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कर लें कर्म की पहचान

कर लें कर्म की पहचान

  बी. के. अनुभा, अलवर

एक राजा ने दरबार के कुछ लोगों को बुलाया और उन्हें कार्य दिया कि सभी एक-एक बोरा ले जाएं और शाही बगीचे से पके मीठे फल तोड़-तोड़कर उसमें भरंे। बगीचे में पहुँचने पर एक-दो लोग तो बड़ी तत्परता से कार्य में जुट गये। कुछ लोग आपसी बातचीत में और कुछ बगीचे की शोभा और सुन्दरता को निहारने में लग गये। कुछ लोग मीठे पके फल खाकर वहीं ठण्डी छाया में सुस्ताने लगे। बगीचे के रखवाले ने आकर जब सूचना दी कि राजा सभी को याद कर रहे हैं तो उन्हें कार्य याद आया। कुछ लोगों ने जल्दी-जल्दी कच्चे-पके, गिरे हुए, कुचले हुए फल जमा कर भर लिये। कुछ ने सोचा कि राजा कौन-सा बोरा खुलवा कर देखेगा, इसलिए आराम से लता-पत्ता, घास-फूस इकट्ठा करके भर लिया। जब राजा के पास पहुँचे तो राजा ने सबको अज्ञात स्थान पर भेजते हुए आदेश दिया कि हरेक का बोरा उसके पास ही रहेगा और उसे सप्ताह भर उससे ही काम चलाना होगा। अब सबकी दशा देखने लायक थी क्योंकि जो फल जमा किया था, वही खाना था। कुछ हैरान हो रहे थे, कुछ रो रहे थे, कुछ अपना सिर धुन रहे थे। कुछ ऐसे थे जो ऐसे विचित्र आदेश के लिए राजा को कोस रहे थे और कुछ तो अपने भाग्य को कि उनके भाग्य में वही कच्चे-कुचले फल और लता-पत्र खाने ही लिखे थे। केवल कुछ गिने-चुने लोग ही खुश थे, उसी अनुपात में जिस अनुपात में उन्होंने मेहनत कर पके-मीठे फल भरे थे।

यही हम सबके कर्मों की कहानी है। जो पूर्व जन्मों में हमने जमा किया, वही फल खाना है। स्वयं को प्राप्त फल के लिए हम स्वयं ही जिम्मेवार हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे कर्म जिम्मेवार हैं। यह सृष्टि एक विशाल कर्मक्षेत्र है। यहाँ कर्मों का ही खेल चल रहा है। कर्म के अनुसार ही कोई हँसता है, कोई रोता हैय कोई पाता है, कोई खोता है। कर्म ही भाग्य का आधार है, बिना किए भाग्य नहीं बनता। यह भी सत्य है कि भाग्यवान व्यक्ति ही कर्मकुशल होते हैं, शेष तो यूँ ही बैठकर अपना जीवन गँवाया करते हैं। इस संसार में जिसने कर्म के महत्व को समझ लिया, वह कभी पापकर्म और निठल्लेपन की तरफ प्रवृत्त नहीं होगा। सुख और शान्ति, जो हर मानव की चाहना है, कर्म ही उस खजाने को प्राप्त करने की चाबी है। वस्तुतः कर्म किए बिना मानव रह नहीं सकता लेकिन उसे इस बात को जानने की बड़ी आवश्यकता है कि किस प्रकार के कर्म करने चाहिएँ। कर्मों की पहचान करने से मानव अपने जीवन में कभी भी कष्ट का अनुभव नहीं कर सकता।

कर्म बनें देव समान

कर्मशास्त्र का सच्चा सार यह है कि मानव अपने कर्मों से दाता बने, लेने का प्रयास न करे। देने से जो पुण्य जमा होता है, वह उसे कई गुणा लेने का अधिकारी बना देता है। देने वाले के हाथ कभी खाली नहीं रहते और लेने वाला कभी भरता नहीं। ‘देना’ या ’लेना’ यह मनोवृत्ति की बात है। जिसके भीतर देने की भावना होती है, वह कैसी भी स्थिति में देकर ही रहता है भले ही उसके एवज में तात्काालिक रूप से उसे कोई कष्ट भी उठाना पड़े। जिसके भीतर देने की इच्छा जागृत हो जाती है, वह सच्चे अर्थों में देवत्व की ओर अग्रसर हो जाता है। देवताओं का हाथ सदा देने की मुद्रा में दिखाते हैं जो यह स्पष्ट करता है कि वे सदा भरपूर हैं, उनका भण्डारा कभी खाली नहीं होता। अगर मनुष्य भी इस एक शब्द के अन्तर को समझ जाये तो उसके भाग्य में महान परिवर्तन हो जाये।‘देना’ और ‘लेना’ इन शब्दों में ‘द’ और ‘ल’ का ही अन्तर है लेकिन वास्तविक रूप में यह अन्तर इतना बड़ा है जो एक को राजा और दूसरे को कंगाल बना सकता है।

कर्म हों धर्म समान

कहा जाता है- कर भला तो होगा भला अर्थात् हम जो देते हैं वही पाते हैं। किसी को फूल देंगे तो फूल मिलेंगे। किसी की झोली में काँटे डालेंगे तो वे ही एक दिन शूल बनकर हमारे पाँव में चुभेंगे। कर्म का फल न केवल अविनाशी होता है बल्कि वह एक का कई गुणा भी हो जाता है। कर्म का फल कितने गुणा मिलेगा, यह कर्म करते समय रही आंतरिक भावना पर निर्भर करता है। जब कर्म के प्रति बहुत श्रेष्ठ, शुद्ध, निर्मल, सेवा और परोपकार की भावना होती है तो ऐसा कर्म साक्षात् धर्म ही बन जाता है जो मानव को सर्व धार्मिक क्रियाकलापों का पुण्य क्षण भर में प्रदान कर देता है। वास्तव में तो धर्म का मर्म यही है कि वह मानव के कर्मों में आये। हमारे कर्म धर्मसम्मत हों। धर्म जब कर्म में उतर आता है तो वह सच्चे अर्थ में व्यक्ति को धार्मिक बना देता है।

कर्मगति है बलवान

कर्म सिद्धांत कहता है कि जो प्रयत्न आज आप करेंगे वही कल आपको भाग्य में मिलेगा। लेकिन प्रयत्न की बजाए खाली भगवान के या भाग्य के भरोसे रहेंगे तो जीवन में दुःख उठाना पडे़गा। कुछ भी पाने के लिए सिर्फ इच्छा रखना पर्याप्त नहीं है लेकिन उसके अनुकूल परिश्रम भी करना ही पड़ेगा। जो समर्थ होते भी मेहनत से जी चुराता है, उसके लिए तो भगवान भी कुछ नहीं कर सकता।

एक बार शंकर-पार्वती आकाश मार्ग से घूमने निकले। पार्वती ने नीचे मृत्युलोक की ओर देखा तो उन्हें चारों ओर दुःख नजर आया। उन्होंने पूछा- ‘‘हे प्रभु! मृत्युलोक की दशा देखिए। इतना दुःख! भगवन्, ऐसा क्यों है, आप कुछ कीजिए।’’

‘‘देवी, मैं क्या कर सकता हूॅं! मृत्युलोक के प्राणी दःुख ही चाहते हैं, दःुख के लिए प्रयास करते हैं, दुःख के रास्ते की ओर जाते हैं तो मैं क्या करूँ?’’

‘‘दुख चाहते हैं! यह कैसे हो सकता है भगवन्? वह देखिए, वह आपका भक्त सुख के लिए आपकी प्रार्थना कर रहा है।’’

‘‘चलो, नजदीक जाकर देख लेते हैं।’’

भक्त करुण पुकार कर रहा था- ‘‘हे प्रभो! मेरी गरीबी दूर कर दीजिए।’’

‘‘यह तो धन चाहता है।’’

‘‘प्रभु, धन मिल जायेगा तो यह सुखी हो जायेगा।’’

‘‘देवी, ऐसा नहीं है।’’

‘‘हे प्रभु! आप इसे धन दे दीजिए।’’

‘‘देवी, इसके भाग्य में नहीं है, पुण्य का खाता अति क्षीण है। धन देकर मैं इसे और दुःखी नहीं कर सकता।’’

‘‘प्रभु, मेरे कहने से ही दे दीजिए।’’

‘‘ठीक है, मैं दे देता हूँ लेकिन फिर जिम्मेवारी तुम्हारी है। मुझे कुछ मत कहना।’’

चमत्कार हुआ और भक्त एकाएक मालामाल हो गया। खुशी के मारे वह फूला नहीं समा रहा था। पड़ोसी ने उसे बहकाया-‘‘तुम्हारा भाग्य बहुत प्रबल है। जुआ खेलो तो कई गुणा धन हो जायेगा। लालच में आकर उसने दाँव खेला और सारा धन हार गया। उसे इतना गहरा धक्का लगा कि पागल हो गया। इस प्रकार, बिना परिश्रम और भाग्य(पूर्व के संचित कर्म) के प्राप्त धन ठहरा नहीं, और ही कई गुणा कष्ट देकर भाग गया।

मानव को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि जो उसने कल किया, उसका परिणाम आज है और जो आज कर रहा है उसका परिणाम आने वाला कल है। यदि मैंने अपने कल पर ध्यान नहीं दिया तो अपने आज पर तो ध्यान दूँ। आज को सँवार लूँ क्योंकि अतीत में पीछे जाकर उसे सँवारना संभव नहीं है। न अतीत को बार-बार याद कर पश्चाताप करना ही कोई समझदारी है। अपने बीते हुए कल(भूत) की काली छाया वर्तमान पर न पड़ने दें। सदा समझें, आज का दिन मेरी बची हुई जिन्दगी का पहला दिन है और मुझे एक नई शुरुआत करनी है।

कर कर्मों की पहचान, आज से बनायें कर्म महान।

सुख का खाता जमा हो, दुःख का खाता भुगतान।।