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रक्षाबंधन: एक आध्यात्मिक अनुशीलन

 

ब्रह्माकुमारी हेमलता दीदी

स्वभाव से स्वतंत्र प्रेमी होने के नाते मनुष्य हर बंधन से छूटना चाहता है। परंतु रक्षाबंधन एक ऐसा बंधन है, जिसमें बंधने के लिए मनष्य कई कोसों की दूरी भी पार कर जाता है। यदि किसी का भाई या बहन न हो तो धर्म -भाई अथवा बहन बनाकर इस बंधन में बांधते बंधते देखे जाते हैं, यह जीवन में उत्सव और उल्लास का पर्याय है। संसार के प्रायः सभी बंधन दुखदायी है लेकिन यह अविनाषी धार्मिक बंधन मानव के लिए सुखों की सौगातों से भरपूर है । एक परिपाटी के रुप में औपचारिक रुप से मनाये जाने के कारण वर्तमान में इस त्यौहार की महत्ता कम होती दिखती, जबकि यह विशुद्ध रुप से एक आध्यात्मिक रस्म है।

               किसी, व्यक्ति, जाति, धर्म विशेष से संबंधित न होकर यह त्योहार एक गुह्य आध्यात्मिक भावना अपने में समेटे हुए है। प्रत्यक्षतः यह भाई- बहन की के सत्य, अविनाषी त्याग भरे रिश्ते भावना के रुप में दिखाई देता है। रक्षा बंधन वह प्यारा बंधन है जो अनेक बंधनों से मुक्ति दिलाने के अलावा मृत्युपाश से भी छुडाने की सामर्थ रखता है।

               रक्षा बंधन में रुढिगत रुप से तीन और रस्में देखी जाती है- तिलक लगाना, मुह मीठा करना और आरती उतारना । वस्तुतः तिलक आत्म स्मृति का पर्याय है, जो बताता है कि हम इस जड़, विनाशी तन में भृकुटि के मध्य विराजिम अविनाषी, चैतन्य आत्मा है। मिठाई खिलाने की परंपरा का गुढार्थ कि हम मधुर वचन बोले हमारे बोल-चाल, व्यवहार में कभी कटुता न आ सके।

               कोई भाई बहन के साथ हर पल तो नहीं रह सकता । फिर वह उसकी रक्षा कर पाने में कैसे समर्थ हो सकता है। कई बार यह भी देखा जाता है कि भाई शारीरिक तौर पर ही नहीं बल्कि आर्थिक और मानसिक तौर पर भी बहन की रक्षा करने में अक्षम होता हैं, फिर भी राखी बांधकर, मिठाई खिलाकर और आरती उतारकर परम्परा का निर्वाहन किया जाता है।

                स्वाभाविक रुप प्रष्न उठता है कि रक्षा की जरुरत केवल बहन को ही है, भाई को नही ? इतिहास ऐसी अनेक नारियों की गौरव गाथाओं से भरा पडा है, जिनसे पुरुषों की सक्षम सेनाएं भी रक्षा चाहती थी । झांसी की रानी लक्ष्मीबाई,रानी दुर्गावती ऐसे चंद उदाहरण मात्र है। ष्षास्त्रीय परंपरा अनुसार बाल्यवास्था में स्त्री की सुरक्षा में पुत्र का बताया गया है। तो फिर रक्षाबंधन केवल भाई को ही क्यों ?

वास्तव में रक्षा बंधन कोई स्थूल बंधन नहीं, वरन् धर्म का बंधन है। यह मन, वचन और कर्म से पवित्रता की मर्यादा की रक्षा का बंधन है। जो इस पवित्रता की रक्षा करता है, पवित्रता उसकी रक्षा करती है। बहन- भाई के रिस्ते में पवित्रता समाई होने से बहनें यह षुभ कार्य करती हैं।

               वास्तव में हर मनुष्य को हर प्राकर की रक्षा की जरुरत है। एक आदर्ष समाज के समाज के बारे में परिकल्पना है कि प्राणी मात्र का नाम, मान, षान इज्जत, धन, जीवन इत्यादि सुरक्षित रहे। जबकि कोई भी प्राणी किसी दूसरे प्राणी की सर्व प्रकार से रक्षा करने में कतई समर्थ नहीं हो सकता है।

सदाकाल की पवित्रता और सर्व प्रकार की सुरक्षा की ग्यारण्टी देने में एक मात्र परमपिता परमेष्वर ही सक्षम है, जो सृष्टि नाटक के नियन्ता और परिवर्तक है। गीता में उनका वचन है- सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकम षरणम व्रज अहम् त्वाम् सर्व पापेभ्योः विमोक्ष्यामि। अतः मनुष्य को वर्तमान समय बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए परमात्मा की आज्ञाओं का अनुषरण करना चाहिए। कलियुग अंत और सतयुग आदि के वर्तमान संगम युग  पर कुपासिंधु परमात्मा स्वयं हर मनुष्य आत्मा को श्रेष्ठ कृति, वृत्ति और दृष्टि की राखी बांधते हैं। किसी लिंग, जाति, देश, धर्म , भाषा, संस्कृति के तमाम भेद-भावों को परे रखकर हर विकारी आत्मा पर रहमत की नजर रखने वाले परमपिता उसे राखी बंधवाने का अधिकार समझते है । जहां पवित्रता आ जाती है वहां सर्व प्राप्तियां स्वतः अनुगामिनी हो जाती है।                                                                                                               

ज्ञानषिखर ओमषान्ति भवन, इंदौर