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कैसे बनी ईश्वरीय पाठशाला

 

मनहरण अब युवा हो चला था। वह घोर जंगल गुढ़वा का रहने वाला कंवर जाति का आदिवासी है। जहां सिद्ध-बाबा के नाम पर शिव मंदिर तथा पानी का झरना भी है। यह नगरदा मुख्य गांव से किलोमीटर की दूरी पर है। गांव का वातावरण एकांत और शांतमय है। मनहरण कालेज की पढ़ाई के लिये चांपा आया और परीक्षा देकर सीधा मामा गांव सरईडीह आ गया। उसने देखा कि गांव का आलम कुछ ओर ही है। गांव के कुछ लोग पास के गांव पकरिया में कथा सुननेएक पंडितजी घसियागिरि के घर जाते हैं। वहां पास के ही गांव सरगबूंदिया से चकबंदी अधिकारी निरंजनलाल साहू जी आते थे।

जिन्हें बिलासपुर में प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय का परिचय और ज्ञान मिला था। यह बात सन् 1989 की है। मनहरण को ज्ञान की पिपासा तो पहले से ही थी और उसे लगा कि भगवन इस धरा पर आकर सच्चा गीता का ज्ञान दे रहें हैं। फिर क्या था उसने गांव में ज्ञान देना प्रारम्भ किया तो गांव की आधी आबादी को शिव-कथा सुनने लगी। कथा सुनने वालों का उठना-बैठनाखाना-पीना रहन-सहन सब कुछ बदल गया।

 

मनहरण अब युवा हो चला था। वह घोर जंगल गुढ़वा का रहने वाला कंवर जाति का आदिवासी है। जहां सिद्ध-बाबा के नाम पर शिव मंदिर तथा पानी का झरना भी है। यह नगरदा मुख्य गांव से किलोमीटर की दूरी पर है। गांव का वातावरण एकांत और शांतमय है। मनहरण कालेज की पढ़ाई के लिये चांपा आया और परीक्षा देकर सीधा मामा गांव सरईडीह आ गया। उसने देखा कि गांव का आलम कुछ ओर ही है। गांव के कुछ लोग पास के गांव पकरिया में कथा सुननेएक पंडितजी घसियागिरि के घर जाते हैं। वहां पास के ही गांव सरगबूंदिया से चकबंदी अधिकारी निरंजनलाल साहू जी आते थे।

जिन्हें बिलासपुर में प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय का परिचय और ज्ञान मिला था। यह बात सन् 1989 की है। मनहरण को ज्ञान की पिपासा तो पहले से ही थी और उसे लगा कि भगवन इस धरा पर आकर सच्चा गीता का ज्ञान दे रहें हैं। फिर क्या था उसने गांव में ज्ञान देना प्रारम्भ किया तो गांव की आधी आबादी को शिव-कथा सुनने लगी। कथा सुनने वालों का उठना-बैठनाखाना-पीना रहन-सहन सब कुछ बदल गया।

 

यह सरईडीह गांवकोरबा से 20 किलोमीटर दूर मुख्य मार्ग पर स्थित गांव बरपाली से किलोमीटर दूर है। गांव वाले बड़ी ही लगन से ज्ञान सुन रहे थे वहां उन्होंने पहली गीता पाठशाला का निर्माण किया। लोग सत्संग में एक मुटठी चावल लेकर आते थेजोकि पीछे रखी बोरी में सभी डालते थे। जहां ब्रम्हाकुमारी बहनों को ज्ञान सुनाने बस से बरपाली तक जाकर साईकिल से जाना पड़ता था। यह बात जब इंदौर जोन के प्रभारी ओमप्रकाश भाई जी को मालूम पड़ीतो फिर उन्होंने एक आटो को सुविधाजनक बनवाकर भिलाई से हुक्मलाल भाई को ड्राईवर के रूप में कोरबा सेवाकेन्द्र पर भेज दिया।

अब गांव की दूरी तो कम हो गई थी लेकिन समाज के बंधन और सम्बंधों के बंधनों की दूरी बढ़ रही थी। कई रात कंवर समाज के चार गढ़ के लोग इकट्ठे होते और मीटिंग चलती थी। संस्था की प्रभारी रूकमणी बहन का भी वहां जाना होता था। एक रात थी परीक्षा कीकि समाज वालों ने निश्चय किया कि हम चाय बनायेंगें और ये लोग हमारी चाय स्वीकार करेगेंतो ये हमारे साथ हैं। बात येसी ही हुई चाय को स्वीकार न करने पर लगभग 100 लोगों को समाज से बहिश्कृत कर दिया और जो समाज में आना चाहते थे उन पर 1500 रूपये का जुमाना लगाया गया।

गांव की सात कन्यायें पुश्पा,ज्योतिरेवतीरूकमणीसुमनरचनासुमन ने परमात्मा शिव से साजन का अपना रिष्ता स्वीकार कर लिया और ब्रह्माकुमारी बनकर आज विश्व सेवा पर उपस्थित हैं। इन कन्याओं की अपनी गाथा अपनी लम्बी है। आठवीं पढ़ने वाली कन्या बिन्दु उपनाम ज्योति की कहानी कुछ इस प्रकार है कि जब वह सलवार कुर्ती में रंगीन कपड़े पहनकर सेवाकेन्द्र पर आई तब सेवाकेन्द् की इंचार्ज बहन इंदौर मीटिंग में जाते-जाते उसे अम्बिकापुर सेवाकेन्द्र जाने के लिये बस में बैठा दिया। नक्सलवादी लोगों से प्रभावित क्षेत्र मे, वह कन्या सायं के समय बस स्टैण्ड आने से पहले ही गलती से उतर गई। लोगों ने पुलिस में रिपार्ट दर्ज कराई और उसे रात भर खोजते रहेजागते रहे। सुबह होते ही वह सुरक्षित सेवाकेन्द्र पर पहुंच गई। रात में उसे किसी कार्यालय में शरण मिली थी। आज वह चैतन्य देवियों की झांकी मेंजब बीच देवियों में जगदम्बा का रूप धारण करती हैतो लोग आंखे मलते रहते हैं कि यह जड़ है व चैतन्य है। आज वह संस्था के कोरबा ट्रस्ट में उप प्रबंधक का दर्जा रखती है। एक बार उसे चैन्नई से वापिस आते समयजनरल डिब्बे में आने को कहा गयातो सहज ही उसने स्वीकार कर लिया। अब इनका गांव और समाज से रोटी-बेटी का रिश्ता  टूट चुका था।

अब सभी लोगों को निमंत्रण था माउन्ट आबू में ईष्वरीय मिलन मनाने कालेकिन खर्च के पैसे 700 रूपये भी जोड़ना मुष्किल था। मनहरण भाई अपने गांव वालों के साथ कोरबा राखड़ बांध पर आकरपैसा कमाने के लिये आ गये। इन्हें एक ट्रक राखड़ भरने का चालिस पचास रूपये मिलते थे। वह समय भी आया जब चांपा से बत्तीस लोगों का समूह सफेद वस्त्र में ब्रह्माकुमारी भावना बहन के साथप्रभु मिलन मनाने माउण्ट-आबू के लिये रवाना हो गया। उनमें से कुछ माताओं ने बाबा और मधुबन का साक्षात्कार पहले से ही कर चुके थे।

भाई मनहरण ने सन् 1991 में आयोजित उज्जैन कुम्भ मेले में सेवा करके वापिस कोरबा आये तो 3 जून से कोरबा सेवाकेन्द्र की नींव खोदनागांव वालों के साथ प्रारम्भ कर दी और आज भी उसकी देख-रेख कर रहें हैं। इसके साथ ही कोरबा से जुड़े दस सेवाकेन्द्रों उपसेवाकेन्द्रो की मरम्मत और देखरेख आपके हाथों में है। सात कन्याओं के साथ एक मनहरण भाई गांव सरईडीह की षानविष्व सेवा में आज भी अपनी समर्पित सेवायें खुषी-खुषी दे रहें हैं।

ब्रह्माकुमारी रूकमणी कोरबा