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मन को साधने की कला है योग

ए के रावल योगाचार्य

मन ही ईश्वर

मन से बड़ा न कोय

तोरा मन दर्पण कहलाय

 बड़ा ही मधुर गीत है। पर मन क्या हैं? यह एक बहुचर्चित विवादास्पद मामला है। अंग्रेजी में मन माइंड होता है। हिंदी में माइंड मस्तिष्क या दिमाग होता हैं। भारतीय संस्कृति में मन हमेशा चर्चा का विषय रहा है। प्रत्येक जीव ईश्वर की संतान है। हर एक में उसकी छवि विद्यमान है। प्रत्येक मन में इसकी सत्ता का आभास है। आधुनिक सेटेलाइट्स के युग में जहां मनुष्य ने आधुनिकतम विकास के रास्तों को अपनाया है, सूचनाओं का अंबार उसके पास है। वहीं मानसिक शांति का अभाव, मन की भटकन परिणामस्वरूप पाई हैं। उदाहरणार्थ एक कुआं या कोई भी जल स्थान है। यदि पानी स्थिर हो तो नीचे पैंदे तक स्पष्ट दिखता है, लेकिन यदि एक पत्थर डाल देंगे तो सब कुछ हिल जाएगा और कुछ भी स्पष्ट नहीं दिखेगा। ठीक यही दशा चित्त की है। यदि मन अशांत है तो व्यक्ति निर्णय नहीं ले पाता। अस्पष्टता और अनिर्णय की स्थिति में उसे बेचौन रहना पड़ता है। यही बेचौनी और अनिर्णय कई बार मनुष्य को अपराध और बुरे व्यसनों की ओर ले जाते हैं। जब भी कोई बुरा काम होता हैं तब सर्वप्रथम मन ही रोकता है। इसी भाव को इस गीत में बहुत ही सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया गया हैं।

 

इतनी शक्ति हमें दे न दाता

मन का विश्वास कमजोर हो ना

 हम चलें नेक रास्ते में

 हम से भूलकर भी कोई भूल हो ना।

 योग का अर्थ है चित्त वृत्ति निरोध, चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण अर्थात मन के घोड़े पर काबू करना सीखाता है योग। मन को साधने के लिए ऋषियों ने कई उपाय बताए हैं। अब आपके मन में प्रश्न आ सकता है हम इतना फ्लैश बैक में क्यों जा रहे हैं पर आधुनिक प्रतिस्पर्धा के युग में हमें अपने तन और मन दोनों को तंदुरूस्त रखकर आगे बढना पड़ता है तब कहीं सफलता के दर्शन होते हैं। मनिषियों ने मन पर नियंत्रण का जो सर्वसुलभ और सरल साधन बताया है उसी का आधुनिक रूप है योग। योग का और आधुनिकीकरण योगा के रूप में हो गया है। जब योग विदेशों से योगा बन कर लौटा तब हमने उसकी अहमियत को पहचाना। कहा गया है स्वस्थ्य शरीर में ही स्वस्थ्य आत्मा का निवास होता है और मन के हारे हार, मन के जीते जीत।

 अतरू यदि हमारे तन और मन डोल रहे हैं और हमारे दिल को कटार (चौन )नहीं है तो सफलता संभव नहीं। मन को एकाग्र करना अत्यंत आवश्यक है पर अत्यंत मुश्किल भी । आज मनोरोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और मनोरोग के परिणामस्वरूप शारीरिक बीमारियां भी तेजी से बढ़ रही है। इस मनोवृत्ति के कारण हताश और तनाव बढ़ता जा रहा है। मन को साधने की प्रक्रिया में हमें ईश्वर से सर्वप्रथम यही प्रार्थना करनी चाहिए।

हमको मन की शक्ति देना

 मन विजय करें

 दूसरों की जय से पहले

खुद को जय करें

 इसके साथ ही निम्नलिखित योग की क्रियाएं की जानी चाहिए

ध्यान, प्रार्थना आसन, ताड़ासन, शशांक आसन

योगमुद्रा,  भुंजगासन,  मक्रासन, निस्पंद भाव,  क्रोकोडायल१,२

सेतुबंद,  पर्वतासन,  प्राणायाम,  कपालभांति,  भ्रामरी,  योग, अनुलोम विलोम

,योनिमुद्रा, ध्यान, त्राटक, शवासन, योगनिंद्रा

 प्रारंभ में डॉक्टर और योग विशेषज्ञ की सलाह से योग की क्रियाएं की जानी चाहिए। प्रत्येक योग की क्रिया में लंबी गहरी कछुए जैसी सांस लेना और छोडना चाहिए। सांस तोडना नहीं चाहिए। कुत्ते जैसी लंबी -लंबी सांसें नहीं लेनी चाहिए। इसके साथ -साथ मनुष्य को २ से ३ किलोमीटर छत पर, बरांडे में या सड़क पर घूमना चाहिए। शाम को भोजन सुपाच्य, सोने से दो घंटे पहले करना चाहिए। दिन में एक वक्त दिल खोलकर हंसना चाहिए।

अगस्त