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अपने कर्मों की संभाल करे

हमारा जीवन सीमित है । गिने हुए घंटे और मिनट उपलब्ध हैं । हमारे जीवन का हमें मालूम है, और हमारी मौत पहले से ही तय है । तो यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपना समय कैसे प्रयोग करते हैं । अगर हम अपना समय व्यर्थता में, ऊबने में, और उलझन में बिता देते हैं तो हमें अहसास करना चाहिए कि यह बीता हुआ समय हमें फिर से वापिस नहीं मिलेगा । अत्यावश्यकता का भाव उजागर करके मैं तनाव पैदा नहीं कर रही हूँ लेकिन मैं स्वयं से भी बार बार पूछती हूँ, कि मैं अपना समय उपयुक्त तरीके से प्रयोग कर रही हूँ या नहीं?

जब हमें पार्टीयों और धर्मार्थ संगठनों में निशुल्क भोजन परोसा जाता‍ है, तो यह हमारा कर्तव्य है कि हम उस भोजन को व्यर्थ जाने न दें । हम अपनी प्लेटों को भोजन से पूरा भर लेते हैं और उसको आधा फेंकना कितना आसान लगता है । उस भोजन को कैसे कमाया गया था? कड़ी मेहनत और पसीना बहाकर । हमें भोजन के लिए प्रेम और आदर का भाव जाग्रत करने की आवश्यकता है, जो धरती माँ हमें निशुल्क देती है । अगर मैं उस भोजन को फेंक देती हूँ तो ना केवल वह कूड़ेदान में जाता है बल्कि वह मेरे कर्मों के भार को बढ़ा देगा । अगर मैं इस भोजन को अपने साथ ले जाऊँ और इसे बाद में खा लूँ या किसी और को दे दूँ जिसे इसके महत्व का मालूम हो तो मैंने एक पुण्य का कार्य कर दिया है ।

हमारा जीवन सीमित है । गिने हुए घंटे और मिनट उपलब्ध हैं । हमारे जीवन का हमें मालूम है, और हमारी मौत पहले से ही तय है । तो यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपना समय कैसे प्रयोग करते हैं । अगर हम अपना समय व्यर्थता में, ऊबने में, और उलझन में बिता देते हैं तो हमें अहसास करना चाहिए कि यह बीता हुआ समय हमें फिर से वापिस नहीं मिलेगा । अत्यावश्यकता का भाव उजागर करके मैं तनाव पैदा नहीं कर रही हूँ लेकिन मैं स्वयं से भी बार बार पूछती हूँ, कि मैं अपना समय उपयुक्त तरीके से प्रयोग कर रही हूँ या नहीं?

जब हमें पार्टीयों और धर्मार्थ संगठनों में निशुल्क भोजन परोसा जाता‍ है, तो यह हमारा कर्तव्य है कि हम उस भोजन को व्यर्थ जाने न दें । हम अपनी प्लेटों को भोजन से पूरा भर लेते हैं और उसको आधा फेंकना कितना आसान लगता है । उस भोजन को कैसे कमाया गया था? कड़ी मेहनत और पसीना बहाकर । हमें भोजन के लिए प्रेम और आदर का भाव जाग्रत करने की आवश्यकता है, जो धरती माँ हमें निशुल्क देती है । अगर मैं उस भोजन को फेंक देती हूँ तो ना केवल वह कूड़ेदान में जाता है बल्कि वह मेरे कर्मों के भार को बढ़ा देगा । अगर मैं इस भोजन को अपने साथ ले जाऊँ और इसे बाद में खा लूँ या किसी और को दे दूँ जिसे इसके महत्व का मालूम हो तो मैंने एक पुण्य का कार्य कर दिया है ।

 

हम बहुत सी वस्तुऐं खरीदते हैं, आवश्यक नहीं है कि उनकी हमें जरूरत हो लेकिन हम ऊब गए हैं तो लगता है चलो खरीददारी ही कर लें!  इसे बिक्री उपचार कहते है! हम मॉल में जाते हैं, हमें लगता है कि हममें खरीदने की शक्ति है, खरीददारी भी कर लेते हैं (इससे कुछ पलों के लिए हमें अच्छा लगता है) और फिर खरीदा हुआ सामान बाकी उस सारे सामान के साथ अलमारी में रख दिया जाता है जिसकी हमें आवश्यकता नहीं है! इसके स्थान पर दूसरे धन बचाने वाले उपचार करें जैसे पार्क में पैदल करने चले जाऐं । फिर आप धन खर्च करने के अपराध भाव से बच जाऐंगे । इसके विपरीत समय, धन और ऊर्जा सही तरीके से प्रयोग करने की खुशी होगी ।

हमें अपने वार्तालाप पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है । कितना समय हम व्यर्थ बातचीत और दूसरों के बारे में बातें करने में और जो घटनाऐं घट चुकीं हैं उनके बारे में बातें करने में बिता देते हैं । क्या उन बातों को दोहराना आवश्यक है, या विस्तार को समाप्त करना और कर्मों के ऋण से बच जाना बेहतर है?

कुछ दिन पहले मुझे एक सुंदर व्हाटसप संदेश मिला । इसमें कहा गया था कि आपकी मृत्यु के समय जितना धन आपके बैंक खाते में बचा है उतना ही अतिरिक्त कार्य हमने किया है, उसकी आवश्यकता नहीं थी । क्या यह बात बिलकुल सही नहीं है? अगर हम अपने धन को सही कार्य में नही लगा पा रहे हैं तो इतनी मेहनत करने का क्या फायदा हुआ? हमारे मरने के बाद कौन निर्णय लेगा कि हमारे धन को कहाँ प्रयोग करना है? हमारे बच्चे? सरकार? कानून? तो कृप्या अपने बैंक खाते की जाँच करें और देखें कि क्या ऐसा कुछ उपयुक्त है जो आप अपने अतिरिक्त धन से करना चाहेंगे? इस बात को समझें कि आप कुछ अच्छा करने में देरी करते जा रहे हैं । याद रहे, आत्मा जब जाती है तो वह आर्शीवाद अपने साथ लेकर जाती है ना कि कागज़ और सिक्के ।

दिन के अंत में और जीवन के अंत में हमें महसूस होना चाहिए कि हमने वह सबकुछ किया जो हम करना चाहते थे । जब समय पूरा हो जाऐगा, तो हम इस शरीर को संघर्ष और पश्चाताप से नहीं छोड़ना चाहते बल्कि खुशी और हल्केपन से जाना चाहते हैं ।

इस सप्ताह, चलिए ध्यान दें कि हमारे संसार में और हमारे जीवन में कितना व्यर्थ जाता है । प्रत्येक बात में मितव्ययी बनें और आपके पास कभी कमी नहीं पड़ेगी क्योंकि आप अपने कर्मों का ध्यान रख रहे हो!

अब समय है… व्यर्थ न करने का और अपने श्रेष्ठ कर्मों को जमा करने का ।