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कृतिदेव यहां भय से मुक्ति - बी के सोनाली

मानव का सबसे बडा षत्रु कौन है? क्या कोई पडोसी देष, या कोई भूत प्रेत या कोई व्यक्ति ? इनमें से कोई भी हमारा सबसे बडा षत्रु नहीं है। सबसे बडा षत्रु है भय। भय से ही जीवन में असफलता, संबंधों में तनाव तथा कार्य कुषलता में कमी आ जाती है। भय स्वयं में ही एक सम्पूर्ण अर्थपूर्ण वाक्य है। इसके विषय में और कुछ कहने की आवष्यकता ही नहीं है। हरेक के जीवन में भय से संबंधित अपने व्यक्तिगत अनुभव है। जैसे बच्चों को स्कूल जाने का डर, एक्जाम का डर, खिलाडी को हारने का डर, युवाओं को जाब ना लगने का डर और जिनको जॅाब लग गई हो तो उनको टारगेट पूरा न होने का डर, वयस्को, वृद्धों में मृत्यु का भय, जीवन में कुछ हासिल न कर पाने का भय। ऐसे अनगिनत डरों से हम प्रतिदिन मुकाबला करते है। वैसे हर्ष, भय, षोक आदि को मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति माना गया है।
 
हम सारा दिन अपने आस पास जो कुछ भी देखते, पढते, सुनते हैं वह सूचना के रुप में हमारे मन में गहराई तक चली जाती हैं। और जितनी अधिक बार उस भय के संकल्प की पुनरावृत्ति होती है वह फोबिया का रुप ले लेता है। जैसे कोई व्यक्ति यदि बार-बार अपने आस-पास कोई दुर्घटना होते हुए देखता या सुनता है, वह विचार यदि बहुत गहराई तक अंतरमन में चला जाता है तो वह यात्रा करने के नाम से ही घबराने लगता है या कोई साधन विषेष के प्रयोग से डरने लगता है या कोई साधन विषेष के प्रयोग से डरने लगता है। कुछ समय बाद ये भय काल्पनिक न होकर षरीर में भी प्रतिक्रिया स्वरुप घबराहट, कंपकपी, पसीना आना या डायरिया, उल्टी जैसे कई लक्षण उभरकर सामने आ जाते है। फोबिया एक मानसिक विकृति ही है जिसे हम स्वयं पाल पोसकर बडा करते है। एक उदाहरण है कि एक लडकी को मॉडल बनने की चाहत में दूबला होने की ऐसी धून सवार हो गई कि उसे भोजन को देखने से ही घबराहट होने लगी उसे एनोरोक्सिया नामक बीमारी हो गयी जिसमें भोजन खाने के नाम से ही वह बीमार हो जाया करती थी। उसे कई दफा अस्पताल में भर्ती करना पडता था। ऐसे अनगिनत उदाहरण हम अपने चारों ओर प्रतिदिन देखते है कि भय किस प्रकार हमारे व्यक्तित्व को प्रभवित करता है।
अवचेतन मन की षक्तियों के ज्ञाता डा. जोसेफ मर्फी कहते है कि डर दो प्रकार के होते है (1) सामान्य डर (2) असामान्य डर। जैसे नवजात षिषु को सिर्फ दो मूलभूत डर होते है एक तो गिरने का डर दूसरा अचानक तेज षोर का डर और ये डर पूरी तरह सामान्य है। ये एक तरह से अलार्म की तरह काम करते हैं, जो प्रकृति ने हमे आत्म रक्षा के साधन के रुप में दिये हैं।
 
सामान्य डर अच्छा है। आप सडक पर अपनी ओर आती कार की आवाज सुनते है औेेेेर बचने के लिए हट जाते हैं। लेकिन बाकी सभी डर असामान्य होते हैं। वे खास अनुभवों द्वारा उत्पन्न होते हैं या फिर मात-पिता, रिष्तेदारों, टीचर्स या अन्य लोगां से आपके पास आते हैं जिन बातों ने आपको प्रभावित किया है उनसे पैदा होते हैं।
वास्तव में असामान्य डर क्या है? हमने कभी ध्यान दिया है कि ये डर क्या है? अगर गहराई से विचार करेगें तो पायेंगे कि जो अभी तक हुआ ही नही ंहम उस बात से डरते रहते हैं । हम अपनी कल्पना को बेकाबू  हो जाने देते है। जैसे कि एक्जाम हुआ ही नही और फेल होने का डर, अभी पढाई पूरी हुई ही नहीं लेकिन जॉब का डर, यात्रा प्रारंभ होने से पहले ही दुर्घटना का डर, कार्य षुरु किया ही नही लेकिन असफल होने का डर पहले से ही हमे सताता है। देखा जाये तो दुर्घटना, बीमारी, या असफलता ने इतने लोगों को नहीं मारा होगा, जितने लोगों को इनके होने की संभावना होने के डर ने मारा है। जां चिज अभी हुई ही नहीं भला हम उससे कैसे डर सकते हैं। हम सब जानते है कि सब को एक दिन मरना ही है लेकिन इस डर के कारण हम जिन्दगी भर रोते नहीं रहते या डरते नहीं रहते हैं । डर की वजह से हम अपने कार्य पर घ्यान नहीं लगा पाते इसलिए परिणाम वहीं आता है जिसका हमें डर था । फिर हम बडी षान से कहते हैं कि जिसका मुझे डर था वहीं हुआ। 
 
डर को कैसे जीते ?
उन्नीसवीं सदी के महान दार्षनिक और कवि राल्फ वाल्डो इमर्सन ने कहा था “ जिस काम से आप डरते हो, उसे कर डालो तो डर की मौत तय है। “
डर हमारे मन का एक नकारात्मक विचार है । जिस भी काम या चीज से हम डरते है उसके स्थान पर मन में सृजानात्मक विचार रखे। जैसे अगर असफलता से डरते हो, तो सफलता की ओर ध्यान दे, अगर बीमारी से डरते है तो ईष्वरीय षक्ति के साथ उनके मार्गदर्ष्र्र्र्र्र्र्र्रन पर ध्यान दे। बडी सरल सी बात है कि अगर हमारा ध्यान असफलता पर केन्द्रित है तो सफलता कैसे प्राप्त हो सकती है या अगर बीमारी पर केन्द्रित हैं तो हम स्वास्थ्य का अनुभव कैसे कर सकते है?
डॉ. जोसेफ मर्फी डर से उबरने की अचूक तकनीक का वर्णन करते है कि मान लो कि आप तैरने से डरते हैं तो पाँच-दस मिनट के लिए दिन में तीन चार बार स्थिर बैठ जाये , खुद को गहरे आराम की अवस्था में ले जाये । अब कल्पना करें कि आप तैर रहे है। कल्पना में आप तैर रहें हैं। मानसिक रुप से आपने खुद को पानी में डाल दिया है। आप पानी की ठंडक और हाथ पैरों का हिलना डूलना महसूस करते हैं यह सब वासत्विक, चित्रात्मक और मानसीक खुषी की गतिविधि है। आप जो भी अपनी कल्पना में अनुभव करते है वह आपके अवचेतन मन में विकसीत होगा और वहीं वास्तविक जीवन में साकार होगा। यहीं अवचेतन मन का नियम है।
हम अपने अन्य डरों पर भी यहीं तकनीक लागु कर अपने डरो पर जीत पा सकते हैं।
 
 दूसरा सदैव याद रखे कि जिनका लक्ष्य जितना बडा होता है उनका व्यक्तित्व और हौसला भी बडा होता जाता है। चीनी दार्षनिक कन्फ्यूषियस के मुताबिक हर मनुष्य के भीतर एक प्रेरणा होती जो उसे ऊँचा उठाने क लिए प्रेरित करती है। कुछ बडा कर गुजरने का हौसला देती है। इसीलिए हमें चाहिए कि अपने भीतर की प्रेरणा को महसूस करे।अपनी क्षमताओं और संकल्पों को सकार करना सिखें लेकिन दूसरों से पहले खुद को जय करें। केवल एक बात याद रखे कि जीवन में कोई विजय अंतिम नहीं होती  न कोई पराजय अंतिम होता है ।  इन दोनों के बीच जो निर्णायक चिज है वो हमारा साहस। इसलिए सबसे पहले इस युद्ध को जीतें जो हमारे मन के अंदर जारी है, उसे जीत लिया तो बाहर कोई ताकत हमें हरा नहीं पाएगी। 
 
तीमस डर को जितने का सबसे सषक्त हथियार - आध्यात्मिक ज्ञान और राजयोग का अभ्यास । आध्यात्मिक ज्ञान हमें सृष्टि के परिवर्तन , नष्वरता और षाष्वत सत्यों से अवगत कराता है जिससे जीवन में घटित परिस्थितियों को सहज भाव से स्वीकार करना आसान होता है। साथ ही राजयोग का अभ्यास हमारी सुषुप्त षक्तियों को जागृत कर मनोबल को बढ़ाने का कार्य करता है जिससे हम बड़े से बड़े डर पर जीत प्राप्त कर निर्भय , निष्चिंत बेफिक्र जीवन का आनंद ले सकते है। ( ज्ञान षिखर, ओम षांति भवन, इंदौर )