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संपादक की कलम से

अब धीरे धीरे सभी लोग यह मानने लगे हैं कि श्रीमद्भगवद्गीता धर्म का ग्रन्थ नहीं है. वह तो व्यक्ति को  आत्म साक्षात्कार के लिए प्रेरित करता है. अपने सामने और आने वाली जीवन की समस्याओं का सामना करने तथा उनपर विजय पाने का रास्ता बताने वाला ग्रन्थ है. वह अपने ही विकारों और कमजोरियों को समझने का सहायक है. वह उस सच को स्पष्ट करता है जिसके व्यूह में फंसकर हम लगातार उलझते ही जाते हैं.

हम कौन हैं और हमारे सामने उपस्थित जीवन क्या है. उसकी समस्याओं का मूल है क्या. जब कृष्ण कहते हैं –तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय, युद्धाय कृत निश्चय – तब उस युद्ध का तात्पर्य अपने से ही अपना युद्ध है. अपनी समझ को जागृत कर, अपनी कमजोरियों को पहचानकर, अपने सामने के संसार से परिचित होकर अपना निश्चय कर उसपर विजय पाने के लिए युद्ध कर. इसका प्रमाण अर्जुन का वह वचन है जो उसने उपदेश की समाप्ति पर कहा. अर्जुन ने कहा – नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत. स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनम् तव.मेरा मोह नष्ट हो गया, मुझे समझ आ गई. यह सब आपकी कृपा से हुआ है और अब मैं वही करूंगा जो आपने कहा है.

गीता का यह वचन बहुत सार्थक और समझ का आधार है. मेरा मोह नष्ट हो गया. आप याद करेंगे तो गीता का प्रारम्भ भी यही से है. मोह में ही तो थे धृतराष्ट्र और मोह में ही पद गया था अर्जुन. गीता का पहला ही श्लोक है जिसमे धृतराष्ट्र कहते हैं- संजय कुरुक्षेत्र में उपस्थित मेरे और पांडू पुत्रों के बीच क्या होरहा है, मुझे बताओ. एक ही कुल का सबसे बड़ा और कुल का मुखिया ही भेद करके कहता है मेरे और पांडू के. यह मेरा और तेरा ही पैदा होता है मोह के कारण. यह मेरा तेरा हम सबमे है. यही तो आधार है हमारी स्मृति और हमारे एकत्व को नष्ट करने का.मोह का आधार ही है मेरा और तेरा. अकेले धृतराष्ट्र ही नहीं दुर्योधन भी यही कहता है. गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर कहता है – अस्माकं तु विशिष्टता... हमारी सेना में जो जो हैं उनसे आपका परिचय कराता हूँ और भीम की सेना में जो हैं उनसे भी. आगे वह कहता है- मेरी सेना आपके नेतृत्व में अपराजेय है और उनकी सेना को तो सुगमता से जीता जा सकता है. अस्माकं, मेरी और उसकी. यह मेरा तेरा दुर्योधन में भी है.

अर्जुन भी इससे कहाँ मुक्त हैं. सेनाएं तैयार है तभी अर्जुन कृष्ण से कहते हैं- मेरा रथ दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलें. एक बार अपने सामने कौन कौन हैं, उनको देख तो लूं. इनसे ही तो मुझे लड़ना है. अर्जुन इतना नादान तो नहीं था कि उसे कुरु पक्ष की सेना में कौन कौन हैं यह बिल्कुल ही पता न हो. यह भी उसने तब कहा जब दोनों तरफ से नगाड़े, शंख, एवम अन्य युद्ध वाद्य बज चुके थे. यानि युद्ध शुरू ही होने जा रहा था. कृष्ण ने रथ को सेनाओं के मध्य में स्थापित किया. तब अर्जुन ने सामने निगाह डाली. देखा – अरे, ये तो वही हैं, जो मेरे गुरु है, मार्गदर्शक हैं, मामा है, चाचा हैं, ताऊ हैं, आदि आदि. इनसे लड़कर मुझे क्या आनंद मिलेगा. ये मुझे मार दें या मै इन्हें मार दूं तो क्या लाभ. ऐसी विजय का भी सुख. और इसके साथ ही वह एक दार्शनिक प्रवचन करता है कि युद्ध के परिणाम का क्या सामाजिक और पारिवारिक प्रभाव पड़ेगा और इस सबका पाप उसे ही तो लगेगा. तव acheter du cialis en ligne वह कहता है- युद्ध में उपस्थित मेरे ही इन स्वजनों को देखकर- सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति, वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते-  मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मेरा मुह सूख रहा है, कम्पन हो रहा है शरीर में और डर से रोयें खड़े हो गए हैं. मै अब यद्ध नहीं कर सकता. यह अर्जुन का मोह है. जिनसे लड़ने जा रहे थे, उन्हें यानि अपने स्वजनों को देखकर. अपने और पराये. मेरे और तेरे. इतने समय तक जो न्याय, हित, आदि के विचार चला और बना वह सब सामने आते है समाप्त हो गया. दर्शन और धर्म याद आने लगा, पाप और  पुण्य याद आ गया. यह सब मोह के क्षणों में ही याद आता है.

गीता का सार इस पहले अध्याय में उपस्थित होने वाले मोह के रूपों में छिपा है. गीता संभवतः इस मोह को कैसे नष्ट करे, क्या उपाय है यही समझाने और बताने के लिए ही कही गई. मोह के कितने रूप हो सकते हैं और वह किस किस तरह से प्रभावित कर सकता है, इसका भी बहुत स्पष्ट संकेत यहाँ है. संसार की समस्याएं इसी मोह से जनित हैं और उसके लिए अपनी स्मृति को, अपनी उस याद को जगाने की जरूरत है जिसे हम भूल गए हैं. कृष्ण इसी स्मृति को जगाते हैं और जगाने का उपाय बताते हैं. 

 

कमल दीक्षित 

एक बडा भ्रमात्मक वाक्य है जो सबसे अधिक उपयोग में आता रहा है। भगवान से जो मांगोगे, वह तुमको मिलेगा। पुराणों में भी इस तरह के आख्यान और कहानियां हैं कि भगवान ने सब कुछ दे दिया, विवाह में आकर सारा सामान दिया, मकान आदि भी दे दिये। यानी भगवान हमारी सांसारिक जरूरतों, हमारे सांसारिक विवादों और व्यवहारों में हमारी मदद करता है। वह इतना दयालु और कृपालु है कि हमारे दुष्मनों और अब तक किये सब पापों से हमें क्षणभर में मुक्त करता है। अजामिल आदि के आख्यान इस संबंध में दिये जाते रहे हैं। इसी के साथ यह भी कहा जाता है कि वह देवों का देव, महादेव है। वह निराकार, जन्म तथा कर्मों के बंधन से मुक्त, ज्योति या ऊर्जा स्वरूप और एक ओंकार है। यह भी बताया जाता रहा है कि विष्णु, राम या कृष्ण तथा अन्य देवता उसी एकेष्वर के रूप हैं। यानी वह निराकार है और साकार भी है यानी सब एक हैं। आदि।

बहुत लोग ऐसे होंगे जो इस तरह के वचन, कथानक या आख्यानों से मेरी तरह भ्रम में पडते होंगे। मेरे जैसे लोग यह acheter du cialis en ligne मानते हैं कि वह भगवान, ईष्वर या परमेष्वर जो एक है, निराकार है, अजन्मा और कर्म आदि के बंधनों से परे है, वह लोगों को सांसारिक मांगों की पूर्ति में मददगार नहीं होता है। वह तो सांसारिक बंधनों से मुक्ति का मार्ग बताने में सहायक तथा मददगार होता है। वह आपको साकार से निराकार होने का ज्ञान देता है ताकि आप अपने सच्चे स्वरूप को पहचान सकें और जान सकें कि यह देह जो आपने अपने परिचय के रूप में जानी है, उसे केवल उस चेतना या ऊर्जा का वाहक या रथ ही मानें और जानें। आप जाने कि परमेष्वर उस संसार की रचना नहीं करता जो हमारे आसपास दिखाई देता है, भवन, वाहन, संसाधन आदि के स्वरूप में। वह हमारे रिष्तों, उनमें होने वाले व्यापार और व्यवहारों की रचना नहीं करता। वह हमारे साथ और हमारे द्वारा होने वाली घटनाओं का रचनाकार नहीं है। यह सब तो हमारी ही रचनायें हैं। हमारे ही व्यवहार और व्यापार हैं जो हमारे भोग्य-जन्म के कारण होते हैं। यह सब जो पाप-पुण्य के रूप में कहे जाने वाले कार्य व्यापार और व्यवहार हैं, वह सब हमारी ही रचना हैं, हमारे ही कार्य हैं, परमात्मा की रचना नहीं। न तो वह हमारा भाग्य लिखता है और न ही व्यापार या व्यवहार का संचालन करता है।

इस तरह से कहने पर हमारे आसपास मौजूद मंदिर, देव प्रतिमायें, देवताओं से संबंधित कथा-कहानियां, उनसे जुडे षास्त्र, पुराण आदि सब कुछ या तो मिथक होंगे या फिर निरी कल्पनायें। पर कल्पना के बारे में भी कहा तो यह जाता है कि उसका भी आधार होता है, वास्तविक। मन उस वास्तविकता को अपनी तरह से सृजित या रचित कर देता है। तब इसमें कुछ तो सच होगा ही। अपने देखे-सुने व्यक्तियों के सहारे भी तो ऐसी कथायें रची जाती हैं। महात्मा गांधी, विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, अरविन्द घोष, ब्रम्हा बाबा, महारानी अहिल्या बाई आदि के बारे में जो कुछ कहा जाता है वह सामान्य व्यक्ति से भिन्न होता है। ये और इस तरह के अन्य लोग हुए हैं जिनके गुण और षक्तियां सामान्य लोगों से भिन्न थीं। इनको महामानव, देवपुरूष या देवनारी कहा जाता है। उनकी तुलना उन देवताओं से की जाती है जो हमारे पुराणों, षास्त्रों आदि में है। ये सभी सामान्य से विषेष हुए हैं और इसी आधार पर कहा जाता है कि हम भी उनकी तरह ही विषेष हो सकते हैं, अपनी गुण और षक्तियों का विकास करके।

इन विषेष लोगों को महात्मा, वीर पुरूष या नारी आदि तो कहा गया है और यह भी कहा गया है कि इनमें परमात्मा जैसे गुण और षक्तियां हैं पर उसकी मात्रा सीमित है। उनमें से कुछ ऐसे हैं जिन्हें परमसत्ता का इलहाम हुआ या जिनको परमसत्ता ने अपने कार्य का निमित्त भी बनाया। ये ईष्वर के पुत्र, दूत या संवाहक अथवा रथ तो कहे गये पर कभी भी परमात्म सत्ता या परमात्मा नहीं कहे गये। कहा यह गया कि यह ईष्वर या परमात्मा के कार्य को करने के माध्यम हैं। परमसत्ता ने इन्हें अपने कार्य का माध्यम या निमित्त बनाया है। वे माध्यम या निमित्त भी इसलिए बन सके क्योंकि उनमें सामान्य मनुष्यों से भिन्न गुण और षक्तियां थीं। ये अपनी अर्जित षक्ति के आधार पर दूसरों के कठिन, असामान्य कार्य कर सकते थे। बाधाओं, समस्याओं को समाप्त कर सकते थे। संसाधन और वस्तुएं उपलब्ध करा सकते थे। यानी ये देवोचित कार्य अपने गुणों और षक्तियों के आधार पर कर सकते थे। इनमें अपनी अर्जित षक्ति या गुणों आधार पर ही भिन्नता की जाती रही है। इनको देखते हुए देवताओं की कल्पना सामान्य लगती है, असंभव नहीं।

इस तरह से दो सृष्टियां समझी जा सकती हैं। एक वह जो मनुष्य से गुण और षक्तियों के आधार पर विकास करते हुए देव या देवसम हैं। सत, रज और तम ही वे गुण हैं और निर्णय करना, सामना करना, अपने को विस्तार देना ओैर समेट लेना, परखना आदि ही वे षक्तियां हैं जो असामान्य बनाती हैं। ये सभी परमात्मा की षक्तियां तो हैं पर अपरिमित, असीमित नहीं। इनकी हद है, सीमा है। परमात्मा तो गुण और षक्तियों में असीम है। वह इस तरह से होने में मददगार है। देव, ़ऋषि आदि होने में उसकी मदद मिलती है। क्रूर, आसुरी आचरण और व्यभिचार आदि के गुणों और षक्तियों में उसकी मदद नहीं मिलती है। यह तो हमारी ही भूल और आचरण के परिणाम हैं। इसीलिए तो कहा जाता है, संसार की रचना हम करते हैं और स्वर्ग की रचना में वह हमारी मदद करता है। इस तरह से हम देव या देवता तो हो सकते हैं और इस विकास में परमात्मा हमारा मददगार है। वह संसार या सांसारिकता का न तो हिमायती है और न उसमें मदद करता है। सांसारिकता और उसके वैभव, व्यवहार सबकुछ हमारी ही रचना हैं। (सम्पादकीय फर 15)

हम सामान्यतः अपनी हदों, सीमाओं से बंधे रहते हैं। हमारे उपयोग या बातचीत अथवा कामना के शब्दों में भले ही बेहद को व्यक्त करने वाले शब्द हों पर हमारा सोच और व्यवहार सामान्यतः हद की सीमाओं या मर्यादाओं से बंधा रहता है। हम लोकतंत्र को लोगों और उनकी कामनाओं का शासन मानते हैं, सारी दुनिया के लोगों से बंधुत्व रखने की कामना करते हैं, ऐसे काम करना चाहते हैं जिनसे लोक कल्याण हो पर यह सब स्थूल या सूक्ष्म बंधनों में बंधकर रह जाता है। ऐसे ही बहुत कुछ विस्तार को व्यक्त करती हुई बातें हैं पर हमारा सोच सामान्यतः हमारी ही रचित परिधियों या सीमाओं से बंधा रहता है। इससे उस शब्द में निहित कामना फलित नहीं हो पाती।

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जन्म से लेकर मृत्यु तक हम निरंतर कुछ न कुछ जानते, समझते और सीखते रहते हैं। यह जानना, समझना और सीखना जीवन का सहयोगी है और इससे जीवन और उसके लक्ष्य को पाने में मदद मिलती है। अपने लक्ष्य का निर्धारण भी इन्हीं के सहारे करते हेैं। व्यवहार, कर्म और प्रयोग जीवन के ही अंग हैं। इनसे ही निर्णय और निष्कर्ष तैयार होते हैं। इनकी अनुकूलता, सफलता, उत्कर्ष आनंद,खुशी और उत्साह-उमंग पेैदा करती है और इस सबके विपरीत होने पर निराशा, अवसाद और हताशा होती है जिसे कोई नहीं चाहता है।

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प्रो कमल दीक्षित 

दृष्टिकोण छोटा सा शब्द है जो नजरिये का समानार्थी है। आप जिस नजरिये से वस्तु, व्यवहार या लोगों को तथा उनके गुणों आदि को देखते हैं वही दृष्टिकोण कहा जाता है पर वह इतना ही नहीं है। देखना आंख से होता है। देखने में आपका मन और बुध्दि भी उसके साथ होती है। मन और बुध्दि की स्थिति भी उस व्यवहार में शामिल हो जाती है। यह सब मिलकर आपकी प्रवृत्ति का निर्माण करते हैं। इसलिए इतना कहना पर्याप्त नहीं है कि दृष्टिकोण सिर्फ देखना है।

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