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मनोविकारों पर सम्पूर्ण विजय

प्रेम जीवन की यथार्थ नियंत्रक शक्ति है। जीवन रूपी घोड़े को प्रेम रूपी लगाम द्वारा ही नियंत्रित किया जा सकता है। प्रेम को परिभाषित करते हुए एक दार्शनिक ने कहा है कि अपने समस्त कर्मों को परमात्मा को समर्पण करके, उसके विस्मरण व वियोग में परम व्याकुल होकर तड़पना ही परमात्मा से सच्चा प्रेम है। प्रेमी हृदय उदार होता है। वह दया और क्षमा का स्वरूप होता है परन्तु ईष्र्या एवं दम्भ के नाले उसे विकृत कर देते हैं। प्रेम की अवस्था को प्राप्त करना ही सिद्ध अवस्था है। प्रेम एक ऐसी दिव्य औषधि है, जिसका रसपान करने से जीवात्मा के जन्म-जन्मान्तर के पाप व दुःख के जो भी मूल कारण हैं, जलकर भस्म हो जाते हैं। प्रेम एक चुम्बकीय शक्ति है, जिसके प्रयोग से अजामिल जैसे पापी का भी हृदय परिवर्तन किया जा सकता है। महात्मा बुद्ध के द्वारा अंगुलीमाल का हृदय परिवर्तन होना, प्रेम की ही शक्ति का एक अद्भुत उदाहरण है। परमात्मा भी यही कहते हैं कि जो मुझे दिल से याद करता है, वो सदैव मेरे हृदय में वास करता है।


आज का समाज चरित्रहीनता की खाई में गिरकर महापतित बन चुका है। चरित्रहीनता और अनैतिकता का जामा पहने मानवता, दानवता में बदल चुकी है। परिणाम स्वरूप माताओं-बहनों के साथ यौन हिंसा, भ्रूण हत्या, दहेज के नाम पर हत्या, बुजुर्गों का अपमान, माता-पिता द्वारा बच्चों की परवरिश में लापरवाही, पति-पत्नी में तलाक, मांसाहार का सेवन एवं अश्लीलता का खुलेआम प्रदर्शन हो रहा है। ऐसी संकट कालीन स्थिति में हमें आध्यात्मिकता एवं नैतिकता का एकमात्र मार्ग नज़र आता है। आध्यात्मिक शक्ति के आधार से ही समाज में फैले हुए विकारों के प्रदूषण को समाप्त किया जा सकता है। गहराई से चिंतन करने से हमें ज्ञात होता है कि विकारों का असली जनक देह-अभिमान है, जिससे विकारों की उत्पत्ति होती है। देह-अभिमान अर्थात् स्वयं को देह समझकर कार्य व्यवहार में आना। संबन्धों में दैहिक दृष्टि रखना जो असत्य और असभ्यतापूर्ण व्यवहार है।


वास्तव में आत्मा अजर-अमर और अविनाशी है, शरीर जड़ है। आत्मा एक चैतन्य शक्ति है, जब तक सत्य-असत्य, प्रेम और द्वेष के अन्तर को स्पष्ट रूप से नहीं जाना जाता, तब तक हमारे अन्तर मन से विकारों का जहर नहीं मिट सकता। दैहिक प्रेम स्वार्थ पर आधारित होता है। जब स्वार्थ की पूर्ति नहीं होती तो यही दैहिक प्रेम घृणा, ईष्र्या, द्वेष, बदले की भावना और छल-कपट का रूप धारण कर मानव-मन में जहर घोल देता है। आत्मिक, परमात्मिक प्रेम निस्वार्थ, निष्काम और निश्च्छल होता है, इससे आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों की वृद्धि होती है। जैसा कि गीता में भी वर्णित है कि जब धर्मग्लानि होती है, तब परमात्मा अवतरित होकर अधर्म का विनाश और आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करते हैं। कितना अनोखा और विचित्र संयोग है, एक ओर विकारों की अग्नि तीव्रगति से बढ़ती जा रही है और दूसरी ओर विश्व नियन्ता परमात्मा अत्यन्त गुप्त रूप से मानवीय तन में प्रवेश कर राजयोग के माध्यम से आत्माओं को पावन बनाते हैं। राजयोग के गहन अभ्यास द्वारा जीवात्मा विकारों की अग्नि को समाप्त कर ज्ञान की शीतलता से भरपूर हो जाती है। जब आत्माएं ईश्वरीय ध्यान की उच्चतम अनुभूति की आनन्दमय अवस्था को प्राप्त कर लेती है, तो उनका मन-मयूर प्रफुल्लित हो उठता है। ऐेसे में
परमात्मा के प्रति दिल से धन्यवाद के यही मीठे शब्द निकलते हैं, जो पाना था सो पा लिया। परमात्म प्रेम का अमृत विकारों के विषैले जहर को चूसकर जीवात्मा में पावनता और दिव्यता का संचार कर देता है। जैसे भक्त शिरोमणि मीरा, श्रीकृष्ण के प्रेम में इतनी मगन रहती थी कि उसकी क्षण भर की दृष्टि से जहर का प्याला भी अमृत बन गया। जब हम भी सफल तपस्वी बन परमात्म प्रेम की लवलीन अवस्था को प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं, तो उसकी अनुभूति की किरणें बहुत शक्तिशाली होती हैं। स्वयं के विकारों से मुक्ति के साथ-साथ संबन्ध-सम्पर्क में आने वाली आत्माओं के विकारी वायब्रेशन भी समाप्त हो जाते हैं। फलस्वरूप विश्व में प्रेम, शान्ति, एकता एवं दिव्यता जैसे गणों का संचार होने लगता है। हमारे व्यक्तित्व में पारदर्शिता एवं दिव्यता की झलक स्वतः दृष्टिगोचर होती है। विश्व एक परिवार है, बेहद की ये श्रेष्ठ भावना चहुं ओर फैलने लगती है। यह समय है जब हम सब प्रेम की मूर्ति बन, प्रेम के सागर परमात्मा से प्रेम का अमृत एकत्र कर खुले दिल से सर्व आत्माओं को दें, यही सबसे बड़ा पुण्य है। (ओआरसी, गुरूग्राम)