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खुशी कहां है - बी के अनुभा

आज हर व्यक्ति खुशी की तलाश में है। खुशी कहां है? अगर किसी भूखे से पूछा जाये तो कहेगा कि रोटी में हैं किसी विद्यार्थी से पूछा जाये तो कहेगा कि प्रथम आने में है। किसी बेरोजगार से पूछा जाये तो कहेगा कि नौकरी में हैं। किसी बीमार से पूछा जाये तो कहेगा कि स्वस्थ होने में हैं। इसका अर्थ तो यह हुआ कि जिनके पास अच्छा भोजन है या अच्छी नौकरी है या जो स्वस्थ हैं या सफल हैं, वे बहुत खुश होने चाहिए। परंतु अनुभव से हम सब जानते हैं कि उनके लिए खुशी किसी अलग जगह है और खुश न होने की कोई अलग वजह है। खुशी के मार्ग में अपनी इच्छायें ही बड़े अवरोध बन जाती हैं। यह मिल जाए, ऐसा हो जाए तो ही मैं खुश रहूंगा, ऐसी कडी शर्त खुशी के लिए लगा दी जाती है। जबकि सच्चाई यह है कि यदि हम खुश रहेंगे तो जो चाहते हैं, वह मिल ही जायेगा, हो ही जायेगा। जी हां, यही सत्य है कि खुशी में सफलता है। जब हम खुश रहते हैं तो हमारे भीतर जो आन्तरिक आलस्य है, वह समाप्त हो जाता है। हमारी सूक्ष्म शक्तियां और क्षमताएं क्रियाशील हो जाती हैं और हम कर्मठ हो जाते हैं। यह कर्मठता हमारी सफलता को सुनिश्चित करती हैं। हमारी खुशी सकारात्मकता को हमारी ओर उत्प्रेरित करती हैं और सकारात्मकता सफलता को उद्दीप्त करती है। रिसर्च से साबित हुआ है कि जो लोग खुश रहते हैं, वे प्रायरू सफल होते हैं।

आज हर व्यक्ति खुशी की तलाश में है। खुशी कहां है? अगर किसी भूखे से पूछा जाये तो कहेगा कि रोटी में हैं किसी विद्यार्थी से पूछा जाये तो कहेगा कि प्रथम आने में है। किसी बेरोजगार से पूछा जाये तो कहेगा कि नौकरी में हैं। किसी बीमार से पूछा जाये तो कहेगा कि स्वस्थ होने में हैं। इसका अर्थ तो यह हुआ कि जिनके पास अच्छा भोजन है या अच्छी नौकरी है या जो स्वस्थ हैं या सफल हैं, वे बहुत खुश होने चाहिए। परंतु अनुभव से हम सब जानते हैं कि उनके लिए खुशी किसी अलग जगह है और खुश न होने की कोई अलग वजह है। खुशी के मार्ग में अपनी इच्छायें ही बड़े अवरोध बन जाती हैं। यह मिल जाए, ऐसा हो जाए तो ही मैं खुश रहूंगा, ऐसी कडी शर्त खुशी के लिए लगा दी जाती है। जबकि सच्चाई यह है कि यदि हम खुश रहेंगे तो जो चाहते हैं, वह मिल ही जायेगा, हो ही जायेगा। जी हां, यही सत्य है कि खुशी में सफलता है। जब हम खुश रहते हैं तो हमारे भीतर जो आन्तरिक आलस्य है, वह समाप्त हो जाता है। हमारी सूक्ष्म शक्तियां और क्षमताएं क्रियाशील हो जाती हैं और हम कर्मठ हो जाते हैं। यह कर्मठता हमारी सफलता को सुनिश्चित करती हैं। हमारी खुशी सकारात्मकता को हमारी ओर उत्प्रेरित करती हैं और सकारात्मकता सफलता को उद्दीप्त करती है। रिसर्च से साबित हुआ है कि जो लोग खुश रहते हैं, वे प्रायरू सफल होते हैं।


मनुष्य कहे, सफलता तू आ तो मैं मुस्कराऊं। सफलता कहे, मानव तू मुस्करा तो मैं आऊं। खुशी वर्तमान में है खुशी किस समय महसूस की जा सकती है? निस्संदेह अब इसी समय में। हम वर्तमान में ही कर्म करते हैं और वर्तमान में ही अनुभव करते हैं। अतीत की अच्छी बुरी स्मृतियां हैं अथवा आगत की दुश्चिंतायें या शुभेच्छायें, प्रत्येक की अनुभूति का समय वर्तमान ही तो हैं। खुशी का अनुभव भी वर्तमान में हो सकता हैं। हम यअब्य खुश हो सकते हैं, फिर क्यों हम इसे भविष्य के लिए टाल देते हैं कि तब मैं खुश होऊंगा। खुशी को आश्रित मत कीजिए, न भूत पर, न भविष्य पर। कहा है पास्ट इज हीस्ट्री, फियूचर इज माय पीरीजेन्ट इज पीरीजेन्ट अभिप्राय यही है कि यह घड़ी यह क्षण बहुत अमूल्य है एक सौगात की तरह है। कोई आपको सौगात दे तो क्या करेंगे, मुस्कराकर लेंगे। तो मुस्कराइए, इस दिन इस समय इस पल के लिए। अपनी खुशी को मुक्त कीजिए अतीत के आघातों से और आगत की आकांक्षाओं से । शुरू कर दीजिए खुश रहना आज से अभी से क्योंकि :

ना भूत में, ना ही भविष्य में।
खुश अभी है, इसी समय में।'


एक गांव में एक व्यक्ति अकेला रहता था। सब प्रकार से सम्पन्न होते हुए भी वह अक्सर मुरझाया
हुआ उदास रहता था। उसका जमीन का एक मुकदमा काफी वर्षों से चल रहा था। एक दिन वह आदमी
बहुत बीमार पड़ गया, स्थिति मरने की आ गई। गांव के लोग उससे मिलने गये तो आश्चर्यचकित रह
गये क्योंकि वह बहुत खुश था, मुस्करा रहा था। उससे पूछा गया कि आपको ऐसा क्या मिल गया जो
आप इतने प्रसन्न है? उस व्यक्ति ने कहा कि मुझे खुशी मिल गई क्योंकि मेरी बहुत बड़ी चिंता मिट गई
हैं। जीवन भर मैं इस बात की चिंता करता रहा कि मुकदमे का फैसला मेरे हक में होगा या नहीं। आज
जब मैं इस संसार से जा रहा हूं तो क्या फर्क पड़ता है कि फैसला क्या आता है। मुझे उसकी फिक्र नहीं
है, इसलिए मैं खुश हो गया हूं।


विचार करें, उस व्यक्ति का भविष्य की चिंता करना और उस आधार पर खुशी से वंचित रहना जरूरी
था, जायज था? उसकी तरह कहीं हम भी खुशी को टाल तो नहीं रहे हैं, व्यर्थ चिंता करके खुशी को आने से
रोक तो नहीं रहे हैं? फिर भी उस व्यक्ति को खुशकिस्मत कहेंगे कि कम से कम जीवन के अंतिम पलों
में तो उसने खुशी को पा लिया, कारण कि उसके पीछे कोई नहीं था। लेकिन इस संसार में कितने ही
लोग ऐसे हैं जो जीवन भर तो घर-बार, बाल बच्चे, धन-साधन, जमीन-जायदाद, नौकरी -धंधे आदि की चिंता
में खुशी को अपने समीप नहीं आने देते। अंत समय भी पीछे वालों की चिंता में शरीर छोड़ते है और
यअंत मति सो गत्यि के हिसाब से आगे भी स्वयं को खुशी से वंचित कर देते हैं।


खुशी हमारे पास ही है
हम खुशी को महसूस नहीं कर पाते क्योंकि हमारी नजर प्राप्ति की बजाए अप्राप्ति पर ज्यादा टिकी
रहती है। यदि हम इस बात पर विचार करें कि इस संसार में हमें क्या -क्या प्राप्त हुआ है और वह
कितना कीमती है, तो खुशी हमारी हो जाती है, लेकिन होता क्या है कि जो चीज हमें प्राप्त हो जाती है,
वह कौडी जैसी हो जाती है और जो प्राप्त नहीं होती, वह हीरे जैसी लगती है। यदि हम अपनी प्राप्तियों
का ठीक रीति से आंकलन करे तो हमें महसूस होगा कि जो जीवन आज हम जी रहे हैं, वह लाखों नहीं
बल्कि करोड़ों लोगों के लिए एक सपना है। इतने लोगों के सपनों का जीवन हम जी रहे हैं तो हम कितने
खुशनसीब हैं ।

कहते हैं कि एक बार मुल्ला नसीरूद्दीन अपने घर के आगे बैठा था। एक व्यक्ति उसके पास आकर बैठ
गया। बातों -बातों में उसने बताया कि वह एक व्यापारी हैं। उसने बहुत धन कमाया लेकिन उसे खुशी
नहीं मिली। खुशी की तलाश में ही वह यहां- वहां घूम रहा है। मुल्ला सोच में पड़ गया, उसने उसकी
पोटली देखकर पूछा कि इसमें क्या हैं? उसने बताया कि इसमें उसने यात्रा खर्च के लिए धन रखा हुआ हैं।
मुल्ला ने आव देखा न ताव और उसकी पोटली लेकर दौड़ पड़ा। व्यापारी के होश उड़ गए। उसको तो
स्वप्न में भी नहीं था कि मुल्ला ऐसा करेगा। वह उसको पकडने के लिए दौड़ा लेकिन मुल्ला आगे निकल
चुका था। मुल्ला ने उसकी पोटली सड़क से थोड़ा किनारे रख दी और खुद पेड़ के पीछे छिप गया। ढूंढते-
ढूंढते हैरान परेशान व्यापारी की नजर जब अपनी पोटली पर पड़ी तो वह खुशी से चीख पड़ा, मिल गई
मिल गई। मुल्ला पेड़ के पीछे से निकला तो उसने नाराजगी दिखाई, तुम मेरी पोटली लेकर क्यों भागे?
मुल्ला ने कहा, पहले यह तो बताओ तुम कितने खुश हो? उसने कहा बहुत -बहुत खुश। मुल्ला ने कहा,
यही तो तुम चाहते थे, खुशी, तुम्हें मिल गई ना। अब इसे संभालकर रखना। यह कहकर मुल्ला वहां से
चलता बना और व्यापारी हैरानी से इस बात पर सोचता ही रह गया। खुशी प्राप्त करना, खुशी का अनुभव
करना और खुश रहना इतना ही सहज है। खुशी सिर्फ इतने भर में ही है- यहां, मैं खुश हूं। लियो
टॉलस्टॉय ने कहा कि- यदि आप खुश होना चाहते हैं, हो जाइए। अपने आप से पूछे - क्या मैं खुश हूं?
जवाब में मुस्करायें और कहें हां, मैं खुश हूं। प्रत्येक दिन हमें चुनाव की स्वतंत्रता देता है कि हम आज
का दिन कैसे बिताना चाहते हैं? खुश रहने का चुनाव कीजिए और खुश हो जाइए.( अलवर)