदाहरणार्थ एक कुआं या कोई भी जल स्थान है। यदि पानी स्थिर हो तो नीचे पैंदे तक स्पष्ट दिखता है, लेकिन यदि एक पत्थर डाल देंगे तो सब कुछ हिल जाएगा और कुछ भी स्पष्ट नहीं दिखेगा। ठीक यही दशा चित्त की है। यदि मन अशांत है तो व्यक्ति निर्णय नहीं ले पाता। अस्पष्टता और अनिर्णय की स्थिति में उसे बेचौन रहना पड़ता है। यही बेचौनी और अनिर्णय कई बार मनुष्य को अपराध और बुरे व्यसनों की ओर ले जाते हैं। जब भी कोई बुरा काम होता हैं तब सर्वप्रथम मन ही रोकता है। इसी भाव को इस गीत में बहुत ही सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया गया हैं।

 

इतनी शक्ति हमें दे न दाता

मन का विश्वास कमजोर हो ना

 हम चलें नेक रास्ते में

 हम से भूलकर भी कोई भूल हो ना।

 योग का अर्थ है चित्त वृत्ति निरोध, चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण अर्थात मन के घोड़े पर काबू करना सीखाता है योग। मन को साधने के लिए ऋषियों ने कई उपाय बताए हैं। अब आपके मन में प्रश्न आ सकता है हम इतना फ्लैश बैक में क्यों जा रहे हैं पर आधुनिक प्रतिस्पर्धा के युग में हमें अपने तन और मन दोनों को तंदुरूस्त रखकर आगे बढना पड़ता है तब कहीं सफलता के दर्शन होते हैं। मनिषियों ने मन पर नियंत्रण का जो सर्वसुलभ और सरल साधन बताया है उसी का आधुनिक रूप है योग। योग का और आधुनिकीकरण योगा के रूप में हो गया है। जब योग विदेशों से योगा बन कर लौटा तब हमने उसकी अहमियत को पहचाना। कहा गया है स्वस्थ्य शरीर में ही स्वस्थ्य आत्मा का निवास होता है और मन के हारे हार, मन के जीते जीत।

 अतरू यदि हमारे तन और मन डोल रहे हैं और हमारे दिल को कटार (चौन )नहीं है तो सफलता संभव नहीं। मन को एकाग्र करना अत्यंत आवश्यक है पर अत्यंत मुश्किल भी । आज मनोरोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और मनोरोग के परिणामस्वरूप शारीरिक बीमारियां भी तेजी से बढ़ रही है। इस मनोवृत्ति के कारण हताश और तनाव बढ़ता जा रहा है। मन को साधने की प्रक्रिया में हमें ईश्वर से सर्वप्रथम यही प्रार्थना करनी चाहिए।

हमको मन की शक्ति देना

 मन विजय करें

 दूसरों की जय से पहले

खुद को जय करें

 इसके साथ ही निम्नलिखित योग की क्रियाएं की जानी चाहिए

ध्यान, प्रार्थना आसन, ताड़ासन, शशांक आसन

योगमुद्रा,  भुंजगासन,  मक्रासन, निस्पंद भाव,  क्रोकोडायल१,२

सेतुबंद,  पर्वतासन,  प्राणायाम,  कपालभांति,  भ्रामरी,  योग, अनुलोम विलोम

,योनिमुद्रा, ध्यान, त्राटक, शवासन, योगनिंद्रा

 प्रारंभ में डॉक्टर और योग विशेषज्ञ की सलाह से योग की क्रियाएं की जानी चाहिए। प्रत्येक योग की क्रिया में लंबी गहरी कछुए जैसी सांस लेना और छोडना चाहिए। सांस तोडना नहीं चाहिए। कुत्ते जैसी लंबी -लंबी सांसें नहीं लेनी चाहिए। इसके साथ -साथ मनुष्य को २ से ३ किलोमीटर छत पर, बरांडे में या सड़क पर घूमना चाहिए। शाम को भोजन सुपाच्य, सोने से दो घंटे पहले करना चाहिए। दिन में एक वक्त दिल खोलकर हंसना चाहिए।

अगस्त

सफल कैसे बनें

 

 

हम सब महत्वाकांक्षी (ambitious) और सफल (successful) होना चाहते है, हम सब में यह इच्छा कूट– कूट कर भरी पड़ी है लेकिन कुछ बाधाओं की वजह से हम कई बार इस प्रबल इच्छा को दफना देते है या कई बार नकारात्मक सोच की वजह से बिना कोशिश किये ही हार मान लेते है. ऐसे हम अपने ही हाथों अपने सपनों और सफलता का गला घोंट देते हैं

ज़िन्दगी में सफल कौन नहीं होना चाहता पर सब हार से डरते हैं । यदि आप ये पढ़ रहें हैंइसका मतलब है आप भी सफल और कामयाब होना चाहते हैं । 

एक विचार लें । उस विचार को अपनी जिंदगी बना लें । उसके बारे में सोचियेउसके सपने देखियेउस विचार को जिए । आपका मनआपकी मांसपेशियांआपके शरीर का हर एक अंगसभी उस विचार से भरपूर हो । और दूसरे सभी विचारों को छोड़ दे । यही सफलता का तरीका हैं । – स्वामी विवेकानन्द

सपने देखें - सपने देखना महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह प्रेरणा देते हैं । ज़िन्दगी में एक न एक बार आपने खुद को सफल होने के सपने देखते हुए पकड़ा ही होगा । ये असामान्य नहीं है और इसे अंग्रेजी में कहते है डे ड्रीमिंग  जो आपको अपनी मंजिल की तरफ ढकेलती है ।

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पवित्रता संभव है

क्या आज के युग में जीवन में पवित्रता धारण करना संभव है ? इन्टरनेट के जाल में फंसा आज का मानव शायद पवित्रता के बारे जानता नहीं है ? किसी भी व्यक्ति की रूचि यह जानने में होती है कि वह कुछ भी करे तो उससे उसका फायदा क्या होगा ? जबमानव यह समझ लेता है कि पवित्रता क्या है और पवित्रता की धारणा करने से उसके व्यक्तित्व में कितना निखार और अद्भुत आकर्षण आ जाता है तो फिर वह अपने जीवन में पवित्रता धारण कर सकता है |

दुनिया में हम देखते हैं कि अपने को सुन्दर दिखने के लिए लोग ब्यूटी पार्लर में जाते हैं | बहुत सी ब्यूटी क्रीम के विज्ञापन टीवी चैनलों और प्रिंट मीडिया में दिखाए जाते हैं | और काले रंग को गोरा होता हुआ दिखाते हैं | जो कि वास्तव में होता नहीं है | जबकि पवित्रता मानव जीवन का श्रेष्ठ श्रृंगार है | स्वयं मैंने देखा है कि पवित्रता अपनाने वालों के रंग में बिना किसी ब्यूटी क्रीम के यथार्थ रूप में अलौकिक चमक आने लगती है | लेकिन पवित्रता की धारणा दो तरह से हो सकती है | एक है वरदान के रूप में पवित्रता की धारणा करना और दूसरा है मेहनत करके पवित्रता को धारण करना | आम तौर पर पवित्रता को धारण करना मुश्किल लगता है | जबकि किसी भी तरह की अपवित्रता सहज लगती है और कुछ समय तक आकर्षक भी लगती है | अपवित्रता का आशय है अपने अंदर की कमजोरी | सवाल उठ सकता है कि अन्दर की कमजोरी आकर्षक कैसे लग सकती है | इसका उदहारण यह है कि किसी परिवार का सदस्य गुस्सैल हो तो सभी लोग उसके गुस्से की बहुत तारीफ करते हैं कि ये तो बड़े गुस्से वाला है | लोग उसकी महिमा करने लगते हैं | ऐसे लोगों की सुख शांति से दूर-दूर का रिश्ता भी नहीं होता | इसी तरह दारू पीने वालों के भी बहुत लोग फैन बन जाते हैं और कहते हैं पूरी बोतल पीकर भी डकार नहीं लेता | अभी कुछ दिन पहले मैंने एफ एम रेडियो में किसी को मजाक करते सुना था | जिसमे एक व्यक्ति किसी महिला फोन करता है और कहता है , ‘मैंने आपसे जरूरी बात करनी है , प्लीज फोन नहीं काटना | वह आगे कहता है कि चाय पीना शराब पीने से भी ज्यादा नुकसान करता है | आप फोन नहीं बंद करना मैं बताता हूँ कि कैसे ? वह बोला, ‘ रात मैंने शराबखाने में ४-५ पैग लगाए, रात के ग्यारह बज गए | उसके बाद दो-तीन पैग और लगाए तो रात के दो बज गए | फिर मैं घर गया | तब तक मेरी बीबी चार कप चाय पी चुकी थी | मैं जब घर पहुंचा तो वह जोर-जोर से बोलने लगी, बड़ा अनाप-शनाप बोली | मैं तो चुपचाप शांत खड़ा था | मैं कुछ नहीं बोला | तो बताइए चाय ज्यादा नुकसान करती है या दारू ?” इस तरह लोग अपनी कमजोरी को भी बहुत बड़ी बात समझने की भूल करते हैं |

पवित्रता को धारण करने का दूसरा तरीका है वरदान के रूप में प्राप्त करना | वरदान को सदा जीवन में प्राप्त करने के लिए सिर्फ एक बात का अटेंशन चाहिए कि वरदाता और वरदानी दोनों का संबंध समीप और स्नेह के आधार से निरंतर चाहिए | इस बात को समझने की आवश्यकता है, यहाँ वरदाता वह सर्व शक्तिवान परम सत्ता है जिसे ढूँढने का प्रयास सदा से महान तपस्वी करते रहे हैं | वरदाता और वरदानी आत्माएं अर्थात आत्मा और परमात्मा दोनों सदा कंबाइंड रूप में रहें तो पवित्रता की छत्रछाया स्वतः रहेगी | यह अटल अध्यात्मिक नियम है |  जहाँ सर्व शक्तिवान परमात्मा का साथ है वहां अपवित्रता स्वप्न में भी आ नहीं सकती है | शर्त यह है कि आत्मा और परमात्मा सदा युगल रूप में रहें | यही आध्यात्मिकता है | परमात्मा को अपना कम्पैनियन बनाने वाले के लिए पवित्रता अति सहज रूप में जीवन में धारण हो जाती है | उनके लिए यह सवाल ही पैदा नहीं  हो सकता कि पवित्र रहूँ, पवित्र बनूँ , लाइफ ही पवित्रता है | आत्मा का आदि-अनादि स्वरूप ही पवित्रता है | जब यह स्मृति आ जाती है कि‘मैं आदि-अनादि पवित्र आत्मा हूँ’ यह स्मृति ही पवित्रता को धारण करने की सामर्थ्य ले आती है | जबकि संगदोष के संस्कार अपवित्रता के हैं | तो सहज क्या है , निजी संस्कारों को इमर्ज करना सहज है या संगदोष के संस्कारों को इमर्ज करना सहज है | इस संबंध में अव्यक्त वाणियों में पवित्रता की महिमा इस प्रकार की है – पवित्र दृष्टि आँखों की रोशनी है | पवित्र कर्म जीवन का विशेष धंधा है | पवित्र संबंध और सम्पर्क जीवन की मर्यादा है | तो सोचो जीवन की महानता क्या हुई ? पवित्रता हुई न ?”

ऐसी महान चीज को अपनाने में मेहनत नहीं करो, हठ से नहीं अपनाओं | मेहनत और हठ निरंतर नहीं हो सकता | लेकिन यह पवित्रता तो आपके जीवन का वरदान है | इसमें मेहनत और हठ क्यों ? अपनी निजी वस्तु है | अपनी चीज को अपनाने में मेहनत क्यों ? पराई चीज़ को अपनाने में मेहनत होती है | पराई चीज़ अपवित्रता है , न कि पवित्रता | अपनी चीज़ पर नशा होता है | इस संबंध में अव्यक्त वाणियों में ईश्वरीय महावाक्य देखने योग्य हैं : “ सदा स्व-स्वरूप पवित्र है | स्वधर्म पवित्रता है अर्थात् आत्मा की पहली धारणा पवित्रता है | स्वदेश पवित्र देश है | स्वराज्य पवित्र राज्य है | स्व का यादगार परम पवित्र पूज्य है | कर्मेन्द्रियों का अनादि स्वभाव सुकर्म है | बस यही सदा स्मृति में रखो तो मेहनत और हठयोग से छूट जाएँगे |” 

 

 
 

रक्षाबंधन: एक आध्यात्मिक अनुशीलन

 

ब्रह्माकुमारी हेमलता दीदी

स्वभाव से स्वतंत्र प्रेमी होने के नाते मनुष्य हर बंधन से छूटना चाहता है। परंतु रक्षाबंधन एक ऐसा बंधन है, जिसमें बंधने के लिए मनष्य कई कोसों की दूरी भी पार कर जाता है। यदि किसी का भाई या बहन न हो तो धर्म -भाई अथवा बहन बनाकर इस बंधन में बांधते बंधते देखे जाते हैं, यह जीवन में उत्सव और उल्लास का पर्याय है। संसार के प्रायः सभी बंधन दुखदायी है लेकिन यह अविनाषी धार्मिक बंधन मानव के लिए सुखों की सौगातों से भरपूर है । एक परिपाटी के रुप में औपचारिक रुप से मनाये जाने के कारण वर्तमान में इस त्यौहार की महत्ता कम होती दिखती, जबकि यह विशुद्ध रुप से एक आध्यात्मिक रस्म है।

               किसी, व्यक्ति, जाति, धर्म विशेष से संबंधित न होकर यह त्योहार एक गुह्य आध्यात्मिक भावना अपने में समेटे हुए है। प्रत्यक्षतः यह भाई- बहन की के सत्य, अविनाषी त्याग भरे रिश्ते भावना के रुप में दिखाई देता है। रक्षा बंधन वह प्यारा बंधन है जो अनेक बंधनों से मुक्ति दिलाने के अलावा मृत्युपाश से भी छुडाने की सामर्थ रखता है।

               रक्षा बंधन में रुढिगत रुप से तीन और रस्में देखी जाती है- तिलक लगाना, मुह मीठा करना और आरती उतारना । वस्तुतः तिलक आत्म स्मृति का पर्याय है, जो बताता है कि हम इस जड़, विनाशी तन में भृकुटि के मध्य विराजिम अविनाषी, चैतन्य आत्मा है। मिठाई खिलाने की परंपरा का गुढार्थ कि हम मधुर वचन बोले हमारे बोल-चाल, व्यवहार में कभी कटुता न आ सके।

               कोई भाई बहन के साथ हर पल तो नहीं रह सकता । फिर वह उसकी रक्षा कर पाने में कैसे समर्थ हो सकता है। कई बार यह भी देखा जाता है कि भाई शारीरिक तौर पर ही नहीं बल्कि आर्थिक और मानसिक तौर पर भी बहन की रक्षा करने में अक्षम होता हैं, फिर भी राखी बांधकर, मिठाई खिलाकर और आरती उतारकर परम्परा का निर्वाहन किया जाता है।

                स्वाभाविक रुप प्रष्न उठता है कि रक्षा की जरुरत केवल बहन को ही है, भाई को नही ? इतिहास ऐसी अनेक नारियों की गौरव गाथाओं से भरा पडा है, जिनसे पुरुषों की सक्षम सेनाएं भी रक्षा चाहती थी । झांसी की रानी लक्ष्मीबाई,रानी दुर्गावती ऐसे चंद उदाहरण मात्र है। ष्षास्त्रीय परंपरा अनुसार बाल्यवास्था में स्त्री की सुरक्षा में पुत्र का बताया गया है। तो फिर रक्षाबंधन केवल भाई को ही क्यों ?

वास्तव में रक्षा बंधन कोई स्थूल बंधन नहीं, वरन् धर्म का बंधन है। यह मन, वचन और कर्म से पवित्रता की मर्यादा की रक्षा का बंधन है। जो इस पवित्रता की रक्षा करता है, पवित्रता उसकी रक्षा करती है। बहन- भाई के रिस्ते में पवित्रता समाई होने से बहनें यह षुभ कार्य करती हैं।

               वास्तव में हर मनुष्य को हर प्राकर की रक्षा की जरुरत है। एक आदर्ष समाज के समाज के बारे में परिकल्पना है कि प्राणी मात्र का नाम, मान, षान इज्जत, धन, जीवन इत्यादि सुरक्षित रहे। जबकि कोई भी प्राणी किसी दूसरे प्राणी की सर्व प्रकार से रक्षा करने में कतई समर्थ नहीं हो सकता है।

सदाकाल की पवित्रता और सर्व प्रकार की सुरक्षा की ग्यारण्टी देने में एक मात्र परमपिता परमेष्वर ही सक्षम है, जो सृष्टि नाटक के नियन्ता और परिवर्तक है। गीता में उनका वचन है- सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकम षरणम व्रज अहम् त्वाम् सर्व पापेभ्योः विमोक्ष्यामि। अतः मनुष्य को वर्तमान समय बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए परमात्मा की आज्ञाओं का अनुषरण करना चाहिए। कलियुग अंत और सतयुग आदि के वर्तमान संगम युग  पर कुपासिंधु परमात्मा स्वयं हर मनुष्य आत्मा को श्रेष्ठ कृति, वृत्ति और दृष्टि की राखी बांधते हैं। किसी लिंग, जाति, देश, धर्म , भाषा, संस्कृति के तमाम भेद-भावों को परे रखकर हर विकारी आत्मा पर रहमत की नजर रखने वाले परमपिता उसे राखी बंधवाने का अधिकार समझते है । जहां पवित्रता आ जाती है वहां सर्व प्राप्तियां स्वतः अनुगामिनी हो जाती है।                                                                                                               

ज्ञानषिखर ओमषान्ति भवन, इंदौर

कर लें कर्म की पहचान

कर लें कर्म की पहचान

  बी. के. अनुभा, अलवर

एक राजा ने दरबार के कुछ लोगों को बुलाया और उन्हें कार्य दिया कि सभी एक-एक बोरा ले जाएं और शाही बगीचे से पके मीठे फल तोड़-तोड़कर उसमें भरंे। बगीचे में पहुँचने पर एक-दो लोग तो बड़ी तत्परता से कार्य में जुट गये। कुछ लोग आपसी बातचीत में और कुछ बगीचे की शोभा और सुन्दरता को निहारने में लग गये। कुछ लोग मीठे पके फल खाकर वहीं ठण्डी छाया में सुस्ताने लगे। बगीचे के रखवाले ने आकर जब सूचना दी कि राजा सभी को याद कर रहे हैं तो उन्हें कार्य याद आया। कुछ लोगों ने जल्दी-जल्दी कच्चे-पके, गिरे हुए, कुचले हुए फल जमा कर भर लिये। कुछ ने सोचा कि राजा कौन-सा बोरा खुलवा कर देखेगा, इसलिए आराम से लता-पत्ता, घास-फूस इकट्ठा करके भर लिया। जब राजा के पास पहुँचे तो राजा ने सबको अज्ञात स्थान पर भेजते हुए आदेश दिया कि हरेक का बोरा उसके पास ही रहेगा और उसे सप्ताह भर उससे ही काम चलाना होगा। अब सबकी दशा देखने लायक थी क्योंकि जो फल जमा किया था, वही खाना था। कुछ हैरान हो रहे थे, कुछ रो रहे थे, कुछ अपना सिर धुन रहे थे। कुछ ऐसे थे जो ऐसे विचित्र आदेश के लिए राजा को कोस रहे थे और कुछ तो अपने भाग्य को कि उनके भाग्य में वही कच्चे-कुचले फल और लता-पत्र खाने ही लिखे थे। केवल कुछ गिने-चुने लोग ही खुश थे, उसी अनुपात में जिस अनुपात में उन्होंने मेहनत कर पके-मीठे फल भरे थे।

यही हम सबके कर्मों की कहानी है। जो पूर्व जन्मों में हमने जमा किया, वही फल खाना है। स्वयं को प्राप्त फल के लिए हम स्वयं ही जिम्मेवार हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे कर्म जिम्मेवार हैं। यह सृष्टि एक विशाल कर्मक्षेत्र है। यहाँ कर्मों का ही खेल चल रहा है। कर्म के अनुसार ही कोई हँसता है, कोई रोता हैय कोई पाता है, कोई खोता है। कर्म ही भाग्य का आधार है, बिना किए भाग्य नहीं बनता। यह भी सत्य है कि भाग्यवान व्यक्ति ही कर्मकुशल होते हैं, शेष तो यूँ ही बैठकर अपना जीवन गँवाया करते हैं। इस संसार में जिसने कर्म के महत्व को समझ लिया, वह कभी पापकर्म और निठल्लेपन की तरफ प्रवृत्त नहीं होगा। सुख और शान्ति, जो हर मानव की चाहना है, कर्म ही उस खजाने को प्राप्त करने की चाबी है। वस्तुतः कर्म किए बिना मानव रह नहीं सकता लेकिन उसे इस बात को जानने की बड़ी आवश्यकता है कि किस प्रकार के कर्म करने चाहिएँ। कर्मों की पहचान करने से मानव अपने जीवन में कभी भी कष्ट का अनुभव नहीं कर सकता।

कर्म बनें देव समान

कर्मशास्त्र का सच्चा सार यह है कि मानव अपने कर्मों से दाता बने, लेने का प्रयास न करे। देने से जो पुण्य जमा होता है, वह उसे कई गुणा लेने का अधिकारी बना देता है। देने वाले के हाथ कभी खाली नहीं रहते और लेने वाला कभी भरता नहीं। ‘देना’ या ’लेना’ यह मनोवृत्ति की बात है। जिसके भीतर देने की भावना होती है, वह कैसी भी स्थिति में देकर ही रहता है भले ही उसके एवज में तात्काालिक रूप से उसे कोई कष्ट भी उठाना पड़े। जिसके भीतर देने की इच्छा जागृत हो जाती है, वह सच्चे अर्थों में देवत्व की ओर अग्रसर हो जाता है। देवताओं का हाथ सदा देने की मुद्रा में दिखाते हैं जो यह स्पष्ट करता है कि वे सदा भरपूर हैं, उनका भण्डारा कभी खाली नहीं होता। अगर मनुष्य भी इस एक शब्द के अन्तर को समझ जाये तो उसके भाग्य में महान परिवर्तन हो जाये।‘देना’ और ‘लेना’ इन शब्दों में ‘द’ और ‘ल’ का ही अन्तर है लेकिन वास्तविक रूप में यह अन्तर इतना बड़ा है जो एक को राजा और दूसरे को कंगाल बना सकता है।

कर्म हों धर्म समान

कहा जाता है- कर भला तो होगा भला अर्थात् हम जो देते हैं वही पाते हैं। किसी को फूल देंगे तो फूल मिलेंगे। किसी की झोली में काँटे डालेंगे तो वे ही एक दिन शूल बनकर हमारे पाँव में चुभेंगे। कर्म का फल न केवल अविनाशी होता है बल्कि वह एक का कई गुणा भी हो जाता है। कर्म का फल कितने गुणा मिलेगा, यह कर्म करते समय रही आंतरिक भावना पर निर्भर करता है। जब कर्म के प्रति बहुत श्रेष्ठ, शुद्ध, निर्मल, सेवा और परोपकार की भावना होती है तो ऐसा कर्म साक्षात् धर्म ही बन जाता है जो मानव को सर्व धार्मिक क्रियाकलापों का पुण्य क्षण भर में प्रदान कर देता है। वास्तव में तो धर्म का मर्म यही है कि वह मानव के कर्मों में आये। हमारे कर्म धर्मसम्मत हों। धर्म जब कर्म में उतर आता है तो वह सच्चे अर्थ में व्यक्ति को धार्मिक बना देता है।

कर्मगति है बलवान

कर्म सिद्धांत कहता है कि जो प्रयत्न आज आप करेंगे वही कल आपको भाग्य में मिलेगा। लेकिन प्रयत्न की बजाए खाली भगवान के या भाग्य के भरोसे रहेंगे तो जीवन में दुःख उठाना पडे़गा। कुछ भी पाने के लिए सिर्फ इच्छा रखना पर्याप्त नहीं है लेकिन उसके अनुकूल परिश्रम भी करना ही पड़ेगा। जो समर्थ होते भी मेहनत से जी चुराता है, उसके लिए तो भगवान भी कुछ नहीं कर सकता।

एक बार शंकर-पार्वती आकाश मार्ग से घूमने निकले। पार्वती ने नीचे मृत्युलोक की ओर देखा तो उन्हें चारों ओर दुःख नजर आया। उन्होंने पूछा- ‘‘हे प्रभु! मृत्युलोक की दशा देखिए। इतना दुःख! भगवन्, ऐसा क्यों है, आप कुछ कीजिए।’’

‘‘देवी, मैं क्या कर सकता हूॅं! मृत्युलोक के प्राणी दःुख ही चाहते हैं, दःुख के लिए प्रयास करते हैं, दुःख के रास्ते की ओर जाते हैं तो मैं क्या करूँ?’’

‘‘दुख चाहते हैं! यह कैसे हो सकता है भगवन्? वह देखिए, वह आपका भक्त सुख के लिए आपकी प्रार्थना कर रहा है।’’

‘‘चलो, नजदीक जाकर देख लेते हैं।’’

भक्त करुण पुकार कर रहा था- ‘‘हे प्रभो! मेरी गरीबी दूर कर दीजिए।’’

‘‘यह तो धन चाहता है।’’

‘‘प्रभु, धन मिल जायेगा तो यह सुखी हो जायेगा।’’

‘‘देवी, ऐसा नहीं है।’’

‘‘हे प्रभु! आप इसे धन दे दीजिए।’’

‘‘देवी, इसके भाग्य में नहीं है, पुण्य का खाता अति क्षीण है। धन देकर मैं इसे और दुःखी नहीं कर सकता।’’

‘‘प्रभु, मेरे कहने से ही दे दीजिए।’’

‘‘ठीक है, मैं दे देता हूँ लेकिन फिर जिम्मेवारी तुम्हारी है। मुझे कुछ मत कहना।’’

चमत्कार हुआ और भक्त एकाएक मालामाल हो गया। खुशी के मारे वह फूला नहीं समा रहा था। पड़ोसी ने उसे बहकाया-‘‘तुम्हारा भाग्य बहुत प्रबल है। जुआ खेलो तो कई गुणा धन हो जायेगा। लालच में आकर उसने दाँव खेला और सारा धन हार गया। उसे इतना गहरा धक्का लगा कि पागल हो गया। इस प्रकार, बिना परिश्रम और भाग्य(पूर्व के संचित कर्म) के प्राप्त धन ठहरा नहीं, और ही कई गुणा कष्ट देकर भाग गया।

मानव को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि जो उसने कल किया, उसका परिणाम आज है और जो आज कर रहा है उसका परिणाम आने वाला कल है। यदि मैंने अपने कल पर ध्यान नहीं दिया तो अपने आज पर तो ध्यान दूँ। आज को सँवार लूँ क्योंकि अतीत में पीछे जाकर उसे सँवारना संभव नहीं है। न अतीत को बार-बार याद कर पश्चाताप करना ही कोई समझदारी है। अपने बीते हुए कल(भूत) की काली छाया वर्तमान पर न पड़ने दें। सदा समझें, आज का दिन मेरी बची हुई जिन्दगी का पहला दिन है और मुझे एक नई शुरुआत करनी है।

कर कर्मों की पहचान, आज से बनायें कर्म महान।

सुख का खाता जमा हो, दुःख का खाता भुगतान।।

मंदिर का घंटा

"स्टॅटिक डिस्चार्ज यंत्र"

 डॉ राम श्रीवास्तव​

मंदिर में प्रवेश करते समय बड़ा घंटा बंधा होता है। 
प्रवेश करने वाला प्रत्येक भक्त पहले घंटानाद करता है और मंदिर में प्रवेश करता है। क्या वैज्ञानिक कारण है इसके पीछे ? इसका एक वैज्ञानिक कारण है जब हम बृहद घंटा के नीचे खडे रहकर सर ऊंचा करके हाथ उंठाकर घंटा बजाते है तब प्रचंड घंटानाद होता है। यह ध्वनी 330 मिटर प्रती सेकंड इस वेग से अपने उद्गम स्थान से दुर जाती है ध्वनी की यही शक्ती कंपन के माध्यम से प्रवास करती है। आप उस वक्त घंटा के निचे खडे़ होते हैं। अतः ध्वनी का नाद आपके 
सहस्रारचक्र (ब्रम्हरंध्र, सर के ठीक ऊपर) में प्रवेश कर शरीरमार्ग से 
भूमी मे प्रवेश करता है। यह ध्वनि प्रवास करते समय आपके मन में (मस्तक में ) चलने वाले असंख्य विचार, चिंता, टेंशन, उदासी, स्ट्रेस, इन नकारात्मक विचारों को अपने साथ ले जाती हैं और आप निर्विकार अवस्था में परमेश्वर के सामने जाते हैं। 
तब आपके भाव शुद्धता पूर्वक परमेश्वर को समर्पित होते हैं।
व् घंटा के नाद की तरंगों की अत्यंत तीव्र के आघात से आस-पास के वातावरण के व् हमारे शरीर के सूक्ष्म कीटाणुओं का नाश होता है, जिससे वातावरण मे शुद्धता रहती है व् हमें भी स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।

इसीलिए मंदिर मे प्रवेश करते समय घंटानाद जरुर करें और थोडा समय घंटे के नीचे खडे रह कर घंटा नाद का आनंद जरूर लें। आप चिंतामुक्त व शुचिर्भूत बनेगें। मस्तिष्क ईश्वर की दिव्य ऊर्जा ग्रहण करने हेतू तैयार होगा।
ईश्वर की दिव्य ऊर्जा व मंदिर गर्भ की 
दिव्य ऊर्जा शक्ती आपका मस्तिष्क ग्रहण करेगा।
आप प्रसन्न होंगे