• A-
  • A
  • A+

पवित्रता संभव है

क्या आज के युग में जीवन में पवित्रता धारण करना संभव है ? इन्टरनेट के जाल में फंसा आज का मानव शायद पवित्रता के बारे जानता नहीं है ? किसी भी व्यक्ति की रूचि यह जानने में होती है कि वह कुछ भी करे तो उससे उसका फायदा क्या होगा ? जबमानव यह समझ लेता है कि पवित्रता क्या है और पवित्रता की धारणा करने से उसके व्यक्तित्व में कितना निखार और अद्भुत आकर्षण आ जाता है तो फिर वह अपने जीवन में पवित्रता धारण कर सकता है |

दुनिया में हम देखते हैं कि अपने को सुन्दर दिखने के लिए लोग ब्यूटी पार्लर में जाते हैं | बहुत सी ब्यूटी क्रीम के विज्ञापन टीवी चैनलों और प्रिंट मीडिया में दिखाए जाते हैं | और काले रंग को गोरा होता हुआ दिखाते हैं | जो कि वास्तव में होता नहीं है | जबकि पवित्रता मानव जीवन का श्रेष्ठ श्रृंगार है | स्वयं मैंने देखा है कि पवित्रता अपनाने वालों के रंग में बिना किसी ब्यूटी क्रीम के यथार्थ रूप में अलौकिक चमक आने लगती है | लेकिन पवित्रता की धारणा दो तरह से हो सकती है | एक है वरदान के रूप में पवित्रता की धारणा करना और दूसरा है मेहनत करके पवित्रता को धारण करना | आम तौर पर पवित्रता को धारण करना मुश्किल लगता है | जबकि किसी भी तरह की अपवित्रता सहज लगती है और कुछ समय तक आकर्षक भी लगती है | अपवित्रता का आशय है अपने अंदर की कमजोरी | सवाल उठ सकता है कि अन्दर की कमजोरी आकर्षक कैसे लग सकती है | इसका उदहारण यह है कि किसी परिवार का सदस्य गुस्सैल हो तो सभी लोग उसके गुस्से की बहुत तारीफ करते हैं कि ये तो बड़े गुस्से वाला है | लोग उसकी महिमा करने लगते हैं | ऐसे लोगों की सुख शांति से दूर-दूर का रिश्ता भी नहीं होता | इसी तरह दारू पीने वालों के भी बहुत लोग फैन बन जाते हैं और कहते हैं पूरी बोतल पीकर भी डकार नहीं लेता | अभी कुछ दिन पहले मैंने एफ एम रेडियो में किसी को मजाक करते सुना था | जिसमे एक व्यक्ति किसी महिला फोन करता है और कहता है , ‘मैंने आपसे जरूरी बात करनी है , प्लीज फोन नहीं काटना | वह आगे कहता है कि चाय पीना शराब पीने से भी ज्यादा नुकसान करता है | आप फोन नहीं बंद करना मैं बताता हूँ कि कैसे ? वह बोला, ‘ रात मैंने शराबखाने में ४-५ पैग लगाए, रात के ग्यारह बज गए | उसके बाद दो-तीन पैग और लगाए तो रात के दो बज गए | फिर मैं घर गया | तब तक मेरी बीबी चार कप चाय पी चुकी थी | मैं जब घर पहुंचा तो वह जोर-जोर से बोलने लगी, बड़ा अनाप-शनाप बोली | मैं तो चुपचाप शांत खड़ा था | मैं कुछ नहीं बोला | तो बताइए चाय ज्यादा नुकसान करती है या दारू ?” इस तरह लोग अपनी कमजोरी को भी बहुत बड़ी बात समझने की भूल करते हैं |

पवित्रता को धारण करने का दूसरा तरीका है वरदान के रूप में प्राप्त करना | वरदान को सदा जीवन में प्राप्त करने के लिए सिर्फ एक बात का अटेंशन चाहिए कि वरदाता और वरदानी दोनों का संबंध समीप और स्नेह के आधार से निरंतर चाहिए | इस बात को समझने की आवश्यकता है, यहाँ वरदाता वह सर्व शक्तिवान परम सत्ता है जिसे ढूँढने का प्रयास सदा से महान तपस्वी करते रहे हैं | वरदाता और वरदानी आत्माएं अर्थात आत्मा और परमात्मा दोनों सदा कंबाइंड रूप में रहें तो पवित्रता की छत्रछाया स्वतः रहेगी | यह अटल अध्यात्मिक नियम है |  जहाँ सर्व शक्तिवान परमात्मा का साथ है वहां अपवित्रता स्वप्न में भी आ नहीं सकती है | शर्त यह है कि आत्मा और परमात्मा सदा युगल रूप में रहें | यही आध्यात्मिकता है | परमात्मा को अपना कम्पैनियन बनाने वाले के लिए पवित्रता अति सहज रूप में जीवन में धारण हो जाती है | उनके लिए यह सवाल ही पैदा नहीं  हो सकता कि पवित्र रहूँ, पवित्र बनूँ , लाइफ ही पवित्रता है | आत्मा का आदि-अनादि स्वरूप ही पवित्रता है | जब यह स्मृति आ जाती है कि‘मैं आदि-अनादि पवित्र आत्मा हूँ’ यह स्मृति ही पवित्रता को धारण करने की सामर्थ्य ले आती है | जबकि संगदोष के संस्कार अपवित्रता के हैं | तो सहज क्या है , निजी संस्कारों को इमर्ज करना सहज है या संगदोष के संस्कारों को इमर्ज करना सहज है | इस संबंध में अव्यक्त वाणियों में पवित्रता की महिमा इस प्रकार की है – पवित्र दृष्टि आँखों की रोशनी है | पवित्र कर्म जीवन का विशेष धंधा है | पवित्र संबंध और सम्पर्क जीवन की मर्यादा है | तो सोचो जीवन की महानता क्या हुई ? पवित्रता हुई न ?”

ऐसी महान चीज को अपनाने में मेहनत नहीं करो, हठ से नहीं अपनाओं | मेहनत और हठ निरंतर नहीं हो सकता | लेकिन यह पवित्रता तो आपके जीवन का वरदान है | इसमें मेहनत और हठ क्यों ? अपनी निजी वस्तु है | अपनी चीज को अपनाने में मेहनत क्यों ? पराई चीज़ को अपनाने में मेहनत होती है | पराई चीज़ अपवित्रता है , न कि पवित्रता | अपनी चीज़ पर नशा होता है | इस संबंध में अव्यक्त वाणियों में ईश्वरीय महावाक्य देखने योग्य हैं : “ सदा स्व-स्वरूप पवित्र है | स्वधर्म पवित्रता है अर्थात् आत्मा की पहली धारणा पवित्रता है | स्वदेश पवित्र देश है | स्वराज्य पवित्र राज्य है | स्व का यादगार परम पवित्र पूज्य है | कर्मेन्द्रियों का अनादि स्वभाव सुकर्म है | बस यही सदा स्मृति में रखो तो मेहनत और हठयोग से छूट जाएँगे |”