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किसी भी सत्ता का अनुसरण न करें

 

किस भी सत्ता / प्रभुता का अनुसरण ना करें. किसी भी सत्ता के अनुयायी ना बने. प्रभुता या सत्ता ही शैतानियत है. सत्ता तबाह कर देती है, विकृति लाती है, भ्रष्ट करती है; और जो व्यक्ति सत्ता का अनुसरण कर रहा है स्वयं का विनाश तो कर ही रहा है वह उसको भी नष्ट कर देता है जिसे कि वह सत्ता या प्रभुता की गद्दी पर विराजमान करता है. जैसे अनुयायी नेता को नष्ट कर देते हैं वैसे ही नेता भी अनुयायियों को नष्ट कर देता है । जैसे शिष्य गुरू को नष्ट कर देते हैं वैसे ही गुरू भी शिष्यों को नष्ट कर देते हैं।

सत्ता से आप कभी भी कुछ भी हासिल नहीं कर सकते. सत्य या हकीकत की खोज के लिए आपको सत्ता से पूरी तरह मुक्त होना होता है. सबसे मुश्किल बातों में से एक यह है कि — सत्ता से मुक्त हुआ जाये, बाहरी सत्ता से भी और भीतरी सत्ता से भी. भीतरी सत्ता है अनुभवों की चेतना, ज्ञान की चेतना. और बाहरी सत्ताएं हैं राज्य, पार्टियॉं, समूह संप्रदाय, समुदाय.. एक वो व्यक्ति जिसे कि सच की खोज करनी है, सच का पता लगाना है उसे इन सारी भीतरी और बाहरी सत्ताओं / प्रभुताओं से अलग रहना होता है. तो यह न कहिये कि क्या सोचना है / पठन पाठन या पढ़ने का यही अभिशाप है कि दूसरे के शब्द ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

 

किस भी सत्ता / प्रभुता का अनुसरण ना करें. किसी भी सत्ता के अनुयायी ना बने. प्रभुता या सत्ता ही शैतानियत है. सत्ता तबाह कर देती है, विकृति लाती है, भ्रष्ट करती है; और जो व्यक्ति सत्ता का अनुसरण कर रहा है स्वयं का विनाश तो कर ही रहा है वह उसको भी नष्ट कर देता है जिसे कि वह सत्ता या प्रभुता की गद्दी पर विराजमान करता है. जैसे अनुयायी नेता को नष्ट कर देते हैं वैसे ही नेता भी अनुयायियों को नष्ट कर देता है । जैसे शिष्य गुरू को नष्ट कर देते हैं वैसे ही गुरू भी शिष्यों को नष्ट कर देते हैं।

सत्ता से आप कभी भी कुछ भी हासिल नहीं कर सकते. सत्य या हकीकत की खोज के लिए आपको सत्ता से पूरी तरह मुक्त होना होता है. सबसे मुश्किल बातों में से एक यह है कि — सत्ता से मुक्त हुआ जाये, बाहरी सत्ता से भी और भीतरी सत्ता से भी. भीतरी सत्ता है अनुभवों की चेतना, ज्ञान की चेतना. और बाहरी सत्ताएं हैं राज्य, पार्टियॉं, समूह संप्रदाय, समुदाय.. एक वो व्यक्ति जिसे कि सच की खोज करनी है, सच का पता लगाना है उसे इन सारी भीतरी और बाहरी सत्ताओं / प्रभुताओं से अलग रहना होता है. तो यह न कहिये कि क्या सोचना है / पठन पाठन या पढ़ने का यही अभिशाप है कि दूसरे के शब्द ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

 

तो प्रश्न उठते हैं इस वाक्य के साथ कि ''हमें बताया गया है कि..''. तो कौन है जो आपको बता रहा है? आपको किसने बताया? श्रीमन! क्या आप यह नहीं देख पा रहे कि महान नेता और संत और महान शिक्षक भी असफल रहे हैं, फेल हैं.. क्योंकि "हम वैसे ही हैं जैसे कि हम हैं?" तो उन सबको छोड़ दें. आपने उनको असफल कर दिया है, क्योंकि आप सच की तलाश नहीं कर रहे; आप किसी ऊंची योग्यता, या सुख या आनंद की फिराक में ये सब पढ़ते लिखते हैं. तो मेरे या जे कृष्णमूर्ति सहित किसी का भी अनुसरण ना करें, किसी अन्य को अपना प्रभु ना बनाये, आपको स्वयं ही अपना गुरू और शिष्य बनना है. जिस क्षण आप किसी को अपना गुरू और स्वयं को उसका शिष्य मान लेते हैं... आप सच को अस्वीकार कर देते हैं, नकार देते हैं. सच की खोज में ना तो कोई गुरू होता है ना शिष्य.

सच की तलाश, सच की खोज महत्वपूर्ण है ना कि आप या वो गुरू जो कि सच की खोज में आपकी मदद करने वाला है. आप देख ही सकते हैं कि आधुनिक शिक्षा और पुरानी शिक्षा ने भी आपको यह सिखाया है कि ''क्या सोचना है?'' ये नहीं कि ''कैसे सोचना है''. उसने आपको एक फ्रेम एक ढांचें या सांचे में डाल दिया है और यह ढांचा आपको नष्ट कर देता है, क्योंकि आप तभी किसी गुरू, किसी शिक्षक, किसी राजनीतिक नेता या अन्य के अनुयायी या शिष्य बनते हैं जब आप भ्रम या भ्रांति में होते हैं. अन्यथा आपको कभी भी किसी का अनुयायी बनने की क्या जरूरत है. य​दि आप स्वयं में बढ़े स्पष्ट हैं. यदि आपकी सोच पारदर्शी है, यदि आप अपनी भीतरी समझ के प्रकाश से ही आलोकित हैं, तो आप कभी भी किसी के अनुयायी नहीं बनेंगे.

लेकिन ऐसा नहीं हेाता इसलिए आप अनुयायी बनते हैं, आप अपनी भ्रांति या भ्रम में अनुयायी हो जाते हैं, तो आप जिसका अनुसरण करते हैं उसको भी भ्रम या भ्रांति में डालते हैं. आपके नेता भी उतने ही भ्रम या भ्रांति में हैं जितने कि स्वयं आप. राजनीतिक रूप से भी और धार्मिक रूप से भी. इसलिए सर्वप्रथम अपनी भ्रम भ्रांति को दूर का स्पष्ट हो जाऐं, ताकि आप स्वयं अपने विवेक के आलोक में आलोकित हों और तब अन्य समस्याएं खत्म हो जाएंगी. गुरू और शिष्य के भी बीच का भेद बड़ा ही अन—अध्यात्मिक और अधार्मिक है.