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जीवन का उत्सव मनायें

जीवन की यात्रा में, रोज़-रोज़ की भागदौड़, कमाने-धमाने में हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि ईश्वर की दी हुई इस ख़ूबसूरत सौग़ात का आनन्द लेना ही भूल जाते हैं। किसी से भी अगर उनका हालचाल पूँछें तो अक्सर जवाब मिलता है, "चल रहा है, कट रही है ज़िन्दगी।“ कितना अच्छा हो यदि हम हमारे जीवन को समस्याओं, परेशानियों के बावजूद एक उत्सव की तरह जिएँ। विश्वप्रसिद्ध क्लिनिकल सायकोलॉजिस्ट डॉ. गिरीश पटेल इसके लिए कुछ बहुत ही सरल उपाय सुझाते हैं।

 

(१) ख़ुश रहने की आदत डालें- छोटे बच्चे दिन में लगभग ८० बार हँसते हैं। जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं यह कम होता जाता है। तो मुस्कुराइए, छोटी छोटी बातों में ख़ुशी ढूँढिए। हँसना, मुस्कुराना तो अच्छा है ही लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है ख़ुशी को महसूस करना। जो अच्छी बातें सुनें उन्हें याद रखने की कोशिश करें। उसी वक़्त तय कर लें कि इसे हम हमारे जीवन का हिस्सा बनायेंगे। ऐसा करने पर हम पायेंगे कि हमें इसका अधिकतम फ़ायदा होगा।

(२) कृतज्ञता की वृत्ति रखें- इस पर कई शोधों के बाद पाया गया कि जिन व्यक्तियों में कृतज्ञता का भाव है वे सुखी और स्वस्थ रहते हैं। यह भावना कि लोगों ने मेरे साथ अच्छा किया है, जीवन में मुझे कई वरदान मिले हैं- यह हमें मन से बहुत ख़ुश और हल्का रखती है।

(३) जीवन एक सुपर मैगा सीरियल है- इसमें सुख-दुख आयेंगे, तकलीफें, समस्याएँ आयेंगीं लेकिन यह समझ लो कि मैं तो एक रोल निभा रहा हूँ। सिर्फ़ मैं ही नहीं, बाक़ी सब भी अपना- अपना रोल निभा रहे हैं। हमें इस रोल से डिटैच होना है। कोई बीमारी आ गई, बदनामी हो गई, कोई और समस्या आ गई तो यह डिटैच होने की प्रैक्टिस बहुत काम आयेगी। यह तैयारी पहले से ही नियमित करनी होगी।

(४) कोई भी अवस्था स्थायी नहीं रह सकती- इस बात को अच्छी तरह समझ लें। यदि अभी बहुत दुख हैं तो धीरज धरें कि आगे अच्छे दिन आयेंगे। और यदि अभी बहुत सुख है तो इसका अहंकार न करें। क़ुदरत,वक़्त एक झटके में सब कुछ बदल सकता है। इसलिए यह निश्चय रखें कि हर मुसीबत के बाद सुख आता है। सुबह की पहली किरण जब पृथ्वी पर पड़ती है उसके पहले घोर अन्धियारा होता है। हम छोटी- छोटी समस्याओं में ही उलझ जाते हैं, निराश हो जाते हैं। उस वक़्त सोचें कि मुझे मानसिक रूप से स्थिर रहना है।

(५) अपने विवेक को विकसित करना है- हमें इस बात का अहसास करना होगा कि सुख, ख़ुशी, शान्ति बाहरी वस्तुओं, व्यक्तियों या परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करते। इन्हें हम स्वयं के भीतर ही पा सकते हैं। लेकिन आज गड़बड़ यह हो गई है कि हम यह सब बाहर ढूँढ रहे हैं। हम सोचते हैं कि मुझे जो कुछ चाहिये वह सब मिल जाए तब मै सुखी होऊँगा।

(६) सन्तुष्ट होना सीखें- आज हम जो कुछ भी हैं, हमने जो कुछ हासिल किया है वहाँ एक बार सन्तुष्ट हो जाएँ। लक्ष्य भले ही बहुत बड़ा रखें पर वर्तमान में जहाँ भी हैं वहाँ सन्तुष्ट रहें। लक्ष्य हासिल करने के लिए ज़रूरी है कि हम शान्त रहें, एकाग्र रहें। तभी परिस्थितियॉं अनुकूल बनेंगीं। तो यही अनुभव करें कि आज मैं जहाँ हूँ सन्तुष्ट हूँ। जो बीत गया उसके बारे में सोचकर दु:खी नहीं होना है, न ही कोई हीनता का भाव लाना है। वर्तमान में जो क्षण है वही सत्य है। जो कुछ इस क्षण कर रहे हैं,ऐसा सोचें कि मैं इसका आनन्द ले रहा हूँ। ऐसा करने से बहुत अच्छा महसूस करेंगे। एकाग्रता और याददाश्त भी बढ़ेंगे।

(७) मन:स्थिति मज़बूत हो तो कैसी भी परिस्थिति पार हो सकती है- परिस्थितियॉं तनाव पैदा नहीं करतीं,तनाव हमारी मन:स्थिति से उत्पन्न होता है। परिस्थिति हमारे नियंत्रण में नहीं है परन्तु मन:स्थिति पूरी तरह से हमारे नियंत्रण में है। जब भी कोई समस्या हो तो शान्ति से सोचें कि वह क्या है, उसे सुलझाने के मेरे पास कौन-कौन से रास्ते हैं व इनमें से मेरे बस में क्या है? इन सब की एक फ़ेहरिस्त बनायें।हम पायेंगे कि हमें बहुत कुछ मिल जाएगा जो हम कर सकते हैं। सारा मदार हमारे नज़रिये पर है.

(८) अपने रिश्तों को मज़बूत कीजिए- ऐसा करने से व्यक्तिगत व व्यावसायिक जीवन सुधर जायेंगे। इसके लिए मेहनत लग सकती है। कुछ त्याग भी करने पड़ सकते हैं लेकिन ये ज़रूरी हैं। बिना इसके जीवन में ख़ुशी ढूँढना ऐसा ही है जैसे किसी छेद वाले बर्तन में पानी भरने की कोशिश करना।हम कितना ही घूमने- फिरने, खाने-पीने, शॉपिंग करने, टीवी- फ़िल्म आदि देखने में ख़ुशी ढूँढे लेकिन कुछ क्षणों के लिए दिल बहलने के अलावा हमें और कुछ हासिल नहीं होगा रिश्तों में यदि कड़वाहट हो तो उसके कारण की जड़ तक जायें और उसे दूर करने की कोशिश करें।

डॉ शिल्पा देसाई