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आज का लेख

हर दिन दिवाली मनाएँ

जीवन के दो ऐसे भाव हैंए जो हर चीज प्राप्त करने के लिए पर्याप्त हैं। इनके बिना सफल होना लगभग असंभव है। क्या आप जानते हैं वे कौन से गुण हैं  हैं उम्मीद और विश्वास!


जी हाँ उम्मीद ही वह शक्ति हैए जो इंसान को नकारात्मक स्थिति में भी धीरज रखना सीखाती है और विश्वास वह ऊर्जा हैए जो इंसान के जीवन में सफलता आकर्षित करती है। फिर चाहे वह अच्छा स्वास्थ्य होण्ण्ण् दौलत होण्ण्ण् मन की शांति होण्ण्ण् मधुर रिश्ते हों या मोक्षण्ण्ण्। भौतिक और आध्यात्मिक सफलता का सारसूत्र हैए ष्उम्मीद और विश्वासष्। एक ही सिक्के के ये दो पहलू स्वास्थ्य प्राप्ति की दवा और मुक्ति का दावा भी हैं।


अगर आपको आनंद की चरमसीमा छूनी हैण्ण्ण् अपनी सभी संभावनाएँ खोलनी हैं और हर रोज़ दिवाली मनानी है तो उम्मीद के दीए से हर दिन विश्वास की दिवाली मनाएँ। क्योंकि उम्मीद वक्त का सबसे बड़ा सहारा हैए है उम्मीद तो हर लहर किनारा है। आपकी हर समस्या को मिटानेवालाए हर समस्यारूपी लहर को किनारा देनेवाले भाव हैं. ष्उम्मीद और विश्वास।


उम्मीद रखते ही आपके मन में विश्वास जाग्रत होता हैए विश्वास से उम्मीद और बढ़ने लगती है। आपने इस बात का बचपन में कई बार अनुभव किया होगा। याद कीजिए वह दिन जब आपके इम्तिहान चलते थे। मानोए आपको गणित और साइन्स विषय की पढ़ाई बहुत कठिन लगती थी। ष्मैं फेल तो नहीं हो जाऊँगाण्ण्ण् मुझे गणित में कितने माक्र्स मिलेंगेघ्ष् ऐसी चिंता आपको सताती थी मगर उतने में कोई ऐसा इंसान आपकी सहायता के लिए आता थाए जो आपको कम से कम समय में गणित के फॉर्मूला कंठस्थ करने का रहस्य बताता था। कई बार वह इंसान आपका बड़ा भाईए आपके माता.पिताए कोई टीचर या आपका दोस्त था। एक बात तो निश्चित है कि कठिन फॉर्मूला कंठस्थ करने का रहस्य जानकर इम्तिहान के एक दिन पहले आपके मन में अच्छे नंबरों से पास होने की उम्मीद जगती थी।जिससे आपका विश्वास और भी दृढ़ हो जाता था और आप बड़े आत्मविश्वास से इम्तिहान देते थे। इसी विश्वास के कारण आपमें साइन्स में भी अच्छे माक्र्स पाने की उम्मीद प्रबल हो जाती थी। आप लगातारए बिना थकेए बिना रुके पढ़ाई करते थे और परिणाम आपको साफ मालूम थे। आप दोनों कठिन विषयों में अच्छे अंक प्राप्त करते थे।


इस घटना पर गौर करें क्योंकि आपके जीवन में लगातार यह सिलसिला शुरू है। गणित का इम्तिहान देने से पहले आप अंदर से डरे हुए थे। मगर उम्मीद जगते ही आपने आत्मविश्वास के साथ समस्या का सामना किया। इसी विश्वास ने आपकी उम्मीद और बढ़ाई। इसलिए हमेशा याद रखेंए ष्उम्मीद रखने से विश्वास टिकता है और विश्वास टिकते ही उम्मीद और बढ़ जाती है।


जीवन के इम्तिहान में भी इंसान को कई घटनाओं काए समस्याओं का सामना करना पड़ता है। एक इम्तिहान होते ही दूसरी कठिन समस्या उसका इंतज़ार करती है। कभी बीमारियों की वजह से इंसान परेशान हो जाता है तो कई बार मनमुताबिक घटना न होने पर नाराज़ होता है। आर्थिक समस्याएँ उसे अशांत एवं अस्वस्थ बनाती हैं या कभी पारिवारिक समस्याएँ उसका जीवन बंजर भूमी की तरह बनाती है। अंतिम सत्य प्राप्त करनेवाला खोजी भी ष्मुझे सत्य कब प्राप्त होगाघ् मुझे आत्मसाक्षात्कार कब होगाघ्ष् इस सवाल को लेकर नाराज़ हो सकता है। मगर नाराज़ए क्या जानेगा राज़घ् ना.राज इंसान सफलता का राज़ कभी जान ही नहीं सकता क्योंकि सफलता प्राप्ति का पहला पायदान हैए ष्उम्मीदष्। मृत्यु से जूझ रहा इंसान भी पुनः जीवन प्राप्त कर सकता हैए अगर उसके मन में जीने की उम्मीद जगी है तो।


विश्व की तमाम सफलताओं का सार उम्मीद और विश्वास ही है। अगर आपके मन में उम्मीद है तो आपको अंधेरे में भी प्रकाश की किरण दिखाई देगी। जहाँ विश्वास का अस्तिŸव हैए वहाँ साक्षात् स्वर्ग का निर्माण हो सकता है और जहाँ विश्वास नहीं हैए वहाँ केवल दुःखद भावना का ही वास होता है। जो पूर्ण रूप से विश्वास रख पाते हैंए वे सकारात्मक ऊर्जा और पूर्णता की भावना से लबालब भर जाते हैं। वे प्रेमए आनंदए शांतिए समृद्धिए परमसंतु िजैसे दिव्य गुणों की वर्षा में भीग जाते हैं और उनका पृथ्वी पर आने का उद्देश्य भी सफल हो जाता है। क्योंकि शारीरिकए मानसिकए सामाजिकए आर्थिक और आध्यात्मिक जीवन के सभी स्तरों पर यह नियम सक्रिय है. ष्उम्म्मीद रखने से विश्वास बढ़ता है और विश्वास रखने से ही आपको परिणाम प्राप्त होते हैं।ष्
सुबह उठते ही आपके मन ने कहाए ष्आज वातावरण बहुत खराब है। आज बहुत थकावट और सुस्ती महसूस हो रही है।ष् अब यदि यह विश्वास आपके अंतर्मन में पक्का हुआ है तो ज़ाहिर सी बात है कि आज आप पूरे दिन थकावट और सुस्ती ही महसूस करेंगे। हालाँकि वातावरण खराब होने के बावजूद भी अन्य लोगों का दिन बहुत ही तरोताज़ा और उत्साह से भरा होगा। मगर केवल आपका ही दिन इसलिए खराब गया क्योंकि आपके अंदर वैसा विश्वास निर्माण हुआ। इसी विश्वास ने आपके अंदर सुस्ती और थकावट की भावना जगाई। अन्य लोगों के अंदर जैसा विश्वास थाए वैसी भावना उन्होंने महसूस की।
यह नियम बहुत ही सरल है। यदि आपके अंदर यह विश्वास है कि आपके जीवन में स्वास्थ्य आ सकता है तो ही आप अपने आपको स्वस्थ महसूस करेंगे। अगर आपके अंदर अमीर बनने का विश्वास है तो आप समृद्धि और प्रचुरता की भावना महसूस कर सकते हैं। अगर आपके अंदर सफल होने का विश्वास है तो ही आपके मन में सफलता की भावना निर्माण होगी। इतना ही नहींए अगर आपके अंदर मोक्ष प्राप्ति का विश्वास है तो ही आपके मन में मुक्ति की भावना तैयार होगी।


सुबह उठते ही अखबारों में होनेवाली नकारात्मक खबरें पढ़कर ष्विश्व में कभी शांति आ ही नहीं सकतीष्ए इस बात पर कुछ लोग विश्वास रखते हैं और स्वयं के अंदर ष्अशांति की भावनाष् महसूस करते हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग ष्आज मुझसे दिनभर में बड़े काम होनेवाले हैंष् यह विश्वास रखकर ष्उत्साह और ताज़गी की भावनाष् महसूस करते हैं। ष्लोग मेरी मदद नहीं करतेष् ऐसा विश्वास रखकर कुछ लोग ष्असहयोगष् की भावना महसूस करते हैं तो कुछ लोग ष्मेरे जीवन में सच्चे और अच्छे लोग हैंष्ए इस विश्वास से ष्सहयोगष् की भावना महसूस करते हैं। ष्पैसा कमाना बहुत कठिन हैष् इस विश्वास में जीनेवाला इंसान हमेशा ष्अभावष् की भावना महसूस करता हैए वहीं दूसरी ओर ष्मेरे जीवन में सब कुछ भरपूर हैष्ए यह विश्वास इंसान के अंदर ष्भरपूरताष् का भाव जगाता है।


किसी के अंदर यह विश्वास होता है कि ष्इस जन्म में मोक्ष मिलना असंभव हैैष् ऐसे लोग ष्बंधनष् की भावना में जीते हैं तो कुछ लोगों के अंदर अपने गुरुए ईश्वर और कुदरत के प्रति दृढ़ विश्वास होता है इसलिए वे ष्आज़ादीष् के भाव में ही जीवन जीते हैं।


कहने का अर्थ हर इंसान किसी न किसी बात की उम्मीद करता है और किसी न किसी बात पर ष्विश्वासष् रखकरए वैसी ही भावना का निर्माण कर रहा है। इस पृथ्वी पर हर इंसान का जीवन अलग है क्योंकि हर इंसान के अंदर होनेवाला विश्वास अलग है।


सफल होना किसी के लिए बहुत सहज है तो किसी के लिए यह बहुत कठिन और दुःखद है क्योंकि दोनों के अंदर का विश्वास अलग है। भगवान बुद्धए भगवान महावीरए संत ज्ञानेश्वरए संत तुकाराम जैसे आध्यात्मिक महापुरुष होंए महात्मा गांधीए नेल्सन मंडेला जैसे लीडर्स हों या मदर तेरेसा जैसी संतए हर महान व्यक्तित्वने पहले परम सफलता ;ईश्वरद्ध पर विश्वास रखा और उसी भावना में रहते हुए महान कार्य किए। उन सभी के जीवन की नींव थीए ष्उम्मीद और विश्वास।


तो क्या आप भी अपने जीवन में खुलकरए खिलकर जीना चाहते हैंघ् क्या आप सच्ची दिवाली मनाना चाहते हैंघ् दिवाली मनाने का अर्थ केवल पटाखों स्वादि व्यंजनों और छुट्टियों के मज़ों तक सीमित न रहें। असल दिवाली तो आपके अंदर मनाई जा सकती है। जब आपके अंदर उम्मीद का दीया हमेशा जलता रहता हैए जब आप विश्वास का उत्सव मनाते हैं तब जीवन का हर क्षण दिवाली बन सकता है। आप ऐसी दिलवाली ;हृदय से निकलनेवाले आनंद कीद्ध दिवाली मना पाएँए इसी शुभेच्छा के साथए हॅपी दिवालीए हॅपी थॉट्स!

 

सफलता का आधार मानसिक स्वच्छता - पुष्पेन्द्र कुमार साहू

दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति विचार हैं। अपने विचारों के कारण ही एक व्यक्ति महात्मा और पापात्मा कहलाता है। स्वामी विवेकानंद से लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने विचारों के बल पर ही इतने बड़े परिवर्तन के आधार पुरुष बने। यह हम पर निर्भर करता है हम क्या बनना चाहते हैं? हमारे मन में जो भी विचार आते हैं उसे ये प्रकृति ग्रहण करती है। यदि हमारे सकारात्मक विचार हैं तो प्रकृति  सकारात्मक विचार ग्रहण करेगी और उसका रिजल्ट भी सकारात्मक आएगा। वैसा ही हमारे आसपास का माहौल नजर आएगा, वहीं यदि हमारे विचारों में नकारात्मकता, द्वेष, ईष्र्या, नफरत, लालच और अहंकार है तो उसे भी प्रकृति के पांचों तत्व उसी रूप में ग्रहण करेंगे। नतीजा हमारे आसपास का माहौल भी वैसा ही बन जाएगा। इसलिए जैसे हम अपने कर्मों का ध्यान रखते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं, वैसे ही हमें यह जानना भी जरूरी है कि हमें क्या सोचना चाहिए और क्या नहीं? इस पर कभी हम ध्यान ही नहीं देते हैं। आज से अपनी सोच पर अटेंशन दें। मन को समझाएं कि अमुख विचार हमारे लिए काम का नहीं है। उसे सोचने में हम अपना समय क्यों खराब करें। 
 
 
बचपन में हमें सिखाया जाता है कि बेटा ये काम हमें करना है ये नहीं, जैसे.... आग में हाथ नहीं डालते। गर्म दूध नहीं पीते, वैसे ही ये कभी नहीं बताया जाता कि बेटा ऐसा सोचना चाहिए। अपने मन में ऐसे विचार करना चाहिए। मन की रोजाना सफाई इस तरह से करें। मन को शक्तिशाली ऐसे बनाएं। अपना आंतरिक विकास इस तरह करें....ये बातों ज्यादातर भारतीय घरों में नहीं बताईं जाती हैं। क्योंकि ज्यादातर माता-पिता को ही ये सब पता नहीं होता है। 
आज से प्रतिज्ञा करें.... मैं अपनी लाइफ में वही विचार करुंगा, वही सोचूंगा जो मुझे तरक्की की ओर ले जाएं, जिससे  मेरा आंतरिक विकास और सशक्तिकरण हो, मेरी उन्नति हो, मेरा व्यक्तित्व महान बने, मेरा सपना पूरा हो, परमात्मा पिता को कैसे खुश रख सकूं, परमात्मा की मुझसे क्या आशाएं हैं, मैं एक शुद्ध, शक्तिशाली, महान, आत्मा हूं। मेरा जन्म महान कार्यों के लिए हुआ है। सफलता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। परमात्मा पिता मेरे साथी और शिक्षक हैं। मेरा हाथ ईश्वर के हाथ में है। मैं बहुत भाग्यशाली और खुशनसीब आत्मा हूं...... जैसे  ही ये विचार आप करने लगेंगे तो चंद दिनों में ही आप अपने जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन देखेंगे,  क्योंकि प्रकृति का नियम है वह जो जैसा लेती है उसी रूप में हमें वापस भी करती है। 
 
आपका मन डस्टबिन नहीं है
ग्लोबलाइजेशन के दौर में आज सूचनाओं का भंडार है। वॉट्सएप और फेसबुक ने तो सबसे ज्यादा सूचना क्रांति ला दी है। आज हम सुबह से उठते ही न्यूज पेपर पढ़ते हैं जिसमें नकारात्मक सूचनाओं का भंडार होता है। इसके अलावा टीवी शो, मूवीस, दिन में दोस्तों के साथ गपशप, वॉट्सएप, फेसबुक और एक-दूसरे की आलोचना करने में ही दिन निकाल देते हैं और रात को सो जाते हैं। दिनभर जो हमने नेगेटिव बातें अपने मन में भरीं हैं वह हमारे मस्तिष्क में सेव हो जाती हैं। क्योंकि हमारा मस्तिष्क हमारा सीपीयू है। इसकी मेमोरी अनलिमिटेड है। फिर वहीं सुबह फिर से नेगेटिव न्यूज और दिनभर वहीं दिनचर्या। लेकिन हम कभी सोचते ही नहीं है कि हम जो मन में डस्टबिन की तरह डालते  जा रहे हैं उसकी भी सफाई करनी चाहिए। नतीजन मन में नकारात्मका चीजें इक्क_ी होने से मन  अशांत होने लगता है, तनाव बढ़ता है, डिप्रेशन बढ़ता है, गुस्सा आने लगता है, चिड़चिड़े हो जाते हैं कभी बार तो नींद नहीं आती है। 
आज से संकल्प लें कि हम अपने मन को डस्टबिन नहीं बनाएंगे। जो सूचना  या जानकारी हमारे काम की है उसे ही रिसीव करेंगे और रात को सोते समय  उसे डिलीट कर देंगे अर्थात् सारा दिन का हिसाब-किताब परमात्मा को देकर ही सोने जाएंगे। साथ  ही रोज मेडिटेशन करेंगे, क्योंकि मेडिटेशन में ही वह सकती है जो हमारे विचारों को कंट्रोल में रखना सिखाता है। यह अंतर्जगत की वह यात्रा है जिसमें हम आत्म मंथन और आत्म चिंतन से स्यवं की कमी-कमजोरियों  को पहचान सकते हैं, उन्हें दूर कर सकते हैं। इससे मन शक्तिशाली होता है और उसकी कार्यक्षमता भी बढ़ती है।
 
पुष्पेन्द्र कुमार साहू, पत्रकार

मनोविकारों पर सम्पूर्ण विजय

प्रेम जीवन की यथार्थ नियंत्रक शक्ति है। जीवन रूपी घोड़े को प्रेम रूपी लगाम द्वारा ही नियंत्रित किया जा सकता है। प्रेम को परिभाषित करते हुए एक दार्शनिक ने कहा है कि अपने समस्त कर्मों को परमात्मा को समर्पण करके, उसके विस्मरण व वियोग में परम व्याकुल होकर तड़पना ही परमात्मा से सच्चा प्रेम है। प्रेमी हृदय उदार होता है। वह दया और क्षमा का स्वरूप होता है परन्तु ईष्र्या एवं दम्भ के नाले उसे विकृत कर देते हैं। प्रेम की अवस्था को प्राप्त करना ही सिद्ध अवस्था है। प्रेम एक ऐसी दिव्य औषधि है, जिसका रसपान करने से जीवात्मा के जन्म-जन्मान्तर के पाप व दुःख के जो भी मूल कारण हैं, जलकर भस्म हो जाते हैं। प्रेम एक चुम्बकीय शक्ति है, जिसके प्रयोग से अजामिल जैसे पापी का भी हृदय परिवर्तन किया जा सकता है। महात्मा बुद्ध के द्वारा अंगुलीमाल का हृदय परिवर्तन होना, प्रेम की ही शक्ति का एक अद्भुत उदाहरण है। परमात्मा भी यही कहते हैं कि जो मुझे दिल से याद करता है, वो सदैव मेरे हृदय में वास करता है।


आज का समाज चरित्रहीनता की खाई में गिरकर महापतित बन चुका है। चरित्रहीनता और अनैतिकता का जामा पहने मानवता, दानवता में बदल चुकी है। परिणाम स्वरूप माताओं-बहनों के साथ यौन हिंसा, भ्रूण हत्या, दहेज के नाम पर हत्या, बुजुर्गों का अपमान, माता-पिता द्वारा बच्चों की परवरिश में लापरवाही, पति-पत्नी में तलाक, मांसाहार का सेवन एवं अश्लीलता का खुलेआम प्रदर्शन हो रहा है। ऐसी संकट कालीन स्थिति में हमें आध्यात्मिकता एवं नैतिकता का एकमात्र मार्ग नज़र आता है। आध्यात्मिक शक्ति के आधार से ही समाज में फैले हुए विकारों के प्रदूषण को समाप्त किया जा सकता है। गहराई से चिंतन करने से हमें ज्ञात होता है कि विकारों का असली जनक देह-अभिमान है, जिससे विकारों की उत्पत्ति होती है। देह-अभिमान अर्थात् स्वयं को देह समझकर कार्य व्यवहार में आना। संबन्धों में दैहिक दृष्टि रखना जो असत्य और असभ्यतापूर्ण व्यवहार है।


वास्तव में आत्मा अजर-अमर और अविनाशी है, शरीर जड़ है। आत्मा एक चैतन्य शक्ति है, जब तक सत्य-असत्य, प्रेम और द्वेष के अन्तर को स्पष्ट रूप से नहीं जाना जाता, तब तक हमारे अन्तर मन से विकारों का जहर नहीं मिट सकता। दैहिक प्रेम स्वार्थ पर आधारित होता है। जब स्वार्थ की पूर्ति नहीं होती तो यही दैहिक प्रेम घृणा, ईष्र्या, द्वेष, बदले की भावना और छल-कपट का रूप धारण कर मानव-मन में जहर घोल देता है। आत्मिक, परमात्मिक प्रेम निस्वार्थ, निष्काम और निश्च्छल होता है, इससे आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों की वृद्धि होती है। जैसा कि गीता में भी वर्णित है कि जब धर्मग्लानि होती है, तब परमात्मा अवतरित होकर अधर्म का विनाश और आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करते हैं। कितना अनोखा और विचित्र संयोग है, एक ओर विकारों की अग्नि तीव्रगति से बढ़ती जा रही है और दूसरी ओर विश्व नियन्ता परमात्मा अत्यन्त गुप्त रूप से मानवीय तन में प्रवेश कर राजयोग के माध्यम से आत्माओं को पावन बनाते हैं। राजयोग के गहन अभ्यास द्वारा जीवात्मा विकारों की अग्नि को समाप्त कर ज्ञान की शीतलता से भरपूर हो जाती है। जब आत्माएं ईश्वरीय ध्यान की उच्चतम अनुभूति की आनन्दमय अवस्था को प्राप्त कर लेती है, तो उनका मन-मयूर प्रफुल्लित हो उठता है। ऐेसे में
परमात्मा के प्रति दिल से धन्यवाद के यही मीठे शब्द निकलते हैं, जो पाना था सो पा लिया। परमात्म प्रेम का अमृत विकारों के विषैले जहर को चूसकर जीवात्मा में पावनता और दिव्यता का संचार कर देता है। जैसे भक्त शिरोमणि मीरा, श्रीकृष्ण के प्रेम में इतनी मगन रहती थी कि उसकी क्षण भर की दृष्टि से जहर का प्याला भी अमृत बन गया। जब हम भी सफल तपस्वी बन परमात्म प्रेम की लवलीन अवस्था को प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं, तो उसकी अनुभूति की किरणें बहुत शक्तिशाली होती हैं। स्वयं के विकारों से मुक्ति के साथ-साथ संबन्ध-सम्पर्क में आने वाली आत्माओं के विकारी वायब्रेशन भी समाप्त हो जाते हैं। फलस्वरूप विश्व में प्रेम, शान्ति, एकता एवं दिव्यता जैसे गणों का संचार होने लगता है। हमारे व्यक्तित्व में पारदर्शिता एवं दिव्यता की झलक स्वतः दृष्टिगोचर होती है। विश्व एक परिवार है, बेहद की ये श्रेष्ठ भावना चहुं ओर फैलने लगती है। यह समय है जब हम सब प्रेम की मूर्ति बन, प्रेम के सागर परमात्मा से प्रेम का अमृत एकत्र कर खुले दिल से सर्व आत्माओं को दें, यही सबसे बड़ा पुण्य है। (ओआरसी, गुरूग्राम)

जीवन का उत्सव मनायें

जीवन की यात्रा में, रोज़-रोज़ की भागदौड़, कमाने-धमाने में हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि ईश्वर की दी हुई इस ख़ूबसूरत सौग़ात का आनन्द लेना ही भूल जाते हैं। किसी से भी अगर उनका हालचाल पूँछें तो अक्सर जवाब मिलता है, "चल रहा है, कट रही है ज़िन्दगी।“ कितना अच्छा हो यदि हम हमारे जीवन को समस्याओं, परेशानियों के बावजूद एक उत्सव की तरह जिएँ। विश्वप्रसिद्ध क्लिनिकल सायकोलॉजिस्ट डॉ. गिरीश पटेल इसके लिए कुछ बहुत ही सरल उपाय सुझाते हैं।

 

(१) ख़ुश रहने की आदत डालें- छोटे बच्चे दिन में लगभग ८० बार हँसते हैं। जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं यह कम होता जाता है। तो मुस्कुराइए, छोटी छोटी बातों में ख़ुशी ढूँढिए। हँसना, मुस्कुराना तो अच्छा है ही लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है ख़ुशी को महसूस करना। जो अच्छी बातें सुनें उन्हें याद रखने की कोशिश करें। उसी वक़्त तय कर लें कि इसे हम हमारे जीवन का हिस्सा बनायेंगे। ऐसा करने पर हम पायेंगे कि हमें इसका अधिकतम फ़ायदा होगा।

(२) कृतज्ञता की वृत्ति रखें- इस पर कई शोधों के बाद पाया गया कि जिन व्यक्तियों में कृतज्ञता का भाव है वे सुखी और स्वस्थ रहते हैं। यह भावना कि लोगों ने मेरे साथ अच्छा किया है, जीवन में मुझे कई वरदान मिले हैं- यह हमें मन से बहुत ख़ुश और हल्का रखती है।

(३) जीवन एक सुपर मैगा सीरियल है- इसमें सुख-दुख आयेंगे, तकलीफें, समस्याएँ आयेंगीं लेकिन यह समझ लो कि मैं तो एक रोल निभा रहा हूँ। सिर्फ़ मैं ही नहीं, बाक़ी सब भी अपना- अपना रोल निभा रहे हैं। हमें इस रोल से डिटैच होना है। कोई बीमारी आ गई, बदनामी हो गई, कोई और समस्या आ गई तो यह डिटैच होने की प्रैक्टिस बहुत काम आयेगी। यह तैयारी पहले से ही नियमित करनी होगी।

(४) कोई भी अवस्था स्थायी नहीं रह सकती- इस बात को अच्छी तरह समझ लें। यदि अभी बहुत दुख हैं तो धीरज धरें कि आगे अच्छे दिन आयेंगे। और यदि अभी बहुत सुख है तो इसका अहंकार न करें। क़ुदरत,वक़्त एक झटके में सब कुछ बदल सकता है। इसलिए यह निश्चय रखें कि हर मुसीबत के बाद सुख आता है। सुबह की पहली किरण जब पृथ्वी पर पड़ती है उसके पहले घोर अन्धियारा होता है। हम छोटी- छोटी समस्याओं में ही उलझ जाते हैं, निराश हो जाते हैं। उस वक़्त सोचें कि मुझे मानसिक रूप से स्थिर रहना है।

(५) अपने विवेक को विकसित करना है- हमें इस बात का अहसास करना होगा कि सुख, ख़ुशी, शान्ति बाहरी वस्तुओं, व्यक्तियों या परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करते। इन्हें हम स्वयं के भीतर ही पा सकते हैं। लेकिन आज गड़बड़ यह हो गई है कि हम यह सब बाहर ढूँढ रहे हैं। हम सोचते हैं कि मुझे जो कुछ चाहिये वह सब मिल जाए तब मै सुखी होऊँगा।

(६) सन्तुष्ट होना सीखें- आज हम जो कुछ भी हैं, हमने जो कुछ हासिल किया है वहाँ एक बार सन्तुष्ट हो जाएँ। लक्ष्य भले ही बहुत बड़ा रखें पर वर्तमान में जहाँ भी हैं वहाँ सन्तुष्ट रहें। लक्ष्य हासिल करने के लिए ज़रूरी है कि हम शान्त रहें, एकाग्र रहें। तभी परिस्थितियॉं अनुकूल बनेंगीं। तो यही अनुभव करें कि आज मैं जहाँ हूँ सन्तुष्ट हूँ। जो बीत गया उसके बारे में सोचकर दु:खी नहीं होना है, न ही कोई हीनता का भाव लाना है। वर्तमान में जो क्षण है वही सत्य है। जो कुछ इस क्षण कर रहे हैं,ऐसा सोचें कि मैं इसका आनन्द ले रहा हूँ। ऐसा करने से बहुत अच्छा महसूस करेंगे। एकाग्रता और याददाश्त भी बढ़ेंगे।

(७) मन:स्थिति मज़बूत हो तो कैसी भी परिस्थिति पार हो सकती है- परिस्थितियॉं तनाव पैदा नहीं करतीं,तनाव हमारी मन:स्थिति से उत्पन्न होता है। परिस्थिति हमारे नियंत्रण में नहीं है परन्तु मन:स्थिति पूरी तरह से हमारे नियंत्रण में है। जब भी कोई समस्या हो तो शान्ति से सोचें कि वह क्या है, उसे सुलझाने के मेरे पास कौन-कौन से रास्ते हैं व इनमें से मेरे बस में क्या है? इन सब की एक फ़ेहरिस्त बनायें।हम पायेंगे कि हमें बहुत कुछ मिल जाएगा जो हम कर सकते हैं। सारा मदार हमारे नज़रिये पर है.

(८) अपने रिश्तों को मज़बूत कीजिए- ऐसा करने से व्यक्तिगत व व्यावसायिक जीवन सुधर जायेंगे। इसके लिए मेहनत लग सकती है। कुछ त्याग भी करने पड़ सकते हैं लेकिन ये ज़रूरी हैं। बिना इसके जीवन में ख़ुशी ढूँढना ऐसा ही है जैसे किसी छेद वाले बर्तन में पानी भरने की कोशिश करना।हम कितना ही घूमने- फिरने, खाने-पीने, शॉपिंग करने, टीवी- फ़िल्म आदि देखने में ख़ुशी ढूँढे लेकिन कुछ क्षणों के लिए दिल बहलने के अलावा हमें और कुछ हासिल नहीं होगा रिश्तों में यदि कड़वाहट हो तो उसके कारण की जड़ तक जायें और उसे दूर करने की कोशिश करें।

डॉ शिल्पा देसाई

जीवन में गुणों का महत्व

आज के समाज की ओर हम ग़ौर करे तो अधिकतम नकारात्मक पहलु दिखाई देते हैं. वे चाहे दुखद घटनाएँ,तकलीफ़ेबीमारियाँडिप्रेशन जैसे मानसिक रोग हों या फिर संबंधों में दरार आदि. उसका सबसे बड़ा कारण है जीवन में गुणों का अभाव। आज की शिक्षा प्रणालीुकेशन सिस्टएप्रणाली  शिक्षा  वर्तमान  ग़ौर करें तो आजनयीकनीकियों और विज्ञान की शिक्षाओं पर बहुत ज़ोर दिया जा रहा है। ये जानना बहुत ज़रूरी है कि जहाँ ये शिक्षा अति आवश्यक है वहीं गुणों की शिक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। देखने में आता है कि कहीं पर भी गुणों के महत्व पर ज़ोर नही दिया जा रहा है। क्यूँ हम समझते हैं कि नयी तकनीक ज़रूरी हैं इसका जवाब ज़रूर हमारे पास है और ये सही भी है कि इसके महत्व को कम नही आँका जा सकता लेकिन क्या जीवन जीते हुए जीवन के मूल्यों को कम आँका जा सकता है। नाम ही है जीवन मूल्य (गुणअर्थात् वो चीज़ जो हमारे जीवन के मूल्य यानी जीवन की क़ीमत को बढ़ायें। हर क़दम में जहाँ नयी-नयी तकनीक से जुड़ी जानकारी काम आती है वहीं हर क़दम में सहनशीलतासन्तुष्टताप्रेमआत्मसंयम,हिम्मत आदि के महत्व को कौन नकार सकता है।

आज का युवा गुणों के महत्व से अनजान राह भटक गया है। मन को सही दिशा ना मिलने के कारण भटका हुआ मन ग़लत-ग़लत काम कर रहा है और स्वयं कोपरिवार को और समाज को बहुत कष्ट पहुँचा रहा है। ऐसी अनेकानेक ख़बरों से रोज़ अख़बार भरा रहता है। यदि हमें उनके जीवन की परवाह है तो उन्हें हमें सही दिशा दिखानी ही होगी क्यूँकि वो युवा हमारे अपने ही बच्चे अपने ही मित्र सम्बंधी हैं। हम सभी जानते हैं कि युवाओं से सबकी अपेक्षाएँ चाहे मात-पिताचाहे समाजचाहे देश की बनी ही रहती हैं क्यूँकि युवा ही आने वाले समाज की नींव भी है। ऐसे में युवा को सही शिक्षा देना और ही महत्वपूर्ण हो जाता है। जैसा आज का युवा होगा वैसा हमारा आने वाला समाज होगा इतनी ज़िम्मेवारी सभी युवाओं पर है।

इस बात को जानते हुए हमें युवाओं को हर उस बात से जागरूक करवाना होगा जो हम आने वाले समाज में देखना चाहते हैं। अगर हमारी श्रेष्ठ कामना है कि आने वाला समाज व्यसनमुक्त बनेभिन्न-भिन्न घात चाहे रेप चाहे रैगिंग चाहे आत्महत्या जैसी बुराइयों से मुक्त बने तो निश्चित ही उन सबसे जुड़ी शिक्षायों से हमें उन्हें परिचित करवाना होगा तभी उनपर कंट्रोल (नियंत्रणपाना सम्भव है।

जीवन में हिम्मतदृढताआत्मविश्वासपवित्रतासच्चाईआत्मसंयमसहलशीलतासरलताख़ुशी,आत्मसम्मान आदि वो श्रेष्ठतम गुणों में से कुछ हैं जिनके बारे में जानने और उनको जीवन में आत्मसात करने का तरीक़ा (अपनाने का तरीक़ाजानने की शिक्षा से युवा अपने जीवन में बहुत उन्नती प्राप्त कर सकता हैना सिर्फ़ अपने जीवन में बल्कि ऐसा युवा ही दुनिया के लिए भी एक आदर्श बन सकता है।

वास्तव में समाज को व देश को ऐसे युवा की तलाश ही रहती है जो मूल्यवान के साथ-साथ अच्छी भौतिक शिक्षा भी प्राप्त किए हुए हो। ये दोनो ही अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं। जहाँ भौतिक शिक्षा शरीर के पालन-ोषण के लिए ज़रूरी है वहीं गुणों की शिक्षा ख़ुशी और आत्मविश्वास को क़ायम रखने के लिए acheter du cialis en ligne परमआवश्यक है। अगर मूल्याँकन (इवैल्यूएशनकिया जाए तो दोनो का महत्व बिलकुल बराबर है।

अगर हम सिर्फ़ भौतिक शिक्षा को ही सारा महत्व देते हैं तो इसका प्रैक्टिकल रिज़ल्ट यही होता कि देश के सबसे माननीय इन्स्टिटूशन (संस्थानमें जाने के बाद भी बच्चे छोटी-छोटी बातों पर आत्महत्या जैसी घटनाओं के शिकार हो जाते हैं।

वहीं अगर हमने उन्हें हिम्मतआत्मविश्वासधीरजसदभावना जैसे गुणों की शिक्षा दी होती तो वो बात-बात में लड़ाई-झगड़ाबदले की भावनादुर्व्यवहार से घिरा नहीं रहता। लेकिन आज देखने में तो ये आता है,बहुत करके सुनने को भी मिल ही जाता है कि ये तो उलटा सुना नहीं सकता दूध का धुला है आदि आदि। आज का समाज गुणों से इतना अनजान प्रतीत होता है कि सहनशीलता और सच्चाई जैसे महान गुणों को आज कमज़ोरी माना जाता है और यही सुनने में आता है कि चुप रहने से और सच्चाई से काम नहीं चलता। क्या हम इतिहास के उन गौरवशाली हस्तियों से अपरिचित हैं जिनकी महानता का गायन हम उनके इन महान गुणों के आधार पर ही करते हैं। चाहे वो मदर टेरेसा होंमहात्मा गांधी होंगौतम बुद्धजीसस क्राइस्ट या स्वामी विवेकानंद हों। इन सभी को कभी ना कभी ग्लानि के शब्दों को सहन करना पड़ा लेकिन इन्होंने चुप्पी साधी और उस ग्लानि की परवाह किए बिना अपने लक्ष्य की और अपने सत्यता के बल से बढ़ते ही गएइसलिए आज हम उनके प्रशंसक हैं।

आख़िर कैसे सच्चाई और सहनशीलता को हम कमज़ोरी नाम दे सकते हैं। इन ग़लत मान्यताओं के कारण आज हमारा जीवन कहाँ से कहाँ पहुँच गया। हमारा देश जिसकी संस्कृति (कल्चरही देश को गौरान्वित करता था उसे ही हमने कमज़ोरी का नाम दे दिया।

वास्तव में इंसान की महिमा सिर्फ़ उसके गुणों से ही होती है। बिना गुणों के तो इंसान को इंसान का दर्जा दिया ही नहीं जा सकता। अगर हम आज के कामयाब लोगों में भी देखें तो सचिन तेन्दुलकर हो या अमिताभ बच्चनउनके बोलने से ही उनके गुण प्रत्यक्ष होते हैं। तभी हम उनकी महिमा करते हैं।

यहाँ तक कि मंदिरों में भी जिनकी हम पूजा,अर्चनावंदना कर रहे हैंउसका एकमात्र आधार उनके गुण ही तो हैं। इसलिए हम देवी-देवतायों के आगे यही गाते हैं कि आप सर्वगुण सम्पन्न हैं हमपर तरस करिए। वो इतने ऊँचे इसलिए ही हैं क्यूँकि उनमें वो गुण हैं जो हममें नहीं हैं।

यहाँ मैं अपना एक अनुभव सुनाना चाहूँगी कि युवायों की ऐसी चर्चायों में क्या प्रतिक्रिया होती है। मैं इस एप्रिल माउंट आबू थी जहाँ मुझे ओम् शांति भवन में परमात्म ज्ञान सुनाने का सुअवसर मिला। मुझे अक्सर युवाओं को भाषण करने के समय कहा जाता था कि ये रुकेंगे सुनेंगे नहीं क्यूँकि इनका लक्ष्य साइटसीइंग है। लेकिन मैं उन्हें सुनाने से पहले यही कहती थी की मुझे थोड़ा सा समय दें तो अवश्य यहाँ से आज वो प्राप्ति करके जाएँगे। वो ना सिर्फ़ समय देते थे बल्कि बहुत ध्यान से सुनते भी थे और बाद में भी चर्चा कर जीवन में कैसे अपनाए उसके प्रयास में तत्पर रहते थे। बहुत सुंदर प्रतिक्रिया देखने में आती थी।

जब चर्चा में मैं उन्हें गुणों के प्रैक्टिकल फ़ायदो के बारे में तर्कसहित (लाजिक्लीबताती थी तो उन्हें महसूस होता था कि सच में इससे हमारी उन्नति होगीहमारी ख़ुशी बढ़ेगी और हम स्वयं के प्रति भी अच्छी सोच रख पाएँगे और समाज में भी माननीय जीवन जियेंगे।

इस अनुभव के ज़रिए मैं यही कहना चाहती हूँ कि हम ये ना सोचें कि युवा इन बातों की क़दर नहीं करेगा। बिलकुल नहीं। यदि उन्हें सही रीति इस बारे में शिक्षा दी जाए तो भले कौन समाज में ऐसा होगा जो जीवन में उन्नति और संबंधों में मिठास नहीं चाहता होगा।

हम आने वाले कुछ लेखों में भिन्न-भिन्न गुणों के महत्व को समझेंगे और उन्हें जीवन में धारण करने के उपायों पर भी चर्चा करेंगे। हम अपनी ओर से ये छोटा सा प्रयास करेंगे जिससे हम सुंदर समाज और सुंदर देश बना सकें और अपने भारत देश का नाम फिर से विश्व में गौरान्वित कर सकें।

सोच बदलेगी तो जीवन बदलेगा

एक किसान शहर से दूर अपने गाँव मे रहता थावह सम्पन्न था पर अपने जीवन से खुश नहीं। एक दिन उसने निश्चय किया कि वह अपनी सारी जमीन-जायदाद बेचकर किसी अच्छी जगह बस जाएगा। अगले दिन उसने एक परिचित रियल एस्टेट एजेंट को बुलाया और उससे अपनी प्रॉपर्टी बेचने की इच्छा जाहिर की। एजेंट को अपनी समस्याएँ गिनायीं- ये उबड़-खाबड़ रास्ते देखो, यह झील देखो, जिसके चक्कर में घूम कर रास्ता पार करना पड़ता है। इस छोटे-छोटे पहाड़ों पर जानवरों को चराना मुश्किल है। यह बगीचा देखो। आधा समय इसकी सफाई और रखरखाव में चला जाता है। मुझे बस इसे बेचना है। एजेंट ने इलाके का जायजा लिया और कुछ दिन बाद किसी ग्राहक के साथ आने का वादा किया। दो दिन बाद किसान सुबह का अखबार पढ़ रह था कि शायद किसी अच्छी प्रॉपर्टी का पता चल जाए, जहां वह सब बेचकर जा सके। तभी उसकी नज़र एक विज्ञापन पर पड़ी- “लें सपनों का घर, एक शांत मनोरम जगह, प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर जगह पर बसाएं अपना सुंदर आशियाना”। संपर्क करें- …… ………….

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कैसे बनी ईश्वरीय पाठशाला

 

मनहरण अब युवा हो चला था। वह घोर जंगल गुढ़वा का रहने वाला कंवर जाति का आदिवासी है। जहां सिद्ध-बाबा के नाम पर शिव मंदिर तथा पानी का झरना भी है। यह नगरदा मुख्य गांव से किलोमीटर की दूरी पर है। गांव का वातावरण एकांत और शांतमय है। मनहरण कालेज की पढ़ाई के लिये चांपा आया और परीक्षा देकर सीधा मामा गांव सरईडीह आ गया। उसने देखा कि गांव का आलम कुछ ओर ही है। गांव के कुछ लोग पास के गांव पकरिया में कथा सुननेएक पंडितजी घसियागिरि के घर जाते हैं। वहां पास के ही गांव सरगबूंदिया से चकबंदी अधिकारी निरंजनलाल साहू जी आते थे।

जिन्हें बिलासपुर में प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय का परिचय और ज्ञान मिला था। यह बात सन् 1989 की है। मनहरण को ज्ञान की पिपासा तो पहले से ही थी और उसे लगा कि भगवन इस धरा पर आकर सच्चा गीता का ज्ञान दे रहें हैं। फिर क्या था उसने गांव में ज्ञान देना प्रारम्भ किया तो गांव की आधी आबादी को शिव-कथा सुनने लगी। कथा सुनने वालों का उठना-बैठनाखाना-पीना रहन-सहन सब कुछ बदल गया।

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किसी भी सत्ता का अनुसरण न करें

 

किस भी सत्ता / प्रभुता का अनुसरण ना करें. किसी भी सत्ता के अनुयायी ना बने. प्रभुता या सत्ता ही शैतानियत है. सत्ता तबाह कर देती है, विकृति लाती है, भ्रष्ट करती है; और जो व्यक्ति सत्ता का अनुसरण कर रहा है स्वयं का विनाश तो कर ही रहा है वह उसको भी नष्ट कर देता है जिसे कि वह सत्ता या प्रभुता की गद्दी पर विराजमान करता है. जैसे अनुयायी नेता को नष्ट कर देते हैं वैसे ही नेता भी अनुयायियों को नष्ट कर देता है । जैसे शिष्य गुरू को नष्ट कर देते हैं वैसे ही गुरू भी शिष्यों को नष्ट कर देते हैं।

सत्ता से आप कभी भी कुछ भी हासिल नहीं कर सकते. सत्य या हकीकत की खोज के लिए आपको सत्ता से पूरी तरह मुक्त होना होता है. सबसे मुश्किल बातों में से एक यह है कि — सत्ता से मुक्त हुआ जाये, बाहरी सत्ता से भी और भीतरी सत्ता से भी. भीतरी सत्ता है अनुभवों की चेतना, ज्ञान की चेतना. और बाहरी सत्ताएं हैं राज्य, पार्टियॉं, समूह संप्रदाय, समुदाय.. एक वो व्यक्ति जिसे कि सच की खोज करनी है, सच का पता लगाना है उसे इन सारी भीतरी और बाहरी सत्ताओं / प्रभुताओं से अलग रहना होता है. तो यह न कहिये कि क्या सोचना है / पठन पाठन या पढ़ने का यही अभिशाप है कि दूसरे के शब्द ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

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अपने कर्मों की संभाल करे

हमारा जीवन सीमित है । गिने हुए घंटे और मिनट उपलब्ध हैं । हमारे जीवन का हमें मालूम है, और हमारी मौत पहले से ही तय है । तो यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपना समय कैसे प्रयोग करते हैं । अगर हम अपना समय व्यर्थता में, ऊबने में, और उलझन में बिता देते हैं तो हमें अहसास करना चाहिए कि यह बीता हुआ समय हमें फिर से वापिस नहीं मिलेगा । अत्यावश्यकता का भाव उजागर करके मैं तनाव पैदा नहीं कर रही हूँ लेकिन मैं स्वयं से भी बार बार पूछती हूँ, कि मैं अपना समय उपयुक्त तरीके से प्रयोग कर रही हूँ या नहीं?

जब हमें पार्टीयों और धर्मार्थ संगठनों में निशुल्क भोजन परोसा जाता‍ है, तो यह हमारा कर्तव्य है कि हम उस भोजन को व्यर्थ जाने न दें । हम अपनी प्लेटों को भोजन से पूरा भर लेते हैं और उसको आधा फेंकना कितना आसान लगता है । उस भोजन को कैसे कमाया गया था? कड़ी मेहनत और पसीना बहाकर । हमें भोजन के लिए प्रेम और आदर का भाव जाग्रत करने की आवश्यकता है, जो धरती माँ हमें निशुल्क देती है । अगर मैं उस भोजन को फेंक देती हूँ तो ना केवल वह कूड़ेदान में जाता है बल्कि वह मेरे कर्मों के भार को बढ़ा देगा । अगर मैं इस भोजन को अपने साथ ले जाऊँ और इसे बाद में खा लूँ या किसी और को दे दूँ जिसे इसके महत्व का मालूम हो तो मैंने एक पुण्य का कार्य कर दिया है ।

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